जाति पाति: आदर्श और हक़ीकत (पंजाब के सन्दर्भ में)

 
Sardar Ajmer Singh (सरदार अजमेर सिंह)

(यह आलेख आज़ाद भारत के पंजाब प्रांत में दलित/पछड़ा वर्ग एवं सिख के 'हम हिंदू नहीं' दृष्टिकोण का ब्राह्मणवादी आर्य समाज और इसके पोषक बन गए राजनीतिक दलों के बरक्स जो भी हुआ है, उसका ऐतिहासिक विवरण है। पंजाब की राजनीति को देखने, समझने और परखने का, पाठकों को, यह आलेख बढ़िया मौका प्रदान करता है। सरदार अजमेर सिंह द्वारा लिखी यह रचना उनकी पंजाबी में लिखी बहुचर्चित किताब 'बीसवीं सदी की सिख राजनीति - एक ग़ुलामी से दूसरी ग़ुलामी' से ली गई है, एवं अनुदित है - गुरिंदर आज़ाद [अनुवादक])
s ajmer singh
बेशक़ गुरु साहेबान (सिख गुरु) ने हिन्दू समाज की सबसे बड़ी लाहनत, जाति पाति प्रणाली का, सिद्धांत और अमल के स्तर पर ज़ोरदार खंडन करते हुए, सिख समाज में इसकी पूरी तरह से मनाही कर दी थी। गुरु काल के बाद धीरे धीरे सिखी के बुनियादी सिद्धांत कमज़ोर पड़ने शुरू हो गए। जिन हिंदूवादी अभ्यासों का गुरु साहेबान ने खंडन किया था, उन्होंने सिख धर्म और समाज को फिर से अपने क़ातिलाना शिकंजे में ले लिया। हिन्दूवाद के दुष्प्रभावों का सबसे गाढ़ा इज़हार सिख पंथ में जात पात प्रणाली की फिर से अमल के रूप में हुआ। ऐसे अनेक ऐतिहासिक प्रमाण और हवाले मिलते हैं जो उनीसवीं सदी तक सिख पंथ के फिर से जात-पात प्रबंध की मुकम्मल जकड़ में आ जाने की पुष्टि करते हैं। 

उनीसवीं सदी के दुसरे अर्ध दौरान बेशक़ सिंह सभा लहर द्वारा आरंभ सुधारमुखी गतिविधियों ने सिख समाज को हिंदूवादी प्रभावों से मुक्त करने में कुछ काबिले-तारीफ़ सफलताएं हांसिल की। लेकिन जात-पात का कोढ़ सिख समाज में इस कदर फ़ैल चुका था कि 'सिंघ सभा लहर' के आगूओं की इंक़लाबी कोशिशों के बावजूद सिख पंथ इस नामुराद रोग के असरों से मुक्त न हो सका। फिर भी सिंह सभा लहर द्वारा सिखी के मूल सिद्धान्तों और मौलिक परम्पराओं की फिर से स्थापति के लिए चलाई वैचारिक मुहीम का इतना असर ज़रूर हुआ कि पंथ के रौशन ख्याल हिस्सों में जात-पात को ख़त्म करने ले लिए न्या जोश और उत्साह पैदा हो गया और उन्होंने सिख समाज को इस हिंदूवादी लाहनत से जुदा करने के लिए तीखी वैचारिक मुहीम शुरू कर दी। नतीजतन, सिख पंथ में जात-पात की खुली तारीफ करने वाले तत्व, खासतौर पर सिखी में, ब्राह्मणवादी खोट मिलाने वाला मुख्य वाहक बना। महंत-पुजारी 'परिवार' सिखी सुधार लहर के हमले की सीधी मार तले आ गया और सिख पंथ के धार्मिक केंद्रों और अभ्यासों में जात-पातिए भेदभाव का खुला प्रदर्शन पहले जितना आम नहीं रहा। पर जहाँ तक आम सामाजिक जीवन का संबंध है, वहां जात पातिए भेदभाव और बाँट-अलगता जैसे की तैसी बरकरार रही। खासतौर पर ग्रामीण समाज में कथित ऊँची जात वर्गों के 'नीच' और 'अछूत' समझे जाते वर्गों के प्रति जातिय अभिमानी तरीकों और बर्ताव में कोई कमी नहीं आई। 

सच यह था कि सिख पंथ में से ब्राह्मण वर्ग जिस्मानी तौर पर भले ही गायब हो चुका था लेकिन सोच के स्तर पर वह सिख समाज में ज्यों का त्यों हाज़िर-नाज़िर था। रोज़मर्रा ज़िन्दगी में जात पातिए भेदभाव और विरोध-अलगता के हिसाब से हिन्दू और सिख समाज में कोई मूलभूत अंतर नहीं रहा। हाँ, गुरु साहेबान की इंक़लाबी विचारधारा की प्रेरणा और प्रभाव तले सिख लहर द्वारा अपने आरंभिक दौर में पूरे किये इंक़लाबी कार्यों की बदौलत सिख समाज में जात पातिए दर्जाबंदी की बुन-बनावट में ज़रूर बड़ा बदलाव आ गया था। जहाँ हिन्दू समाज में ब्राह्मण वर्ग का समाजी दर्जा सब से ऊँचा  माना जाता है, वहां सिख समाज में धार्मिक और सामाजिक क्षेत्र में ब्राह्मण वर्ग के प्रभुत्व को पूरी तरह से नकारा है। 
ajmer singhs book
लेकिन समय पड़ने से जैसे ही सिख समाज फिर से जात पातिए प्रणाली की जकड़ में आ गया तो वह वर्ग जिन्होंने खालसा पंथ के इंक़लाबी दौर में ज़्यादा गतिशील भूमिका निभाने का नाम कमाया था और जिन्हें रिवायती हिन्दू जात पातिए दर्जाबंदी में ब्राह्मण वर्ग से एक या दो दर्ज नीचे समझा जाता था, वह सिख समाज में ऊँचा सामाजिक दर्जा हासिल कर गए। इस तरह, ग्रामीण सिख समाज में जट्ट वर्ग ने और शहरी सिख समाज में खत्री-अरोड़ा वर्ग ने 'सवर्ण जातियों' वाला सामाजिक रुतबा हासिल कर लिया जबकि जात पात की जकड़ में आये वर्गों का पहले वाला दर्जा ही बरक़रार रहा। 'पछड़ी' समझी जाने वाली और अन्य जातियों के सामाजिक दर्जे में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया। इस सामाजिक यथार्थ की राजनीतिक क्षेत्र में परछाईं पड़नी स्वाभाविक थी। ख़ास तौर पर ग्रामीण क्षेत्र में यह बात ज़्यादा चुभनिए रूप में सामने आई। 

गाँव की ग्रामीण ज़िन्दगी की सामाजिक एवं आर्थिक हक़ीक़त यह है कि ग्रामीण दलित वर्ग ज़मीन जायदाद से वंचित, सामाजिक तौर पर सबसे ज़्यादा लताड़ा हुआ, तीखी आर्थिक लूट-खसोट और चुभनिए सामाजिक ज़बर और दबाव का शिकार है। उसकी ज़िन्दगी में हिन्दू सवर्ण जातियों का बहुत सीधा दख़ल नहीं। खेती में मेहनत मज़दूरी करते और ग्रांव में आम जीवन बसर करते उसका ज़्यादातर सीधा वास्ता जट्ट से ही पड़ता है। इस तरह आर्थिक लूट-खसोट और सामाजिक ज़बर, दोनों ही पक्षों से उसका तुरंत विरोध जट्ट किसान से ही है। इस में सीधे रूप में हिन्दू सवर्ण जातियां कहीं भी नहीं आतीं (सिवा ग्रामीण बनिए के, जो दलित वर्ग की आर्थिक मजबूरियों का फायदा उठा के सूदखोरी आदि के ज़रिये उसकी आर्थिक लूट-खसोट में सहभागी बनता है). सो, यह सामाजिक आर्थिक फैक्टर ग्रामीण दलित वर्ग को राजनीतिक तौर पर अकाली दल जिसे कि ग्रामीण क्षेत्र में जट्ट किसानों की राजनीतिक जमात के रूप में ही पहचाना जाता है, के विरोध की तरफ धकेलते हैं। दूसरी तरफ, समूचे भारत में दलित वर्ग, जैसे पंजाब का दलित भाईचारा, भी कोंग्रेस पार्टी को अपना हितैषी पक्ष के रूप में देखता है। उसकी यह धारणा कई पक्षों के मिलेजुले प्रभाव का नतीजा है। 
 
सब से बड़ी बात यह है कि मोहन दास कर्मचंद गाँधी ने आज के इतिहास में छुआछूत विरुद्ध तीखी लड़ाई शुरू करने और भारत में युगों युगों से मानवीय हक़ों से वंचित किये हुए कर्मों के मारे करोड़ों जनों को भारतीय समाज और राज्य में बराबरी के मानवीय अधिकार उपलब्ध कराने का 'पूण्य' कमा के दलित वर्गों के सर पर अहसानों का कर्ज़ चढ़ा दिया कि कोंग्रेसी लीडर पचास सालों तक निरंतर इस कर्ज़े का सूद वसूल करते आ रहे हैं। कांग्रेस पार्टी की तरफ से दलित वर्ग को सरकारी नौकरियों से ले कर चुने हुए महकमों तक आरक्षण की सहूलियत और ऐसी ही और रियायतें देने से इस वर्ग की कांग्रेस पार्टी से सांझ और पक्की हो गई। इस के उलट, सिंह सभा लहर द्वारा शुरू सिखी सुधार लहर का यश घट जाने के बाद सिख लीडरों ने जात पात के खात्मे के कार्य को लगभग नज़रअंदाज़ ही कर दिया। भारत की आज़ादी के संग्राम के दौरान सिख लीडरों की तरफ से दलित वर्ग के हितों की पैरवी की शायद ही कोई उत्साहित उदहारण मिलती हो। आज़ादी के बाद बेशक़ अकाली लीडरों ने कांग्रेस पार्टी की दलित वर्ग को रिजर्वेशन देने जैसी नीतियों का खुल्लम-खुल्ला विरोध तो नहीं किया पर सिख समाज के अंदर ही कथित उच्च जातियां की इस मसले पर असली भावनाएं कभी भी गुप्त नहीं रहीं। उनकी जात-पातिए भड़ास अक्सर तहज़ीब की हदें पर पार करतीं और दलित संवेदना को रह रह कर घायल करती रहीं। इस से दलित वर्ग, डर और असुरक्षा की भावना से, कांग्रेस पार्टी का और ज़्यादा आसरा क़ुबूल करने की और धकेला जाता रहा। 

1966 में पंजाब के पुनर्गठन के बाद अकाली दल को राजनीतिक सत्ता की और बढ़ता देखके पंजाब का दलित वर्ग, ख़ास तौर पर इसके भीतरी ग़ैर-सिख हिस्से अपने आप को खतरे के मुहँ में आया महसूस करने लगे। इसी दौरान आर्थिक तौर पर ज़्यादा मालामाल और राजनीतिक तौर पर अधिक बलशाली हुए धनाढ्य किसान वर्ग में अहंकार का पारा ओर ऊँचा चढ़ चला और 'हरे इंक़लाब' के आरंभिक वर्षों दौरान गाँवों में जट्टों द्वारा दलितों की नाकाबंदी की घटनाएं आम हो गईं।  इस तरह पंजाब के ग्रामीण क्षेत्र में जाति-पाति की लकीरों पर राजनीतिक धड़ेबंदी का रुझान और बल पकड़ गया जो अकाली दल के लिए एक बेहद घाटे वाली और कांग्रेस पार्टी के लिए बड़े राजनीतिक फायदे वाली बात थी। 

इसलिए, पंजाब में राजनीतिक सत्ता के ऊपर काबिज़ होने के लिए अपने सामाजिक आधार को ज़्यादा खुला करना और अपनी राजनीतिक हिमायत के घेरे को और ज़्यादा वर्गों तक फैलाना अकाली दल की यकदम राजनीतिक ज़रुरत थी। इसके लिए सचेतन सुघड़ रणनीति घड़ने और फिर उसका दृढ़तापूर्वक पालन और पैरवी करने का काम अकाली लीडरशिप का सब से अहम और तुरंत सरोकार वाला काम बनना चाहिए था। सचेत स्तर पर रणनीति घड़ने का मतलब था कि सिख धर्म के बुनियादी सिद्धांतों को मद्देनज़र रखते हुए अकाली दल के दूरअंदेशी उद्देश्यों और तुरंत करने वाले कार्यों में जंचने वाला तालमेल बिठाया जाता और सिद्धांतों पर अडिग रहते हुए राजनीतिक दावपेंचों के मामले में उपयुक्त लचक लाकर राजनीतिक पैंतरेबाज़ी का आकर्षक मॉडल ले करके आया जाता। ऐसा करने से पहले सबसे पहले ज़रुरत (और शर्त) यह थी कि सिख राजनीति के सामने इस गंभीर चुनौती को सचेतन क़ुबूल किया जाता और पैदा हुए नए हालातों और समस्याओं के सामने अकाली राजनीति की दरुस्त मार्ग-दिशा तय करने के लिए बौद्धिक स्तर पर गहरे एवं गंभीर यतन किये जाते। 

लेकिन अकाली लीडरशिप या सिख बुद्धिजीवियों के स्तर पर ऐसा कोई सचेतन यतन किया हुआ नज़र नहीं आता। इस महत्वपूर्ण मसले के बारे में अकाली दल या  उसके अंदर गंभीर विचार -चर्चा छूने और विचार मंथन के ज़रिये सही निर्णय पर पहुँचने का, किसी भी तरफ से, कोई संजीदा कोशिश नहीं हुई। लेकिन समस्या क्योंकि ख़्याली नहीं बल्कि हक़ीक़त में थी और राजनीति की ज़रूरतें इसके तुरंत हल की मांग करती थीं, इस लिए इसे बिना गहरी सोच-विचार के, मौके पर जैसे और जो ठीक लगा वैसे हल कर लेने की अटकलपच्चू (random) पहुँच अपना ली गई। गहरी और गंभीर मसलों के प्रति अपनाई ऐसी बेकायदा पहुँच पर विवेक के मुक़ाबले अंतरप्रेरणा (instinct and/ or intuition) का तत्व ज़्यादा हावी हो गुज़रता है और फैसले लेते समय अक्सर दूरगामी उद्देश्यों और निशानों के मुक़ाबले सामने पड़े मतलब ज़्यादा वज़नदार हो जाते हैं। अकाली दल के मामले में ठीक यही बात हुई। 

पंजाब में कांग्रेस पार्टी सिख पंथ की अव्वल दुश्मन और अकाली दल की मुख्य विरोधी है। सही अर्थों में बात करनी हो तो पंजाब में सिख पंथ की असली दुश्मन ताक़त आर्य समाजी वर्ग था जो पंजाब के लगभग समूचे हिन्दू भाईचार को अपनी सांप्रदायिक विचारधारा मिलावटीपन चढ़ाने और अपनी सांप्रदायिक चालबाज़ी के गिर्द लामबंद करने में कमाल की हद तक सफल हो गया था। दरअसल पंजाब में कांग्रेस पार्टी आर्य समाज के एक राजनितिक विंग विचर रही रही। पंजाबी हिंदू वर्ग की असली वचनबद्धता आर्य समाजी विचारधारा से है और कांग्रेस पार्टी उसके लिए एक 'फ्रंट जत्थेबंदी' से ज़्यादा और कोई अहमियद नहीं रखती। पंजाब के हिंदू वर्ग और कांग्रेस पार्टी के आपसी संबंधों को समझने के लिए यह तथ्य बहुत ही महत्वपूर्ण है। 

यह कहना कि कांग्रेस पार्टी पंजाब के हिंदू वर्ग को बरगला रही है या अपने संकुचित राजनीतिक उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल कर रही थी या है, सच्चाई को बिगड़े हुए रूप में देखना है। सिख पंथ के संबंध में पंजाबी हिंदू तबके और कांग्रेसी लीडरशिप की बुनियादी पहुँच में कोई टकराव नहीं। दोनों ही हिंदू मत को एक बानगी मानके चलते हैं। दोनों ही सिख धर्म को हिन्दू समाज में जज़्ब कर लेने के सांझे उदेश्य पर पहरा देते हैं। सो, इस दृष्टि से दोनों ही सिख कौम के प्रति बराबर दुर्भावना रखते हैं। भारत की आज़ादी की लड़ाई के दौरान पंजाबी हिंदू वर्ग के बड़े हिस्से राजनीतिक तौर पर कांग्रेस पार्टी से जुड़े होने के बावजूद गाँधी की विचारधारा से आर्य समाजी विचारधारा के ज़्यादा प्रभाव तले थे। लाल लाजपत राय से लेकर जगत नारायण तक, सभी आर्य समाजी 'परिवार' की सोच पर सांप्रदायिकता का एक-सामान गाढ़ा रंग चढ़ रखा था। भारत के बंटवारे से पहले सांप्रदायिकता की यह धारा मुख्य रूप से मुस्लिम भाईचारे के खिलाफ इंगित रही। वैसे बीच-मध्य जब भी सिख पंथ ने हिंदू वर्ग से अपनी अलग पहचान जतलाने की कोशिशें की तो उसे तुरंत ही आर्य समाजी वर्ग के क्रोध का सामना करना पड़ा। 

भारत की आज़ादी के बाद पंजाब में मुस्लिम फैक्टर नदारद हो जाने से इस सांप्रदायिक धारा का सारा कहर सिख कौम पर टूट पड़ा। भारतीय सरकार की बागडोर कांग्रेस पार्टी के हाथों में आ जाने से पंजाबी हिन्दू वर्ग, अपने सांप्रदायिक उद्देश्यों और हितों को पूरा करने के लिए, कांग्रेस पार्टी का और भी ज़्यादा जोशीला हिमायती बन गया। उधर कांग्रेसी शासकों को भी पंजाब में सिख कौम के संबंध में अपने फिरकापरस्त मंसूबों को अंजाम देने के लिए पंजाब के हिन्दू वर्ग के सहयोग और हिमायत की भारी ज़रुरत थी। विचारधारक समरसता के साथ ही यह एक परस्पर उदेश्य था जो पंजाबी हिंदू वर्ग और कांग्रेस पार्टी में मजबूत संयोग-कड़ी बना हुआ था। 

पंजाबी हिंदू वर्ग कांग्रेस पार्टी से एक तरफ से थोड़ी लाभकारी पोज़िशन में था। उस की सारी जान कांग्रेस पार्टी की मुट्ठी में नहीं थी। कांग्रेस पार्टी के पंजाबी हिंदू वर्ग की उम्मीदें और मांगों पर पूरा न उतर सकने की सूरत में, उसके लिए कांग्रेस का पल्ला छोड़ किसी अन्य राजनीतिक पाले में चले जाने का रास्ता खुला था। इसके विपरीत पंजाब में कांग्रेस पार्टी के लिए हिन्दू वर्ग की बाजू छोड़ के ज़िंदा रह पाना मुमकिन नहीं था। सिख कौम को ग़ुलाम बना के रखने और अकाली दल को राज्यसत्ता से पर रखने के लिए कांग्रेस शासकों को पंजाब के हिन्दू वर्ग का सहयोग हासिल करना निहायत ज़रूरी था। हिन्दू वर्ग के इलावा कांग्रेस पार्टी का पंजाब में सामाजिक तौर पर पछड़े वर्गों में भी मजबूत आधार था। इस तरह इन वर्गों की मिश्रित हिमायत के साथी ही कांग्रेस पार्टी अकाली दल को राज्यसत्ता से परे रखने के उदेश्य में सफल रही थी। सो अकाली दल के सामने कांग्रेस पार्टी की इस राजनीतिक किलेबंदी में दरार डालने की राजनीतिक चुनौती थी। केवल ऐसा करके ही वह अपने लिए राज्यसत्ता तक पहुँचने का रास्ता समतल कर सकता था। 
~~~
 

सरदार अजमेर सिंह पंजाब के एक जाने माने इतिहासकार हैं। ब्राह्मणवाद की गहन समझ रखने वाले अजमेर सिंह महसूस करते हैं कि पंजाब अपने असली इतिहास के साथ तभी बच सकता है, एवं उसका भविष्य सुरक्षित हो सकता है अगर वह अलग सिख स्टेट बने। पंजाब की तारीख़ का सिख परीपेक्ष्य में मूल्यांकन करने वाले शायद वह इकलौते इतिहासकार हैं जिन्होंने ब्राह्मणवाद की नब्ज़ को पकड़कर सिखों में घुस चुके ब्राह्मणवाद की निशानदेही की है।
 
 

Other Related Articles

Why are the Debates on Menstrual Taboo One-sided?
Friday, 15 September 2017
   T. Sowjanya In a nutshell, the answer is, the views expressed in the online protests are of women belonging to a particular set of social groups! This is a response to the recent online... Read More...
Death of Merit or Merit of Death
Monday, 25 January 2016
  T. Sowjanya "I came here through reservations and I sustain myself through the political solidarity of my dalit community!" is my firm answer to questions such as "Are you a dalit?" "Do... Read More...
Have savarna feminists rejected markers of caste and patriarchy?
Friday, 19 June 2015
  T. Sowjanya A dalit woman colleague of mine came to the university campus wearing a mangalsutra one day and this forms the context for my discussion. An upper-caste feminist professor was a... Read More...

Recent Popular Articles

Why are the Debates on Menstrual Taboo One-sided?
Friday, 15 September 2017
   T. Sowjanya In a nutshell, the answer is, the views expressed in the online protests are of women belonging to a particular set of social groups! This is a response to the recent online... Read More...