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Sayyids in Muslim Societies


Morimoto Kazuo

The world today is home to a great number of putative lineal descendants—and collateral relatives—of Muḥammad, the Prophet of Islam. Let us begin by sharing three recent episodes involving some of these kinsfolk of the Prophet.

sayyids and sharifs

Episode I: The film Close-Up (1990) by the renowned Iranian film director Abbas Kiarostami is an intricate cross between documentary and fiction, featuring a man apprehended for falsely presenting himself as Mohsen Makhmalbaf, a leading figure of Iranian cinema. The film re-enacts the interaction between the cinema-loving "conman" and his "victims," the Āhankhāh family, as well as the trial of the case before a judge. Just as the trial is approaching its conclusion, an interesting incident takes place in the film. The defendant's mother, clad in a black chador, suddenly steps forward and begins to plead with the judge that he should consider the prophetic descent of her son when handing out his sentence. It is true that this incident may not have taken place in reality. However, Kiarostami must certainly have thought that the scene would not appear unrealistic to his audience.

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Why Not Janeu Under My Kurta?

 

Rahmath EP

Rahmath EPLipstick Under My Burkha is a ‘by the Brahmin for the Brahmin' movie to propagate the Savarna definition of the ‘oppressed women’. The whole movie gives you a clear picture of the story of women’s assertion on their personal and sexual liberation through brahminical patriarchal narration filled with Islamophobia by projecting Muslim men as a symbol of oppression and misogyny.

Many of you might have seen this controversial women-oriented movie. The story is about four women in a small town in Bhopal and their private life and desire for personal and sexual freedom and breaking the taboos. Rehana Abidi is a burkha clad college student, daughter of a tailor; Shireen Aslam, mother of three, a home maker and having a secret job as a sales girl;  Leela, a beautician living in her sexual fantasy while struggling for livelihood and Usha Parmar, a 55-year-old widow who falls in love with a swimming coach and expresses her sexual desires.

Yes, it is important to address patriarchy and liberation of women. But how to touch such issues, and address on what grounds and does it uphold the values of dignity, human rights, gender equality or women’s liberation. Is the narration free from patriarchy while making such an attempt? These are some of the key questions that immediately arise in our mind.

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Brahminical Patriarchy and Social Media

 
Bhagyesha Kurane

bhagyeshaSocial media has become an integral part of our lives these days. There are various notions prevalent about whether one should use social media, and if at all it is to be used, then how. Some people view social media only as a tool to pass their time and beyond a certain limit, see any engagement as wastage of time. Many parents are wary of social media out of concern for their daughters who might be harassed by anti-social elements and hence warn them to stay away. At the same time, social media helps one to connect with many people whether we may know them personally or not and it is through such communication that exchange of thoughts takes place. I also joined social media thinking of exploring the possibility of whether this media can be used as a viable alternative option to traditional media. So I started communicating with people through media such as WhatsApp and Facebook. I have been using Facebook for the past six years now. While I think about social media as an alternative to traditional media, it also becomes imperative for me to discuss about safety and security of girls/women in detail. Of course, it is also related in the context of the recent Amar Khade incident.

First of all, we need to take into account that in our brahminical patriarchal society there are certain rules that girls are supposed to follow, as far as use of mobile phones is concerned. Many a times it is just out of necessity that a girl is allowed to use a mobile phone albeit with certain harsh restrictions. The reason being the caste based society considers the girl as the 'honour' of the family. So her parents fear that through mobile phone she may come in contact with someone and get emotionally involved, thus marrying the person out of her own volition and this can result in loss of 'honour' for the family. That's why parents try to limit the use of mobile phones as far as possible and hence check call records and other details on mobile phones. In such a situation, for many girls to be able to use and access social media freely itself becomes a daunting task. Defying traditional restrictions she tries to express herself through social media. But our brahminical patriarchal society looks at her as a form of readily available entertainment instead of looking at her as an individual human being. That's why, often, these girls have had to face sexual exploitation in the online world.

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जाति पाति: आदर्श और हक़ीकत (पंजाब के सन्दर्भ में)

 
Sardar Ajmer Singh (सरदार अजमेर सिंह)

(यह आलेख आज़ाद भारत के पंजाब प्रांत में दलित/पछड़ा वर्ग एवं सिख के 'हम हिंदू नहीं' दृष्टिकोण का ब्राह्मणवादी आर्य समाज और इसके पोषक बन गए राजनीतिक दलों के बरक्स जो भी हुआ है, उसका ऐतिहासिक विवरण है। पंजाब की राजनीति को देखने, समझने और परखने का, पाठकों को, यह आलेख बढ़िया मौका प्रदान करता है। सरदार अजमेर सिंह द्वारा लिखी यह रचना उनकी पंजाबी में लिखी बहुचर्चित किताब 'बीसवीं सदी की सिख राजनीति - एक ग़ुलामी से दूसरी ग़ुलामी' से ली गई है, एवं अनुदित है - गुरिंदर आज़ाद [अनुवादक])
s ajmer singh
बेशक़ गुरु साहेबान (सिख गुरु) ने हिन्दू समाज की सबसे बड़ी लाहनत, जाति पाति प्रणाली का, सिद्धांत और अमल के स्तर पर ज़ोरदार खंडन करते हुए, सिख समाज में इसकी पूरी तरह से मनाही कर दी थी। गुरु काल के बाद धीरे धीरे सिखी के बुनियादी सिद्धांत कमज़ोर पड़ने शुरू हो गए। जिन हिंदूवादी अभ्यासों का गुरु साहेबान ने खंडन किया था, उन्होंने सिख धर्म और समाज को फिर से अपने क़ातिलाना शिकंजे में ले लिया। हिन्दूवाद के दुष्प्रभावों का सबसे गाढ़ा इज़हार सिख पंथ में जात पात प्रणाली की फिर से अमल के रूप में हुआ। ऐसे अनेक ऐतिहासिक प्रमाण और हवाले मिलते हैं जो उनीसवीं सदी तक सिख पंथ के फिर से जात-पात प्रबंध की मुकम्मल जकड़ में आ जाने की पुष्टि करते हैं। 

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जट्टवाद एक दीर्घ रोग

 

सरदार अजमेर सिंह (Sardar Ajmer Singh)

(यह लेख सरदार अजमेर सिंह की बहुचर्चित किताब 'बीसवीं सदी की सिख राजनीति: एक ग़ुलामी से दूसरी ग़ुलामी तक' जो कि पंजाबी भाषा में है, से हिंदी में अनुदित किया गया है सरदार अजमेर सिंह पंजाब के एक जाने माने इतिहासकार हैं। ब्राह्मणवाद की गहन समझ रखने वाले अजमेर सिंह महसूस करते हैं कि पंजाब अपने असली इतिहास के साथ तभी बच सकता है, एवं उसका भविष्य सुरक्षित हो सकता है अगर वह अलग सिख स्टेट बने। पंजाब की तारीख़ का सिख परीपेक्ष्य में मूल्यांकन करने वाले शायद वह इकलौते साहित्यकार हैं जिन्होंने ब्राह्मणवाद की नब्ज़ को पकड़कर सिखों में घुस चुके ब्राह्मणवाद की निशानदेही की है। उनकी लिखी किताबों के माध्यम से व्यापक जगत ने दृष्टिकोण के वह कोने भी छूये हैं जिससे खुद सिख संसार अनभिज्ञ था या यूं कहिये ब्राह्मणवादी स्टेट ने ऐसा कर दिया था। उनके इस आलेख में वह जट्टवाद को परत दर परत खोलते हैं। सिख एवं दलित बहुजन दृष्टिकोण से यह लेख बेहद पठनीय है। ~ गुरिंदर आज़ाद [अनुवादक])

s ajmer singh

पंजाब के जट्ट भाईचारे की शुरुआत को लेकर कई तरह की बातें प्रचलित हैं। ज़्यादा वज़नदार विचार यह है कि इसके पुरखे मध्य एशिया के 'हून' और 'सीथियन' नाम के ख़ानाबदोश कबीलों से ताल्लुक रखते थे जिन्होंने इस इलाके में आर्य लोगों की घुसपैठ से काफी समय बाद निवास करना शुरू किया। क्यूंकि इन कबीलों का कोई पक्का ठिकाना नहीं था और उनका जीवन निर्वाह ज़्यादातर मार-धाड़ पर ही टिका हुआ था, इस कारण वीरता और लड़ाकूपन इनके खून में घुलमिल गया था। उनका नंबर संसार के नामी मुहिमबाज़ और मारखोर टोलों में आता है। समझा जाता है कि उन्होंने उनसे पहले आबाद हुए आर्य लोगों को खदेड़ के गंगा के मैदान की तरफ धकेल दिया था और इस भू-हिस्से में पक्के ठिकाने बनाकर खेती का व्यवसाय शुरू कर दिया। इसी वजह के चलते गंगा के मैदान में ब्राह्मण पुजारीवाद के असर तले पैदा हुए सभ्याचार का पंजाब के ग्रामीण मालिक किसानों पर उतना गाढ़ा रंग नहीं चढ़ा जितना पंजाब से बाहर अन्य किसान भाईचारों पर देखने को मिलता है। पंजाबी किसान, काफी हद तक, एवं काफी देर तक, इस सभ्याचार से अलग-जुदा रहा है। कबाईली नमूने की आर्थिक एवं भाईचारक बनावट ने पंजाबी ग्रामीण-किसान भाईचारे में भाईचारक-भाव, आज़ाद तबियत और बराबरी की जो स्पिरिट भर दी, वह पंजाबी जट्ट किसान के आचार का एक उभरा हुआ लक्षण हो गुज़रा। उसके स्वभाव और आचरण का दूसरा अहम् लक्षण शख्सियत प्रस्ति है। अर्थात वह हद दर्जे का व्यक्तिवादी है। आम तौर पर जट्ट वही सब करता है जो उसे खुद को अच्छा लगता है। इसका दूसरों पर पड़ने वाले प्रभाव की उसको कोई ख़ास परवाह नहीं होती। न वह इसमें किसी का दख़ल सहन करता है। उसमे खुद पर भरपूर भरोसा, जो अक्सर घमंड का रूपधारण कर लेता है, कमाल का ऊधम और बेशुमार पहल कदमी है। सो जहाँ लीडरों की अगुआई का इंतज़ार किये बिना व्यक्तिगत पहल कदमी और ऊधम की ज़रुरत है, वहाँ वह पूरा कामयाब है। पर जहाँ कामयाबी के लिए चिंतन और जथेबंदी की ज़रुरत पड़ी तो वह अक्सर फेल हुआ; सिवा ऐसे मौकों के कि जब किसी नामवर शख्सियत ने, या सांझे आदर्श या निश्चय ने या सांझे खतरे ने उसे जथेबंद होने के लिए प्रेरित करने में सफलता हासिल कर ली। जट्ट किसान में राज-काज का उतना कौशल या तज़ुर्बा नहीं, जितना खेती का है। इस लिए जहाँ भी, और जब भी, उसने अपनी फितरत के पीछे लग के राज करने का जतन किया, तो वह अक्सर फेल हुआ है।

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