हिन्दू भगवानो को परेशान मत कीजिये, रविदास बुद्ध कबीर से मार्गदर्शन लीजिये

 

Sanjay Jothe

परम संत रविदास का नाम ही एक अमृत की बूँद के जैसा है. जैसे भेदभाव, छुआछूत और शोषण से भरे धर्म के रेगिस्तान में अपनेपन, समानता और भाईचारे की छाँव मिल जाए. जैसे कि प्यास से तडपते हुए आदमी को ठंडा पानी मिल जाए. ऐसे हैं संत रविदास. इनकी जितनी तारीफ़ की जाए सो कम है. जो लोग रविदास को प्रेम करते हैं उन्हें बहुत सोच समझकर उनकी तारीफ़ करनी चाहिए. निंदा कैसी भी करनी हो कीजिये लेकिन तारीफ़ बहुत जान समझकर की जानी चाहिए. ये बात हमारे दलित युवाओं को बहुत गहराई से समझनी चाहिए. इसीलिये इस लेख में मैं संत रविदास को उनके असली रूप में सामने लाऊंगा ताकि संत रविदास को हिन्दू या ब्राह्मण सिद्ध करने के षड्यंत्र को बेनकाब किया जा सके.

ravidas

हमारे दलित और आदिवासी युवाओं को यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि दलित और मूलनिवासी संतों को जबरदस्ती ब्राह्मण या हिन्दू साबित करने का काम इस देश में चलता आया है. उससे बचकर रहना चाहिए इसी में दलित और मूलनिवासी समाज की भलाई है. हमारे महापुरुष हमारे अपने हैं वे हमारी जाति में हमारे गरीब समाज में पैदा हुए थे. उन्होंने वही भेदभाव और अपमान सहा है जो हमारे बाप दादों ने हजारों साल तक सहा है. ऐसे में कोई ये कहे कि रविदास पिछले जन्म में ब्राह्मण थे तो इसका सीधा मतलब ये है कि वो आदमी हमसे हमारे महापुरुष को और हमारे बाप दादों की विरासत को चुराने आया है. उसे तुरंत अपने घर मोहल्ले और गाँव से बाहर निकाल दीजिये. वो हमारे संतों को खत्म करने आया है उससे हमें कोई बात नहीं करनी चाहिए.

हमारे दलित युवाओं पर बहुत बड़ी जिम्मेदारी है. हम सब जानते हैं कि संत रविदास, संत कबीर और बाबा साहेब अंबेडकर किस तरह से जिन्दगी भर सताए गए थे. इसके बावजूद उन्होंने जो काम किया है उसके कारण वे इतिहास में अमर हो गए हैं. उन्होंने हिन्दू धर्म के छुआछूत और पाखण्ड पर जो चोट की है उसे हमें याद रखना चाहिए. लेकिन दुःख की बात ये है कि हमारे युवा इनके बारे में ज्यादा नहीं जानते हैं. अंबेडकर के बारे में भी हमारे युवाओं में पढने की ललक नही है इसीलिये अंबेडकर के नाम पर राजनीति करने वाले लोग अपनी मनमानी कर लेते हैं. हमें अंबेडकर रविदास और कबीर को राजनीति से बाहर निकालकर पढ़ना चाहिए. हमारे घरों में बच्चों और औरतों को कबीर, रविदास और अंबेडकर को पढ़ाना समझाना चाहिए. फालतू की पुराण और भगवानों की कथाओं से अपने बच्चों और औरतों को बचाना चाहिए. ये अब बहुत जरुरी होता जा रहा है. अगर हमने ऐसा नहीं किया तो जिस तरह से कबीर का ब्राह्मणीकरण हुआ है उसी तरह रविदास और अंबेडकर का भी बुरा हाल हो सकता है.

ब्राह्मणवादियों ने ये कहानियां फैला रखी हैं कि संत रविदास एक दुसरे ब्राह्मण संत रामानंद के शिष्य थे. ये एकदम झूठी बात है. कबीर और रविदास दोनों ही रामानंद के शिष्य नहीं थे. आधुनिक रिसर्च ये बतलाती है कि ऐसे किसी रामानंद ने न तो कोई किताब लिखी है न उनके बारे में ऐतिहासिक या साहित्यिक जगत में कोई रिकार्ड उपलब्ध है. अब ये बड़ी मजाक की बात है कि सैकड़ों किताबें लिखने वाले कबीर और रविदास के गुरु में भी कुछ तो काबिलियत होनी चाहिए ना? कबीर या रविदास अगर किसी आदमी को गुरु बनाएंगे तो उस गुरु की भी कुछ किताबें या कुछ उपदेश तो मिलने चाहिए. लेकिन रामानन्द के नाम से ऐसा कुछ नहीं मिलता. इसका सीधा मतलब है कि रविदास और कबीर को हिन्दू और ब्राह्मण सिद्ध करने के लिए ही ये खेल रचा गया है.

ऐसा ही खेल भगवान बुद्ध के लिए रचा गया था. बुद्ध की शिक्षाओं ने इस देश के पाखंडी धर्म को बहुत हद तक उखाड़ फेंका था. बाद में चालबाज ब्राह्मणों ने बुद्ध को विष्णु का अवतार घोषित कर दिया और बुद्ध के भक्तों को भ्रमित करके वापस भेदभाव और जाती व्यवस्था के अन्दर खींच लिया. यही खेल अब रविदास कबीर और अंबेडकर के साथ चल रहा है. इससे हमें बचना होगा और अपने महापुरुषों को भी बचाना होगा.

kabir at loom

अक्सर हमारे बहुजन समाज के भाई बहन न तो अपनी संख्या की शक्ति समझते हैं न अपनी परम्पराओं और महापुरुषों की शक्ति समझते हैं. भारत के अछूत, दलित, मूलनिवासी और शूद्र (जिन्हें ओबीसी) कहा जाता है – वे सब के सब एक ही हैं. उन्हें बांटकर आपस में लडवाया जाता है. दलित समाज के लोग और मूलनिवासी या आदिवासी लोग असल में हिन्दू हैं ही नहीं. वे हिन्दुओं की वर्ण व्यवस्था से बाहर के लोग हैं. हिन्दुओं के चार वर्ण होते हैं. उसमे आखिरी वर्ण शूद्र है. शूद्र का मतलब होता है सेवा करने वाले लोग. जितने भी लोग किसान, कुम्हार, बढई, जुलाहे, रंगरेज, लोहार, धोबी, चरवाहे, पशुपालक, दूध बेचने वाले हैं वे सब के सब शूद्र है.

इसीलिये यादव, अहीर सहित वे सभी लोग जो अपनी मेहनत से कुछ उपजाते हैं वे इस देश में शूद्र माने गए हैं. उन्हें ऊँची जाति के लोगों के शास्त्र पढने और मंदिरों में जाने की इजाजत नहीं है. ऊँची जाति के लोग वे होते हैं जो मेहनत करने वालों की कमाई खाकर निठल्ले बैठे रहते हैं या उनकी उपजाई फसलों का व्यापार और दलाली करते हैं. सबसे ऊँची जाति वो मानी जाति है जो न कुछ अनाज पैदा करती है न व्यापार करती है बल्कि जो तोता मैना की कहानियों जैसी धर्म की कहानियां सुनाकर या श्राद्ध आदि के उलटे सीधे पूजा पाठ करवाकर गरीबों से दक्षिणा मांगती हैं.

शूद्र होना सम्मान की बात है. शूद्र अपनी मेहनत से अनाज उगाता है, पशु चराता है, लकड़ी लोहे या कपडे के सामान बनाता है. लेकिन शूद्रों या मेहनत करने वालों को इस देश में नीच कहा गया है. काम करने वालों को कमीन कहा जाता है. इस देश में कमीन एक गाली है. सोचिये जब शूद्रों की ये हालत है तो दल्तिओं और आदिवासियों की क्या हालत होगी? असल में दलित और आदिवासी इन शूद्रों से भी नीचे माने जाते हैं. ये एक तरह से पांचवे वर्ण कहे जाते हैं जो अन्त्यज कहलाता है. ये हिन्दुओं के ही वर्ण होते हैं. इसलिए पांचवे वर्ण या अन्त्यज का मतलब हुआ कि दलित और मूलनिवासी वे लोग हैं जो हिन्दू धर्म से बाहर हैं.

इसीलिये हिन्दुओं के महान धर्मगुरु और क़ानून निर्माता महर्षि मनु ने शूद्रों और अछूतों को शास्त्र पढने की और मंदिरों में प्रवेश करने की इजाजत नहीं दी है. आज के शंकराचार्य भी यही कहते हैं कि दलितों को हिन्दुओं क मंदिरों में जाने की इजाजत नहीं है. हमारे दलित भाई बहन इस बात से नाराज होते हैं. ये गलत बात है. दलितों को हिन्दुओं की इज्जत करनी चाहिए. हिन्दुओं का अपना धर्म है उनके अपने मंदिर हैं वे जिसे चाहें उसे अपने मंदिर में घुसने दें और जिसे चाहे उसे मना करके रोक दें. जैसे हमारे घर में रसोई होती है हम अपनी मर्जी से उसमे किसी को आने देंगे. हर कोई उसमे नहीं घुस सकता. इसी तरह मुसलामानों को हक़ है कि वे अपनी मस्जिद में किसे घुसने देंगे और किसे नहीं. लेकिन हमारे भोले भाले दलित और आदिवासी लोग नहीं समझते कि उनके घुसने से हिन्दू मंदिर और उनका भगवान् अपवित्र हो जाता है. हमें उनकी इस बात को समझना चाहिए, हमें उन्हें दुःख नहीं देना चाहिए और उनके मंदिर में नहीं जाना चाहिए. हमारे अपने देवी देवता हैं, हमारा अपना अलग धर्म है और हमारे अपने महापुरुष और उनके शास्त्र हैं. हम अपने महापुरुष और अपने मंदिर को छोड़कर दूसरों के मन्दिर में क्यों जाएँ? यह बात सबको समझनी चाहिए.

 buddha seated

संत रविदास हमारे अपने हैं. वे चमार जाति में पैदा हुए और उसी जाति में मरे. वे न तो पिछले जन्म के ब्राह्मण थे और न किसी ब्राह्मण गुरु के शिष्य थे. उन्होंने जिस तरह की भक्ति की उसका राम या कृष्ण से कोई संबंध नहीं है. वे सीधे सीधे भगवान् बुद्ध की परम्परा में हैं. वे जिस तरह की क्रान्ति की और समाज में छुआछूत मिटाने की बात कर रहे थे वो बात हिन्दू धर्म में कहीं नहीं होती है. वो बात सिर्फ जैनों और बौद्धों में होती आयी है. जैनों के भगवान् महावीर और बौद्धों के भगवान् बुद्ध – ये दो लोग हुए हैं जिन्होंने छुआछूत, जाती व्यवस्था, वर्ण व्यवस्था और वेदों का विरोध किया है. इसीलिये बौद्धों को इस देश से ख़त्म कर दिया गया और जैन लोग हिन्दुओं से समझौता करके ज़िंदा बचे हुए हैं.

लेकिन हमारे लिए ऐसी कोई मजबूरी नहीं है. हम न तो हमारे महापुरुष की चोरी होने देंगे न ही उसके नाम या काम के साथ किसी तरह का कोई समझौता होने देंगे. हम रविदास को चमारों के संत ही कहेंगे. वे बहुत बड़े क्रांतिकारी हैं. उन्हें उनके मूल रूप में ही समझेंगे और अपने लोगों को समझायेंगे. वे जिस तरह की भक्ति कर रहे हैं उसको ठीक से समझना चाहिए. उसी से समझ में आयेगा कि उनकी असली विचारधारा क्या है और वे क्या हासिल करना चाहते थे.

हिन्दू धर्म में इश्वर की कल्पना सगुण और साकार रूप में की गयी है. हिन्दू चाहे जो कहें जितनी भी निराकार ब्रह्म की बात करें लेकिन उनकी सौ प्रतिशत भीड़ मूर्तियों और मंदिरों से ही संचालित होती है. उनके इश्वर के न सिर्फ नाम और शरीर होते हैं बल्कि उनका इश्वर युद्ध भी करता है प्रसन्न होता है और नाराज होकर श्राप देता है. वो इश्वर बहुत विलासिता का जीवन जीता है और गरीब अछूतों और स्त्रीयों को अपने मंदिर में आने की इजाजत नहीं देता है.

इसी कारण गरीबों और अछूतों के संत गोरखनाथ, कबीर, रविदास, नानक, नामदेव जैसे संतों ने इश्वर को निर्गुण कहकर पूजा है. हमारे संत रविदास ने भी जिस इश्वर को माना है वो इश्वर दुनिया बनाने वाला या चलाने वाला कोई कलेक्टर नहीं है. बल्कि वह प्रकृति की सबसे बड़ी शक्ति है जिससे सब कुछ बनता है और सब कुछ उसी में विलीन हो जाता है. ये एक वैज्ञानिक बात है कोई अंधविश्वास नहीं है.

रविदास का इश्वर भेदभाव नहीं करता. वो कुदरत या प्रकृति का ही रूप है. जैसे सूरज की धुप सबको बराबर मिलती है. उसकी नजर में कोई उंचा नीचा नहीं होता. रविदास का वो इश्वर सबको एक जैसा प्यार करता है और जाति और छुआछूत को नहीं मानता है. कबीर की तरह रविदास भी निर्गुण को मानते हैं. निर्गुण का मतलब होता है जिसका कोई गुण न हो. इसका सरल भाषा में मतलब ये है कि ऐसे इश्वर का न कोई नाम है, न रंग है, न जाति है, न वर्ण है, न उसके हाथ में कोई हथियार हैं, न कोई धन दौलत है. वह न पुरुष है न स्त्री है.

इसे ठीक से समझिये. इस इश्वर का कोई एक ठिकाना भी नहीं है, कोई मन्दिर नही है. इसीलिये अछूतों और महिलाओं को जब आर्य और ब्राह्मणों ने इश्वर की भक्ति करने से रोका और अपने मंदिरों से बाहर निकाला तो उन महिलाओं और अछूतों ने अपने ही ढंग से निर्गुण की भक्ति शुरू कर दी. जिन महिलाओं को और जिन अछूतों को मंदिर जाने से रोका गया उन्होंने कहा कि आप अपना भेदभाव करने वाला भगवान् अपने मंदिर में रखो हम अपने निर्गुण भगवान् को अपने दिल में रखते हैं. हम जहां हैं वहीं हमारा इश्वर है.

इस तरह अछूत संतों और महिलाओं ने पहली बार दुनिया को ये बात सिखाई कि इश्वर या भगवान् किसी मूर्ती या मन्दिर में नहीं होता है बल्कि जहां जहां सच्चा और साफ़ दिल है वहीं इश्वर मौजूद है. ऐसे ईश्वर को किसी तरह की रिश्वत या चढ़ावा देने की जरूरत नहीं है. इसे मुर्गा बकरा गाय या भैंस की या नारियल मिठाई आदि की चढ़ावे की जरूरत नहीं है. उसको ढूँढने की भी जरूरत नहीं है. वो सबके दिल में मौजूद है. उसके नाम पर न लड़ने की जरूरत है न अंध विश्वासी होकर निकम्मे अनपढ़ की तरह बैठने की जरूरत है.

संत रविदास खुद बहुत काम करते थे. मेवाड़ की रानी मीरा उनकी शिष्या थी अन्य रजवाड़े भी उनके भक्त थे लेकिन वे किसी से एक पैसा भी नहीं लेते थे. वे कबीर की तरह अपना गुजारा अपनी मेहनत से चलाते थे. इसी तरह हमें भी करना चाहिए. अपने बच्चों को वैज्ञानिक शिक्षा देकर इंग्लिश और कम्प्यूटर सहित पश्चिमी शिक्षा देकर कमाने के लायक बनाना चाहिए. संस्कृत, योग या धर्म की अन्धविश्वासी और बेकार की शिक्षाओं से हमारे बच्चों को बचाना चाहिए. निठल्ले बेरोजगार बैठकर समय खराब न करके संत कबीर और रविदास की तरह लगातार मेहनत और भक्ति दोनों एक साथ करनी चाहिए.

लेकिन आजकल जिस तरह से संत कबीर और रविदास को स्कूलों कालेजों में पढ़ाया जाता है उससे बचने की जरूरत है. अक्सर ही इन संतों को केवल और केवल भक्त बनाकर पेश किया जाता है. ये नहीं बतलाया जाता है कि ये बहुत अच्छे कारीगर और कुशल शिल्पी भी थे. ये बहुत ही अच्छे जूते और अच्छे कपडे बनाते थे. ये दोनों ही बहुत सुन्दर कलाकार भी थे. वे दिन भर निठल्ले बैठकर सिर्फ भक्ति भजन में ही नहीं लगे रहते थे. उनका काम ही उनकी भक्ति थी. जो लोग ये कहते हैं कि वे रात दिन राम नाम की भक्ति में लीन रहते थे वे लोग झूठ बोलते हैं. वे कबीर और रविदास को ऐसा आलसी भक्त बनाकर असल में दलितों और आदिवासियों को आलसी बनाना चाहते हैं ताकि उनकी वोटों की राजनीति और धर्म का धंधा चलता रहे. लेकिन हमारे पढ़े लिखे दलित भाई बहनों को इस चालबाजी में अब नहीं फसेंगे. वे अपनी समझदारी से इस चालबाजी से बच निकलेंगे.

हमारे युवाओं का सबसे पहला और सबसे बड़ा कर्त्तव्य ये है कि वे संत रविदास को एक क्रांतिकारी और समाज सुधारक की तरह समझें. उन्हें सिर्फ भक्ति भजन करने वाला आलसी न समझें. वे न भक्त हैं न आलसी हैं ना ही या भिखारी हैं. वे कर्मठ और वैज्ञानिक सोच वाले क्रांतिकारी सुधारक हैं जो समाज को बदलना चाहते थे. संत रविदास को एक क्रांतिकारी की तरह ही समझना चाहिए. उन्होंने जो काम किये और जिस तरह से धर्म और इश्वर की व्याख्या की वो सब समाज में छाये हुए छुआछूत को खत्म करने के लिए था. वे समाज में बराबरी और प्रेम बढाने का काम कर रहे थे. उनके नाम पर हमें भी यह कसम खानी चाहिए कि हम भी समाज में प्रेम और भाईचारा बढ़ाएंगे. हम इस छुआछूत और भेदभाव से भरे धर्म और सगुण भगवान् की गुलामी छोड़कर निर्गुण भगवान में भरोसा रखेंगे.

हमें यह कसम खानी चाहिए कि हम रविदास, कबीर और अंबेडकर की तरह उच्च शिक्षित और ज्ञानवान बनेंगे और अपनी मेहनत से अपना भविष्य बनायेंगे. हम किसी दुसरे के धर्म में या मंदिर में नहीं घुसेंगे. हमारे अपने संत महापुरुष देवी देवता और हमारा अपना धर्म है हम उसका पालन करेंगे. हम हिन्दुओं के मंदिर में घुसकर उनके भगवान को दुःख नहीं पहुंचाएंगे.

~~~

 

Sanjay Jothe is a Lead India Fellow, with an M.A.Development Studies,(I.D.S. University of Sussex U.K.), PhD. Scholar, Tata Institute of Social Sciences (TISS), Mumbai, India.

 

Other Related Articles

India and its contradictions
Sunday, 20 August 2017
  Raju Chalwadi This August 15th marked the completion of 70 years of Independence. The preamble of the constitution way back in 1950 defined India as a place where Justice, Liberty, Equality... Read More...
Bahujans and Brahmins: Why their realities shall always collide, not converge
Wednesday, 16 August 2017
  Kuffir My grandfather,The starvation deathWhich occurred during the drought when men were sold;My father,The migrant lifeWhich left home in search of work to pay off debt;I, in ragged shirt... Read More...
Why Not Janeu Under My Kurta?
Wednesday, 09 August 2017
  Rahmath EP Lipstick Under My Burkha is a ‘by the Brahmin for the Brahmin' movie to propagate the Savarna definition of the ‘oppressed women’. The whole movie gives you a clear picture of... Read More...
Communalism and the Pasmanda question
Wednesday, 09 August 2017
  Lenin Maududi It's time for us to understand that politics is at the centre of every society. It follows then that if politics is of a poor quality, it is futile to expect any improvement in... Read More...
Why Buddhism?
Monday, 07 August 2017
  Dr. R. Praveen The growing atrocities on dalits in the name of hindutva fascism need to be countered with a formidable retaliation, one which leads us to path of progression and helps us to... Read More...

Recent Popular Articles

Nilesh Khandale's short film Ambuj - Drop the pride in your caste
Saturday, 29 April 2017
Gaurav Somwanshi Nilesh Khandale’s debut short movie, ‘Ambuj’ seeks to shed light on some of the most pervasive but less talked about elements of the Indian caste society. Working as an Event... Read More...
Ram Nath Kovind is not a Dalit, Dalit is a Spring of Political Consciousness
Tuesday, 20 June 2017
  Saidalavi P.C. The propaganda minister in Nazi Germany, Joseph Goebbels was so sharp in his thinking that we have come to quote his famous aphorism regarding the plausibility of a lie being... Read More...
Chalo Nagpur Women against Hindutva Manuvaad and Brahmanvaad
Sunday, 05 March 2017
  Manisha Bangar Posters and video of the upcoming Chalo Nagpur Women against Hindutva Manuvaad and Brahmanvaad event on 10th March 2017. Please join in big numbers! Read More...
On Making a Documentary Film about Bhima Koregaon
Tuesday, 11 April 2017
  Somnath Waghamare Dear friends, Jai Bhim. Finally, my documentary film on Bhima Koregaon has been completed with your kind support. In the last six months of my filmmaking journey, I have had... Read More...
Civic Education for the Oppressed and the Oppressors: How different it should be
Saturday, 01 April 2017
  S Karthikeyan A young 27 years old Muthukrishnan Jeevanantham aka Rajini Krish who was pursuing Ph.D. in Jawarharlal Nehru University (JNU) allegedly committed suicide on Monday, March 14,... Read More...