विदेशों में बुद्ध और कबीर क्यों, राम और तुलसी क्यों नहीं?

 

संजय जोठे (Sanjay Jothe) 

सनातनी षड्यंत्रकार जब अध्यात्म और धर्म की व्याख्या करते हैं तब वे चर्चा और प्रचार के लिए अपने पवित्र पुरुषों को नहीं चुनते। वे उन्हें तहखानों में सुरक्षित रखते हैं। धर्म प्रचार शास्त्रार्थ आदि के लिए वे आदि शंकर या तुलसीदास को नहीं चुनते बल्कि वे बुद्ध, गोरख, रविदास और कबीर को चुनते हैं। मैं यहां आदि शंकर या तुलसी का अपमान नहीं कर रहा हूँ, जिन लोगों को उनकी शिक्षा और उनका अनुशासन अच्छा लगता है वे बेशक उसमे प्रसन्न रहें। उन्हें शुभकामनायें।

Tulsidas-JAyanti

लेकिन मजा ये है कि आधुनिक विज्ञान, विज्ञानवाद, आधुनिकता और पश्चिमी सभ्यता के सामने स्वयं को पिछड़ा और अन्धविश्वासी अनुभव करते हुए और उनका सामना करते हुए ये भारतीय पंडित और बाबा लोग शंकर या तुलसी को सामने नहीं करेंगे, वे बुद्ध और कबीर को सामने करेंगे, उनपर अपना दावा करेंगे। वही बुद्ध और कबीर - जिन्हें इन महानुभावों ने खुद ही मिटा डालना चाहा था अपनी जमीन पर।

ये ठीक वही चाल है जिसमे भक्तमंडली दंगों के समय दलितों आदिवासियों को लड़ने मरने के लिए आगे कर देती है। भारतीय दार्शनिक गुरु और साहित्यकार भी हमेशा से यही करते आये हैं। वे ग्लोबल आधुनिकता की लड़ाई में शंकर, तुलसी आदि को बचाकर रखेंगे और बुद्ध, कबीर, गोरख रविदास को आगे कर देंगे। फिर लड़ाई खत्म होते ही शंकर, तुलसी को वापस निकाल लेंगे और बुद्ध कबीर गोरख इत्यादि को फिर से इतिहास में दफन कर देंगे। ये पुरानी लीला है इस देश की। इसीलिये यहां कुछ नहीं बदलता। "यही बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी"। और जब पुराना मिटता नहीं तो नया बनता नहीं, और हम सुधरते नहीं।

पिछले सौ सालो का प्रतिशील भारतीय आध्यामिक साहित्य या हिंदी साहित्य देखिये। खासकर वो साहित्य जो पश्चिमी लोगों से सम्पर्क के बाद उनसे बराबरी करने के लिए लिखा गया है। उनके सामने महान बनने के लिए शंकर और तुलसी की बजाय बुद्ध और कबीर और संतों पर ही फोकस किया गया है और इन क्रांतिकारियों ने वैदिक पाखण्ड का जो विरोध किया है उसकी व्याख्या ऐसे की गयी है जैसे कि कबीर गोरख रविदास और बुद्ध भारत के मुख्यधारा के धर्म और धार्मिक विमर्श के वाहक हैं। इस तरह ये पश्चिमी समाज के सामने कबीर और बुद्ध की क्रान्ति की मशाल में अपने सनातन अंधकार को छुपाते रहे हैं।

और सत्तर के दशक तक आते आते तो हद्द ही हो गयी। ओशो और उनकी नकल मारने वाले बाबाओं ने तो बुद्ध और कबीर के मुंह से पूरा वेदांत ही बुलवा लिया। उसके बाद परिणाम सामने है। आजकल के जीवित बाबा बुद्ध और कबीर के संपूर्ण ब्राह्मणीकरण के प्रति इतने आश्वस्त हो गए हैं कि वे अब इनको बाईपास करके पतंजलि, आदियोगी सहित सीधे मिथकों को चर्चा में लाने लगे हैं। मिथकों के अन्धविश्वास की स्वीकृति का कुल मतलब ये है कि जनमानस से बुद्ध गोरख रविदास और कबीर पूरी तरह पोंछ डाले गए हैं। ये ओशो स्टाइल बाबाओं की गजब की सफलता है।

बुद्ध पुनर्जन्म, आत्मा, आत्म और परमात्मा को नकारते हैं लेकिन ओशो ने बुद्ध की व्याख्या करते हुए सम्यक स्मृति अर्थात सम्मासति को आत्मस्मरण कहा जो एकदम गलत अनुवाद है। बुद्ध के शून्य और शंकर के पूर्ण को एक ही कहा जो सरासर साजिश है। असल में पश्चिम के सामने भारत की सामाजिक नैतिकता और धर्म बहुत दरिद्र नजर आते हैं। ऐसे में पश्चिम के सामने स्वयं को महान साबित करने का भारतीय बाबाओं के पास एक ही उपाय है और वो हैं बुद्ध। इसीलिये भारत के राजनेता और बाबा लोग पश्चिम में बुद्ध का नाम जपते हैं और भारत लौटते ही वेदांत गाने लगते हैं।

इस षड्यंत्र को समझना होगा हमें।

जिन मित्रों को भारत के लिए नए धर्म की प्रस्तावना में थोड़ी भी रूचि हो वे इस चर्चा को खूब फैलाएं।

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संजय जोठे फोर्ड फाउंडेशन इंटरनेशनल फेलो हैं और लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेेश से हैं। समाज कार्य में देवी अहिल्या विश्वविद्यालय से एम् ए के बाद ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतरराष्ट्रीय विकास में M.A. हैं और वर्तमान में TISS मुम्बई से पीएचडी कर रहे हैं। सामाजिक विकास के मुद्दों सहित पर पिछले 14 वर्षों से विभिन्न संस्थाओं के साथ कार्यरत है। ज्योतिबा फुले पर इनकी एक किताब प्रकाशित हो चुकी है, और एक अन्य किताब प्रकाशनाधीन है। विभिन्न पत्र पत्रिकाओं और ब्लॉग्स में बहुजन समाज और दलित विमर्श के मुद्दों पर शोध आधारित लेखन में संलग्न हैं।

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