'बाबासाहब अंबेडकर मेरे लिए क्या मायने रखते हैं ' शीर्षक पर लेख आमन्त्रित हैं

 

Round Table India

बाबा साहिब के जीवन और उनकी उपलब्धियों को मनाने के लिए किसी ख़ास अवसर की ज़रूरत नहीं है, उनका उदय एक चेतना और जन-मानस के एक नैतिक लंगर के रूप में हुआ। एक संगीतमय परम्परा उनके जीवन के प्रतिपादन की जो उनके जन्म से शुरू होते हुए, महाड़ में अपना रूप लेते हुए, पूना पैक्ट, गोल मेज़ सम्मलेन, संविधान, उनकी यादों को और उनकी कई विरासतों को सहेजने में अग्रणी रहे। इसी जन संगीत ने आगे चल के कलाकारों, चित्रकारों, लेखकों एवं मूर्तिकारों को प्रेरित किया और नतीजतन एक जीवंत प्रतिपादन का निर्माण हुआ जन-इतिहासकारों द्वारा - पुरष एवं महिलाएं, युवा एवं वृद्ध, जिन्होंने न्याय, समानता,स्वतंत्रतता एवं बंधत्व जैसे मूल्यों के एक कालीन बुनी।

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एक समाज जो हर मोड़ पे वंचित किया गया, उसी वंचित समुदायों ने बाबा साहब की मूर्तियों और प्रतिमाओं के द्वारा सामाजिक क्षेत्र पे अपना दावा पेश किया। क्या हम ये सोच भी सकते हैं कि बाबा साहब के चेतना की पतली सड़क के किनारों पे और व्यस्त बाज़ारों में भौतिक अभिव्यक्ति हुयी ?किसी ने या कुछ लोगों के समूह ने वक़्त निकाल कर और साधन उत्पन्न कर के उस स्थान पर और ऐसे ही लाखों स्थानों पर उनकी उपस्थिति दर्ज की।

वह कौन लोग थे ? किस चीज़ ने उनको प्रेरित किया ,कैसे उन्होंने उसकी रचना की , किनसे उन्होंने परामर्श किया, उसको बनने में कितना वक़्त लगा ,उसकी रचना कर के उन्हें कैसी अनुभूति हुयी ? वह यह कैसे सुनिश्चित करते हैं कि किसी भी प्रकार के संरक्षण के आभाव में वह वहां कैसे उपस्थित रहें?

हमें एक और सवाल पूछना होगा - वह प्रतिमाएं एक स्थान पर किसी के द्वारा या किसी समूह के द्वारा कल्पना कर के पूरा करने से पहले वहाँ क्यों नहीं थी ? क्या उस ख़ास सामाजिक खेत्र में उस प्रतिमा की स्वीकिृति प्रत्याशित थी या उन्हें वहां टकराव का सामना करना पड़ा?

कौन है वो बेनाम लोग जिन्होंने यादों को सहेजने की योजना पर काम किया जो इतनी विशाल, इतनी विविध, इतनी विस्तृत थी जिसकी किसी और जन प्रयत्न से तुलना नहीं की जा सकती। आइये उनका उत्सव मनाएं।

कहा जाता है- "इतिहास एक बार घटना के रूप में अस्तित्व में आया और अब एक पाठ है" । क्या होता है जब इतिहास घटना और पथ हो एक साथ? उसका महत्व और भी बढ़ जाता है जब ये घटनाएं और पाठ दोनों दमित के हकों में निहित हो और सभी तरह के दमन को नष्ट करने का नजरिया बन रही हो? और कैसे ये इतिहास जो की कुलीन-वर्ग जो की इतिहास लेखक भी है, उसका विरोधी है, अपने आप को बचा रहा हो - विलोपन, लापता और विनियोग से।

कौन हैं वह अज्ञात प्रकाशक, पुस्तक वितरक, सरकारी कर्मचारी, जिन्होंने अलग अलग स्तिथियों, भाषाओँ और साधनों में सार्वजनिक सेवा की भावना के साथ बाबासाहेब अम्बेडकर के शाब्दिक विरासत को जंजा और प्रसारित किया? क्यों उन्होंने कड़ी मेहनत से सुनिश्चित किया की देश भर में तमाम पिछड़े लोगों, अन्याय से लध रहे सेनानियों तक बाबासाहेब की विचारधारा पहुंचे? हमें इस शानदार उपलब्धि का सम्मान करते हैं।

हाल ही में एक व्याख्यान में, जी एलॉयसियस कहते हैं, "अगर आप एक ही शब्द में अम्बेडकर के जीवन का वर्णन करना चाहते हैं, तो अम्बेडकर एक डेमोक्रेट थे। सही मायनों में डेमोक्रेट। और अपनी व्यवस्था निति की सोच के अंत तक वह एक डेमोक्रेट बने रहे। आप कई अन्य छोटी-मोटी बातों में उन में गलती खोज सकते हैं, लेकिन वह हर पहलू से एक डेमोक्रेट थे। और उनके लिए लोकतंत्र का मतब था जाति व्यवस्था का निराकरण और जाति का नाश ही पहला कदम था। वह वहां ही नहीं रुकते, पर फ़िलहाल तो पहला कदम ही पूरा होता नहीं दिख रहा है बल्कि हम उलटी दिशा में वापिस जा रहे हैं।"

इस १२५ वीं सालगिरह, बाबासाहेब को याद करते हुए, हम सभी को उनके मूल्यों और आदर्शों के लिए प्रतिबद्ध होना चाहिए, और पूरी तरह से जाति व्यवस्था मिटा एक मानवीय समाज की नींव बनाने हेतु अपनी भूमिका को गले लगन चाहिए। हमें उनकी विरासत का जश्न मनाने और एक समान दुनिया के लिए मेहनत कर रहे कार्यकर्ता के रूप में उनके अनुयायियों में शामिल होना चाहिए।

द शेयर्ड मिरर बाबा साहेब अम्बेडकर की १२५ वीं सालगिरह के जश्न में लेखकों को "बाबासाहेब अम्बेडकर का मेरे जीवन में आशय" के ऊपर अपना निबंध भेजने के लिए आमंत्रित करता है। कृपया अपना लेख एक वर्ड डॉक्यूमेंट में अधिकतम 1500 शब्दों में लिख उसे This email address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it. पर भेजें, ईमेल का सब्जेक्ट लिखें: 'बाबासाहेब अम्बेडकर का मेरे जीवन में आशय" पर लेख'।

Translated by Kanika Sori and Shashwat Vikram

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महिलाओं के उत्थान में बाबा साहब अम्बेडकर के योगदान को ध्यान में रखकर, बाबा साहब के इस जन्मोत्सव पर हमने बाबा साहब के जन्मदिन को कुछ अलग तरह से मनाने का निर्णय लिया है। बिना महिलाओं के योगदान के यह प्रयास अधूरा है । इसलिए "बाबा साहब अम्बेडकर मेरे लिए क्या मायने रखते हैं' शीर्षक पर महिला लेखकों के लेख आमन्त्रित हैं। जिसकी शब्द सीमा अधिकतम 1500 शब्द हैं । आप अपने लेख हमें This email address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it. पर भेजें । आपके लेखों और विचार का स्वागत है। धन्यवादl

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