भारत में महिला राजनीति पर जातिवाद का कितना प्रभाव

 

Sweta Yadav 

sweta yadavभारत विभिन्ताओं का देश है| तरह-तरह की बोलियाँ अलग-अलग संस्कृतियाँ, जाति, धर्म सम्प्रदाय में बंटा हुआ देश | जिसके बारे में किसी ने सही ही कहा है "कोस -कोस पर बदले पानी चार कोस पर वाणी|" जाति भारत का वास्तविक सच है जिसे अनदेखा करके भारत की कल्पना बेमानी है| भारत में जाति व्यवस्था वैदिक काल से ही व्याप्त है जिसने न सिर्फ यहाँ की आर्थिक, सामाजिक और धार्मिक प्रवृतियों को प्रभावित किया अपितु भारत की राजनीति को भी जाति व्यवस्था ने अपनी जड़ में ले लिया| आज हालत यह है की भारत में न सिर्फ केंद्र बल्कि राज्य भी जातिवाद की राजनीति से प्रभावित हैं| हम चाहे जितना मर्जी वहम पाल लें कि हमारे समाज में भेदभाव कम हो गया है, लेकिन अब भी कुछ अदृश्य दीवारें हैं जो दिखाई नहीं देतीं लेकिन मौजूद हैं और इन्ही दीवारों के नीचे दब कर न जाने कितनी जिंदगियां दम तोड़ देती हैं, और ये सिलसिला अभी भी जारी है|

भारतीय राजनीति में महिलाओं के अस्तित्व पर बात करते हुए हमें यह देखना होगा कि क्या वास्तव में महिलाएं राजनीति में वो मुकाम हासिल कर चुकी हैं जो उन्हें एक मनुष्य होने के नाते करना चाहिए था न कि स्त्री होने के नाते| भारतीय समाज पितृसत्तात्मक समाज हैं जहाँ पुरुषों का वर्चस्व कल भी था और अब भी है| हाँ बदलाव हुए हैं और यह होना भी चाहिए लेकिन यह कितना और कहाँ तक हुआ है यह देखना भी जरूरी है| आज़ादी के बाद देश जबकि सोलहवें लोकसभा के चुनाव लड़ चुका है तब इस बात की चर्चा और भी जरूरी हो जाती है कि देश में हर पायदान पर महिलाओं की स्थिति क्या है? और राजनीतिक सम्बन्ध में महिला की जाति किस तरह से काम करती है?

भारत में महिलाओं की राजनीतिक सहभागिता के बहुत सारे आयाम हैं। एक पक्ष जो महिला को लिंग के आधार पर देखता है जो यह प्रयास करता है कि वह भारत के सम्पूर्ण महिला समुदाय को साथ लेकर चलना चाहता है। परन्तु महिलाओं से जुड़ी वास्तविक समस्याओं को देखने पर पता चलता है कि महिलाओं की राजनीतिक सहभागिता भी पुरुषवाद के वर्चस्व को बनाये रखने के लिए किया गया एक प्रयास है। हम कुछ महिलाओं को छोड़ दें तो तस्वीर कुछ साफ़ हो करके उभरती है जिससे यह पता चलता है की महिलाओं की सहभागिता भी मात्र महिला वोट बैंक को छलने का एक प्रयास है। बदलते राजनीतिक परिदृश्य में राजनीति का स्वभाव और रूप दोनों बदला है ऐसे में अब पार्टियाँ उन प्रत्याशियों को भी टिकट देने से नहीं हिचकिचाती जो की महिला मुद्दों को लेकर असम्वेदनशील हैं और उनकी दृष्टि में महिला अभी भी दोयम दर्जे की नागरिक है। अब जब की चुनाव पैसे और शक्ति प्रदर्शन का माध्यम बन गया है ऐसे में उसी महिला को पार्टियाँ टिकट देना चाहती हैं जो चुनावी खर्चे का इंतजाम कर सकें और जीत सकें। अक्सर महिलाओं को ऐसे निर्वाचन क्षेत्र से खड़ा किया जाता है जहाँ से उनके जीतने की संभावना कम हो । इस तरह से उनके दोनों स्वार्थ सिद्ध होते हैं। वो यह भी दर्शाने में कामयाब होते हैं कि महिलाओं की भागीदारी को लेकर वो कितने सचेत हैं परन्तु महिलाएं राजनीति में कमतर हैं।

हमारा समाज महिलाओं को एक खांचे में देखने का अभ्यस्त है| घर-परिवार की जड़ से बाहर निकलती महिलायें चाहे वह कोई कामकाजी महिला हो या फिर किसी पार्टी की राजनेता अभी भी उस सम्मान को पा नहीं सकी है जिसकी वो अधिकारी है| ऐसे में भाजपा के नेता दयाशंकर का बसपा सुप्रीमो मायावती पर दिया गया हालिया बयान "कि वो वेश्या नहीं वेश्या से भी बदतर है" भूलवश बोली गई कोई बात नहीं बल्कि इस समाज की महिलाओं के प्रति जड़ता की कहानी बयान करता है | एक व्याख्यान के वक्त बोलते हुए वरिष्ठ पत्रकार अनिल चमड़िया जी ने सही ही कहा था कि अगर जेनयू की छात्राओं को वेश्या कहने की छूट दी जायेगी तो किसी भी महिला चाहे वह राजनेता ही क्यों ना हो वह इस तरह के हमले से बच नहीं सकती| लेकिन जाति के स्तर पर देखें तो जितना मजाक दलित बहुजन स्त्रियों का बनाया गया है उतना किसी सवर्ण महिला राजनेता का नहीं बना है| बिहार में जब लालू यादव की पत्नी राबड़ी देवी मुख्यमंत्री बनी तो याद करिए कितने चुटकुले उन पर बनाये गए| और आज भी वह चुटकुले कायम हैं|

भारत में बहुत सारी महिलायें अभी तक विभिन्न दलों में राजनेता के रूप में कार्य कर रही हैं| जिनमें सुषमा स्वराज, जयललिता, इंदिरागांधी, मायावती, ममता बनर्जी, उमा भारती इत्यादि नाम लिए जा सकते हैं| लेकिन जब जाति के सन्दर्भ में देखें तो लोग मायावती की जाति पर तो बात करते हैं और कहते हैं कि वो जातिवादी कार्ड खेलती हैं लेकिन उमा भारती की जाति पर कोई बात नहीं करता| दोनों

के सम्बन्ध में सबसे बड़ा अंतर यह है कि एक उत्तरप्रदेश जैसे बड़े प्रदेश की कई बार मुख्यमंत्री रह चुकी हैं और पार्टी प्रमुख भी हैं तो दूसरी भाजपा की नेत्री|

देखा जाए तो राजनीति में महिलाओं का अपना स्वयं का योगदान बहुत कम रहा है हर महिला राजनेता के पीछे किसी ना किसी पुरुष राजनेता का नाम लिया जाता है जैसे मायावती को आगे बढाने में कांशीराम जी का योगदान ...सुमित्रा महाजन को आगे बढ़ाने में लालकृष्ण आडवानी और अटल बिहारी वाजपेयी, और स्मृति इरानी के पीछे नरेंद्र मोदी और अन्य का जिक्र आता है| राजनीति किसी भी समाज का महत्वपूर्ण हिस्सा है इसके बिना किसी समाज की कल्पना बेमानी है| लेकिन जो समाज हजारों रूपों में बंटा हो वहां कौन राजनीति कर रहा है और किस पद पर है इसका बहुत फर्क पड़ता है| यह मायावती के संदर्भ में भी समझा जा सकता है| उन्होंने दलित- बहुजन से जुड़े लगभग हर मसले पर अपनी बात रखी है| फिर चाहे वह आरक्षण का मुद्दा हो या फिर हालिया रोहित वेमुला मामला| संसद में एक मायावती के अलावा किस महिला सांसद ने रोहित वेमुला के पक्ष में आवाज़ उठाई यह देखने योग्य बात है| उनके सवालों से तत्कालीन मानव संसाधन मंत्री स्मृति इरानी को हाई प्रोफाइल ड्रामा अपनाना पड़ा| उन्होंने यहां तक कह दिया कि अगर मायावती मेरे बयान से संतुष्ट नहीं होती तो मैं अपना सिर काट कर दे दूंगी | खैर वह भी एक जुमला निकला, जुमलेबाज सरकार की तरह|

बिहार और उत्तरप्रदेश जिसे पिछड़ा प्रदेश के नाम से भी जाना जाता है वहां महिलाओं की राजनीति में भागीदारी बाकी प्रदेशों की अपेक्षाकृत ज्यादा संतोषजनक है| यही नहीं क्षेत्रीय पार्टियों में महिलाओं की भागीदारी कांग्रेस और भाजपा जैसी बड़ी पार्टियों से कहीं ज्यादा है| अनुप्रिया पटेल जब भाजपा में शामिल होती हैं तो वह इसी आधार पर होता है कि वह पटेल वर्ग को अपने साथ भाजपा की तरफ ले आएँगी|

अभी तक राजनीति में आगे आने वाली महिलाओं में गुयाना की पहली महिला राष्ट्रपति और पीपुल्स प्रोग्रेसिव पार्टी की पहली महिला प्रधानमंत्री जेनेट जगन, इजरायल की प्रधानमंत्री गोल्डा मीर, भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी, फिलिपीन की राष्ट्रपति ग्लोरिया मकापगाल आरोयो, पाकिस्तान की प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो, म्यांमा की आंग सान सू की, विश्व की पहली महिला राष्ट्रपति लाइबीरिया की एलेन जानसन सिरलीफ के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। मारग्रेट थैचर यूरोप के किसी भी देश की पहली महिला प्रधानमंत्री थीं। ब्रिटेन में अब भले दूसरी महिला प्रधानमंत्री है, पर वह अब भी यूरोप की राजनीति में आगे आई महिलाओं की सूची में काफी नीचे हैं। संसद में नेता होने के संबंध में अलग-अलग देशों में अलग-अलग जिम्मेदारियां हैं। ब्रिटेन में मे और जर्मनी में मर्केल सबसे अधिक शक्तिशाली नेता होने जा रही हैं। पिछली सदी के आखिरी दशक में फ्रांस की प्रधानमंत्री एडिथ के्रसों के हाथों में वहां के राष्ट्रपति की अपेक्षा कम जिम्मेदारियां थीं।

भारत के परिपेक्ष्य में आज़ादी से लेकर अगर अब तक देखा जाए तो महिलाओं का योगदान कुछ यूँ रहा है| सरोजनी नायडू के नेतृत्व में 1917 में महिलाओं का एक दल भारत मंत्री एडविन मांटेग्यू से मिला और महिलाओं को मत देने के अधिकार की मांग की। बम्बई और मद्रास पहले प्रान्त थे जिन्होंने 1919 में महिलाओं को मताधिकार प्रदान किया । इससे पहले सभी प्रान्तों द्वारा इसकी उपेक्षा की गई। स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं की सहभागिता ने महिलाओं को यह अवसर प्रदान किया की वे अपने समानता के आन्दोलन को और मुखर कर सकें। 1917 में एनी बेसेंट का कांग्रेस का प्रथम महिला अध्यक्ष बनना 1925 में सरोजनी नायडू ,1935 में नलिनी सेन गुप्ता का अध्यक्ष बनना समानता की एक शुरुआत थी। इन्ही प्रयासों के फलस्वरूप स्वतंत्रता पश्चात् जब भारत का संविधान निर्मित होने लगा तब महिलाओं को बहुत सारे अधिकार मिले। यह महज संयोग है कि वर्ष 1975 को अंतर्राष्ट्रीय महिला वर्ष घोषित करने और उसके एक दशक तक विस्तार की घोषणा के साथ ही देश आपातकाल की स्थिति में फंस गया। उस समय की सरकार द्वारा उठाये गए इस कदम ने लोकतान्त्रिक व्यवस्था को आघात पहुँचाया और देश में उभरते हुए महिला आन्दोलन को अवरूद्ध कर दिया। 1981 में देश में नारी

अध्ययन पर प्रथम राष्ट्रीय सम्मलेन हुआ था जिसने इस बात को साफ़ कर दिया कि नारी विषयक शोध सिर्फ नारी विषयक सूचनाओं तक ही सीमित नहीं होने चाहिए बल्कि इसका सामाजिक और शैक्षणिक तथा राजनैतिक सरोकार भी होना चाहिए।

अभी तक भारतीय राजनीति में किसी महिला का प्रधानमंत्री पद तक पहुंचना देखा जाए तो वह सिर्फ इंदिरागांधी थी जो प्रधानमंत्री पद तक पहुँच सकीं | लेकिन यहाँ यह देखना भी लाज़मी है कि इंदिरागांधी की पारिवारिक पृष्ठभूमि क्या थी उनके पिता जवाहरलाल नेहरू देश के पहले प्रधानमंत्री थे और कांग्रेस आज़ादी के समय से ही देश में सक्रिय एकमात्र राजनीतिक पार्टी जो लम्बे समय तक न सिर्फ शासन सत्ता में बनी रही बल्कि भारतीय आम जनमानस पर उसका प्रभाव लम्बे समय तक बना रहा | इंदिरागांधी जवाहरलाल नेहरु की इकलौती संतान थी इसकी वजह से नेहरु कि घोषित उत्तराधिकारी भी .. सोचिये क्या अगर नेहरू के कोई और संतान होती और वह भी पुत्र... तो इंदिरागांधी क्या कभी नेहरु का उत्तराधिकारी बन पातीं शायद नहीं! इंदिरा गांधी ने जब बांग्लादेश के युद्ध में जीत हासिल की तो उन्हें अटल बिहारी वाजपेयी ने दुर्गा का अवतार घोषित किया | मीरा कुमार लोकसभा स्पीकर और कांग्रेस का एक बड़ा दलित चेहरा जिसे कांग्रेस ने अपनी पार्टी में उनकी अपनी छवि के चलते नहीं बल्कि उनके पिता जगजीवन राम की वजह से रखा| इससे कांग्रेस ने दो काम सिद्ध किये एक तो दलित कार्ड भुनाया दूसरे अपने गले कि हड्डी बन चुके जगजीवन राम को भी शांत किया| इतिहास के पन्नों को पलटिये तो आप पायेंगे की अभद्र टिप्पणियां सबसे ज्यादा उन महिला राजनेताओं पर हुई हैं जो दलित अथवा बहुजन समाज से आती हैं| फूलनदेवी और भगवतिया देवी ने अपने अनुभव को बाँटते हुए लगभग एक जैसी बातें ही कहीं थी कि पुरुष तो छोड़ दीजिये स्त्रियाँ भी अच्छा बर्ताव नहीं करतीं| हमारा समाज अभी महिला पुरुष के भेदभाव से ऊपर नहीं उठ पाया है तिस पर सोने पर सुहागा जाति साथ-साथ चलती है| जिस समाज का सबसे घिनौना सच जाति है वहां कि राजनीति इससे अछूती कैसे रह सकती है| लेकिन मजेदार बात यहाँ भी यही देखने में आती है कि राजनीति में भी टिप्पणियां जाति और वर्ग देखकर की जाती हैं| और अलग-अलग पार्टियाँ अपनी महिला उम्मीदवारों और राजनेताओं को उनके जाति के आधार पर वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल करती हैं| महिलाओं को अगर राजनीति में अपने बल पर कुछ करना है तो सबसे पहले उन्हें उस पुरुष वर्चस्व को तोड़ना होगा जो आज भी महिला राजनेताओं के साथ चलता है कि हर महिला राजनेता के पीछे किसी न किसी पुरुष राजनेता का हाथ है इस वर्चस्व के टूटने के उपरान्त ही जाति, धर्म की मान्यताओं में जकड़ी महिला राजनीति का विकास संभव है| इस वर्चस्व को तोड़कर काम करने वाली महिला राजनेताओं की अगर हम बात करें तो अभी की राजनीति में सिर्फ एक ही नाम मायावती का दीखता है उसके अलावा आज के सन्दर्भ में कोई भी महिला राजनेता दिखाई नहीं पड़ती जो अपने दम पर राजनीति में लम्बे समय तक टिकी हो|

~

1. भारतीय समाज में महिलायें (लेखिका- नीरा देसाई एवं उषा ठक्कर, अनुवाद- सुभी धुसिया, प्रकाशन- एनबीटी, 2008)
2. राजनीतिः पश्चिम का स्त्रीवाची चेहरा जनसत्ता 26 अगस्त 2016
3. भारतीय समाज में महिलायें (लेखिका- नीरा देसाई एवं उषा ठक्कर, अनुवाद- सुभी धुसिया, प्रकाशन- एनबीटी, 2008)

~~~

 

Sweta Yadav is a writer and is part of the editorial team of Hindi Round Table India. 

Other Related Articles

"भीम आर्मी" का प्रदर्शन: मीडिया का मुंडन
Friday, 26 May 2017
  सुरेश जोगेश (Suresh Jogesh) सुबह से भीड़ जमा होनी शुरू हो गयी थी जंतर-मंतर पर. देखते... Read More...
Teri Zameen Tera Aasman - World Premiere of Documentary Film on Women
Thursday, 27 April 2017
  Round Table India  World Premiere Film Screening of TERI ZAMEEN TERA AASMAAN: Bhartiya Nari! Tu Aazaad Kahaan?(Your Earth Your Sky: O Indian Woman! Where thou art free?) ~   This... Read More...
Interview with Dr Manisha Bangar on Current Issues & the Mulnivasi Bahujan movement
Wednesday, 22 March 2017
  Round Table India In this episode of the Ambedkar Age series, Round Table India talks to Dr Manisha Bangar, Vice President, BAMCEF. In the interview, Dr Manisha Bangar talks about a wide... Read More...
Brahmin Feminism sans Brahmin Patriarch
Monday, 06 February 2017
  Kanika S It has almost become common sense that feminism has been shaped exclusively by a class of women that came from Brahmin-Savarna castes in India, to the extent that even trashy... Read More...
Will you let the subaltern speak?
Thursday, 07 July 2016
  Tejas Harad When Rahul Pandita, a Brahmin, writes about Naxalism, does his scholarship benefit the Adivasis for whom Naxalism is a lived reality or does it benefit Pandita himself? When Anand... Read More...

Recent Popular Articles

"भीम आर्मी" का प्रदर्शन: मीडिया का मुंडन
Friday, 26 May 2017
  सुरेश जोगेश (Suresh Jogesh) सुबह से भीड़ जमा होनी शुरू हो गयी थी जंतर-मंतर पर. देखते... Read More...