भविष्य की दलित-बहुजन राजनीति: जाति से वर्ण और वर्ण से धर्म की राजनीति की ओर

 

Sanjay Jothe

उत्तर प्रदेश के चुनाव परिणाम जितने बीजेपी के लिए महत्वपूर्ण हैं उससे कहीं अधिक दलित बहुजन राजनीति के लिए महत्वपूर्ण हैं. दलित बहुजन राजनीति के एक लंबे और संघर्षपूर्ण सफ़र का यह परिणाम दुखद है. लेकिन यह होना ही था. इस पराजय की प्रष्ठभूमि लंबे समय से निर्मित हो रही थी. ज्ञान, विज्ञान, शोध और नवाचारों के इस दौर में दलित नेताओं और नेत्रियों द्वारा बुद्धि की बात और बुद्धिजीवियों से दुश्मनी कर लेने का एक अनिवार्य परिणाम यही होना था. जिस तरह से सामाजिक आन्दोलन को और सामाजिक जागरण सहित सामाजिक संगठन के काम को कमजोर किया गया है उसका ऐसा परिणाम आना ही था. लेकिन यह एक महत्वपूर्ण शिक्षा है. अब हमें तय करना होगा की राजनीतिक आन्दोलन और सामाजिक आन्दोलन में किसे चुनें, या इन दोनों आयामों में किस आयाम पर कितना जोर दें और इनके बीच के गतिशील समीकरण को कैसे साधें और आगे बढ़ाएं.

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अगर गौर से देखा जाए तो प्रश्न ये है कि अंबेडकर के जातिनाश के आह्वान और कांशीराम के जाति पर गर्व करने के आह्वान में छुपे सामाजिक और राजनीतिक आवश्यकताओं के द्वंद्व को कैसे सुलझाएं? यह प्रश्न बहुत जटिल लगता है लेक,इन इसका उत्तर बहुत आसान है जिस पर लंबे समय तक कुछ हद तक अमल भी किया गया है. इन दोनों अंतर्दृष्टियों के दो स्पष्ट लक्ष्य रहे हैं. अंबेडकर एक समाजशास्त्री और मानवशास्त्री होने के नाते अपने ही भीतर ज़िंदा राजनीतिज्ञ को भी सलाह दे रहे हैं कि सामाजिक जागरण पहले करो और बाद में उस जागरण के प्रकाश में राजनीति का आभामंडल बुनो. दूसरी तरफ कांशीराम ने जाति पर गर्व करने की जो बात कही वह विशुद्ध राजनीतिक लाभ के प्रयोजन से की गयी थी. यह एक जमीनी राजनीति की एक मनोवैज्ञानिक जरूरत है. अगर लोगों में आत्मसम्मान नहीं होगा तो फिर वे संगठित भी नहीं होंगे और किसी सामान्य और साझे लक्ष्य के लिए काम भी नहीं करेंगे – यह सीधा सा गणित है. इसीलिए मान्यवर कांशीराम ने जो प्रस्तावना दी उसमे जाति पर गर्व करना प्रमुख बात रही. वहीं बाबा साहेब ने जाति पर गर्व करने की नहीं बल्कि जाति से घृणा करने की और उसके संपूर्ण नाश के लिए संगठित होने की सलाह दी. इन दो सलाहों का परिणाम हम देख चुके हैं. असल में अंबेडकर की सलाह को जमीन पर उतरने के लिए जो मार्ग चाहिए वो जातियों से होकर नहीं जाता, जा भी नहीं सकता. यह एक तार्किक बात है आइये इसे इसके विस्तार में समझें.

जब अंबेडकर यह कहते हैं की जाति का नाश होना चाहिए, तब इस सलाह का व्यवहारिक रूप जो भी बनेगा वह जाति के नकार से ही शुरू करेगा. लक्ष्य या साध्य का कुछ अंश साधन में भी होगा ही अन्यथा साधन और साध्य के बीच कोई तार्किक संगती ही नहीं रह जायेगी. इसलिए अंबेडकर की प्रस्तावना में जाति पर गर्व करने की बात तो दूर रही बल्कि जाति एक सांगठनिक और रणनीतिक गणित का आधार भी नहीं बनाई जा सकती. वे जाती से बड़ी इकाई – वर्ण और धर्म से शुरू करते हैं. जाति के राजनीतिक समीकरण और सामाजिक आन्दोलनों की आवश्यकता के मद्देनजर जातिगत समीकरण – इन दोनों को अंबेडकर की प्रस्तावना में अधिक मूल्य नहीं दिया गया है. मूल्य इस बात को दिया गया है कि कितनी खूबसूरती से जातियां अपनी रुढ़िवादी पहचानों से, अपनी मानसिक गुलामियों से और अपनी शैक्षणिक, व्यवसायगत और धार्मिक गुलामी से आजाद हों. अंबेडकर के अनुसार यही सबसे महत्वपूर्ण बात है. बाद में राजनीतिक आन्दोलन इसी बदलाव के गर्भ से अपने आप पैदा हो जायेंगे. अगर हम गौर से देखें तो यही दिशा बुद्ध, कबीर और ज्योतिबा फूले भी लेते हैं. अंबेडकर थोड़ा दुस्साहस करते हैं और आधुनिक समय में दलित राजनीति का एक रोडमेप देने का प्रयास भी करते हैं. उनकी तात्कालिक असफलता के बावजूद उनका सामाजिक और राजनीतिक तर्क लंबे समय के लिए प्रासंगिक है और इधर कुछ दशकों में सफल हुई तात्कालिक राजनितिक सफलताओं से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है.

अंबेडकर जिस बात को केन्द्रीय मूल्य देते हैं वो समझने लायक है. उनके पूरे कैरियर में वे जिन विषयों पर काम कर रहे हैं वो गौर करने योग्य हैं. वे दलितों शूद्रों और स्त्रीयों के पतन का कारण धर्म और संस्कृति के मनोविज्ञान में खोजते हैं और इसी कारण वे तत्कालीन इंडोलोजी के चैम्पियंस को नकारने का दुस्साहस करते हुए आर्य आक्रमण और रेसियल डिफ़रेंस के सिद्धांतों को भी नकार देते हैं और शुद्धतम शोषण और विभाजन के समाज मनोवैज्ञानिक इतिहास पर फोकस करते हैं. संस्कृत और पाली भाषा के अध्ययन सहित वे भारतीय धर्मशास्त्रों के अध्ययन से इस शोषक धर्म की रणनीति और कुटिल चालों को खोज निकालते हैं और इन चालों के सामाजिक राजनीतिक अनुप्रयोगों (इम्प्लीकेशंस) की पूरी कार्यप्रणाली को हमारे सामने उजागर कर देते हैं.

यह कई अर्थों में बुद्ध, कबीर और फूले के काम का ही विस्तार है. इसीलिये उन्होंने कबीर और फूले को बुद्ध के बाद अपना सबसे बड़ा गुरु घोषित किया था. अंबेडकर के पूरे कर्तृत्व को उनकी इस घोषणा के साथ देखिये. वे बुद्ध, कबीर और फूले के प्रवाह में स्वयं को रख रहे हैं. हालाँकि वे फूले की तरह आर्य आक्रमण सिद्धांत को नहीं मानते और इस मुद्दे पर तत्कालीन यूरोपीय विद्वान मैक्समूलर को भी नकारते हैं. लेकिन इसके बावजूद वे शोषण और विभाजन की जिस यांत्रिकी का पर्दाफाश करते हैं वह आर्य आक्रमण सिद्धांत द्वारा कल्पित शोषण से भी घिनौना साबित होता है. सरल भाषा में कहें तो ज्योतिबा फूले जिस आर्य आक्रमण सिद्धांत को आधार बनाकर ब्राह्मणी शोषण को उजागर करना चाहते थे वह असल में एक विदेशी कौम द्वारा भारतीय मूलनिवासियों का शोषण नजर आता था. लेकिन अंबेडकर इसे नकारते हैं और एक ही देश के बाशिंदों के बीच में रचे गये आंतरिक षड्यंत्र की तरह इस ब्राह्मणवाद को उभार लाते हैं. इस तरह यह ब्राह्मणवाद पर एक कहीं अधिक बड़ी गाली बन जाती है कि ये लोग किसी अन्य कौम को नहीं बल्कि अपनी ही कौम को विभाजित करके छलते रहे हैं, दलते रहे हैं.

इस स्थापना में अंबेडकर कहीं अधिक सफलता और बल से ब्राह्मणवादी नैतिकता की धुरी – उनके मानव धर्म शास्त्र और वर्ण व्यवस्था सहित इश्वर या ब्रह्म की धारणा - को ही कटघरे में खड़ा कर देते हैं और ब्राह्मणवाद की स्वघोषित नैतिकता के दंभ को चकनाचूर कर देते हैं. आर्य आक्रमण सिद्धांत में फिर भी एक द्वंद्व बना हुआ है कि ब्राह्मण विदेशी हैं इसलिए वे मूलनिवासियों का शोषण करते हैं. लेकिन अंबेडकर के अनुसार सभी भारतीय मूलनिवासी हैं और यह शोषण अपने ही भाइयों का शोषण है जो कि कहीं अधिक घिनौना और निंदनीय है. इस प्रकार अंबेडकर ब्राह्मणवादी धर्म के न्यायबोध और नीतिबोध को एकदम निशाने पर ले लेते हैं. आगे वे बुद्ध की और बौद्ध धर्म की जो खोज करते हैं वह इसी तर्क और अंतर्दृष्टि का स्वाभाविक विस्तार है. जो खोज वे फूले और कबीर के साथ शुरू करते हैं वो बुद्ध तक जाकर पूरी हो जाती है और इसी खोज के समानान्तर ब्राह्मणवादी धर्म का विकल्प भी उन्हें मिलता जाता है. या कहें कि वे ब्राह्मणवादी षड्यंत्र को नकारते-नकारते जहां पहुँचते हैं वहां उन्हें बुद्ध मिल जाते हैं. ये दोनों एक ही बातें हैं.

अब जब अंबेडकर इस तरह से ब्राह्मणवादी धर्म के विकल्प तक अर्थात बौद्ध धर्म तक पहुँच जाते हैं तो उनकी इस धार्मिक सामाजिक प्रस्तावना के समानांतर राजनीतिक प्रस्तावना कैसी होनी चाहिए? अगर वे जातिनाश की यात्रा में जाति को नहीं बल्कि वर्ण और धर्म को अपना केन्द्रीय विमर्ष बना रहे हैं तो इसका क्या अर्थ है? इस प्रश्न पर गहराई से विचार करना होगा. छोटी-छोटी जातीय अस्मिताओं की बजाय वे एक धार्मिक दार्शनिक अस्मिता को वरीयता दे रहे हैं हमें इस बात को गहराई से नोट करना चाहिए. उनके अपने समय में समाज इस बात के लिए तैयार नहीं था लेकिन इसका यह अर्थ नहीं की उनका दिया गया समाधान गलत या अव्यावहारिक था. उनके अपने जीवन के सबसे परिपक्व निर्णय – बौद्ध धर्म के चुनाव – को उसकी राजनीतिक संभावनाओं के साथ रखकर देखना शेष है. अभी भी इसपर काम होना बाकी है कि एक श्रमण धर्म के रूप में बौद्ध धर्म के परितः कैसा सामाजिक और राजनीतिक आन्दोलन बुना जाए. असल में यह काम शुरू होने से पहले ही जातीय अस्मिता की राजनीति की तात्कालिक और अल्पजीवी सफलताओं के खुमार ने इसे खत्म कर दिया. लेकिन अब मौक़ा है कि यह विचार फिर से शुरू किया जाए. इसका क्या अर्थ हुआ?

क्या इसका यह अर्थ हुआ कि सभी शुद्र और दलित जातियों को बौद्ध धर्म अपना लेना चाहिए? या कि पूर्ण धर्मांतरण होने तक सामाजिक राजनीतिक विकल्पों पर विराम लगा देना चाहिए? नहीं, न तो यह अपेक्षित है न ही संभव है. राजनीतिक प्रयासों की धारा जो एक दिशा, एक स्तर तक पहुँच गयी है वह पूरी तरह वापस लौट आये इसकी जरूरत नही है लेकिन इस बात की जरूरत अवश्य है कि वह अंबेडकर के मूल सिद्धांतों और स्थापनाओं की रौशनी में खुद को पुनर्परिभाषित करे.

इसका सीधा अर्थ ये है कि जातिविहीन समाज की कल्पना करते हुए उन्होंने जिस धर्म को और जिस नैतिकता या आचारशास्त्र को चुना था उसका पूरी शक्ति से प्रचार करना जारी रखें और उसी दिशा में राजनीतिक संगठन का निर्माण करें. यही अंबेडकर की धार्मिक प्रस्तावना का स्वाभाविक सामाजिक-राजनीतिक विस्तार है. इसके विपरीत कांशीराम की राजनीतिक प्रस्तावना में जातीय गर्व की जो सलाह है वह लंबे समय में सामाजिक धार्मिक अर्थ में ही नहीं बल्कि स्वयं राजनीतिक अर्थ में भी हानिकारक है. जाति पर अगर गर्व करेंगे तो जाति मजबूत होगी, स्वाभाविक सी बात है जिस पर आप गर्व करेंगे उसे खुद अपने हाथों ख़त्म कैसे कर देंगे? दूसरा नुक्सान ये कि जाति पर गर्व करते हुए आप ब्राह्मणवादी विभाजक षड्यंत्र पर ही गर्व कर रहे हैं. जाटवों का जाटव होने पर गर्व और यादवों का यादव होने पर गर्व असल में ब्राह्मणवादी जहर को ही गहरा करता जाता है इसीलिये वे इकट्ठे होकर अपने साझे शत्रु का सामना नहीं करते बल्कि आपस में ही लड़ते रहते हैं. अभी उत्तर प्रदेश में जो हुआ उसे ठीक से देखें तो उसमे कांशीराम की प्रस्तावना की हार है और अंबेडकर की प्रस्तावना की जीत एकदम साफ़ नजर आती है.

हालाँकि इसका यह अर्थ नहीं है की कांशीराम ने सामाजिक जागरण के महत्व को समझा ही नहीं. उन्होंने इसे जरुर समझा और प्रयोग भी किया उन्होंने साइकिल यात्रा से और बामसेफ या डी एस फोर के माध्यम से सामाजिक जागरण की बात भी साधनी चाही थी लेकिन राजनितिक सफलता का महत्व उनके लिए सर्वोपरि था. एक अर्थ में यह ठीक भी था, अंबेडकर स्वयं राजनीतिक सत्ता को सब परिवर्तनों का चालक बताते थे लेकिन अब समय ने सिद्ध कर दिया है कि अंबेडकर अपना 'लक्ष्य पाने में असफल हुए' लेकिन अपने 'मार्ग बनाने में पूरी तरह सफल हुए'. सरल शब्दों में कहें तो अंबेडकर ने धर्म और संस्कृति के विश्लेषण से जिस तरह से समाजमुक्ति का नक्शा बनाया वह तर्कसम्मत और व्यावहारिक रहा लेकिन उसकी राजनीतिक सफलता सीमित रही. दूसरी तरफ कांशीराम ने जिस राजनीति का मार्ग दिया वह तात्कालिक रूप से सफल रहा और अब आज एक बंद गली में आकर खत्म हो गया है. जब तक प्रष्ठभूमि में अंबेडकर की सामाजिक क्रान्ति के आह्वान की गूँज बनी हुई थी तब तक कांशीराम और मायावती की राजनीति को इंधन मिलता रहा. लेकिन जैसे ही मायावती की तथाकथित सोशल इंजीनियरिंग ने अंबेडकरी विश्लेषण में अनाधिकृत बदलाव करके राजनीतिक विवशता को सामाजिक स्तर पर उतारना चाहा वैसे ही ब्राह्मणवाद अपने ब्रह्मास्त्र के प्रयोग से इस नवीन रचना को भस्म करके स्वयं राजा बन बैठा. आज उत्तरप्रदेश की राजनीतिक जमीन पर यही भस्म बिखरी पड़ी है. अब हमें यह तय करना है कि हमारे दो परम सम्मानित नायकों और महापुरुषों की अंतर्दृष्टियों को हम किस तरह एकसाथ अपने काम में लें और कैसे उनमे वरीयता कैसे तय करें या संतुलन कैसे बनाएं? यह नहीं हो सकता कि हम दोनों में से एक का चुनाव करें, नहीं यह होना भी नहीं चाहिए. अंबेडकर और कांशीराम दोनों का महत्व हमारे लिए एकसमान है लेकिन हमें यह चुनाव तो करना ही पडेगा कि दूरगामी सफलता के लिए और शोषण मुक्त समाज के निर्माण के लिए हमें पहले किस पर कितना ध्यान देना है?

व्यवहारिक रूप में इसका अर्थ यह है कि जब तक अंबेडकर के बताये अनुसार हम अपनी संस्कृति और अपना धर्म खोजकर स्थापित न कर दें तब तक गर्व करने योग्य हमारे पास कुछ है ही नहीं. यहाँ सवाल ये है कि किस पर गर्व करें? हमें ब्राह्मणवाद ने अपमानित करके हमारा जो नाम रखा है, जिन जातियों का नाम रखा है उस नाम और काम पर गर्व करें? क्यों करें? और इस गर्व से असल में ताकत किसको मिल रही है? क्या ये गर्वीली जातियां एक साथ इकट्ठे अपने सामूहिक अतीत या संभावित सामूहिक भविष्य पर गर्व कर पा रही हैं? अगर नहीं तो इस गर्व का हासिल क्या है? ये कठिन लेकिन जरुरी सवाल हैं जिस पर हमें बैठकर सोचना है.

अब इसी के साथ अगर बीजेपी की सफलता पर विचार करें तो फिर से वही परिणाम मिलते हैं जिनकी तरफ अंबेडकर इशारा कर रहे हैं. बहुजन या दलित राजनीति की पराजय पर यह सलाह दी जा रही है कि यह अस्मिता की राजनीति की हार है. एक अर्थ में यह बात सही है और दुसरे अर्थ में बिलकुल गलत है. भारत में अस्मिता की राजनीति की जय पराजय को तय करने के पहले स्वयं अस्मिता की श्रेणी को ही तय करना जरुरी होता है. यहाँ "ग्रेडेड इन-इक्वालिटी" से भरे समाज में न समाधान इकट्ठा मिलता है न समस्या इकट्ठी मिलती है, सब कुछ श्रेणियों में बंटा हुआ है. अस्मिता की राजनीति की असफलता की बात इस अर्थ में सही है कि यह जातीय अस्मिता की राजनीति की असफलता है. लेकिन जो लोग सफल हुए हैं वे किस आधार पर सफल हुए हैं? यह प्रश्न ठीक से समझ लिया जाए तो हम अंबेडकर की जादुई समझ को देख सकेंगे और कांशीराम की असफलता का कारण भी देख सकेंगे. ठीक से देखें तो उत्तर प्रदेश में जातीय अस्मिता की छोटी राजनीति को वर्ण या धर्म की अस्मिता की बड़ी राजनीति ने पराजित किया है. यादव और जाटव का जातीय गर्व आपस में लड़कर हारा है लेकिन हिन्दू मुस्लिम का धार्मिक गर्व आपस में लड़कर हिन्दू गर्व जीता है. क्या यह साफ़ नजर नहीं आ रहा है? सीधा मतलब ये है कि छोटे विभाजन पर गर्व हार रहा है और बड़े विभाजन पर गर्व जीत रहा है. यही परिणाम हमें ब्राह्मणों और अन्य जातियों की लड़ाई में भी देखने को मिलता है. ब्राह्मण एक वर्ण के रूप में अकेली सैकड़ों जातियों से बलवान साबित होता है क्योंकि ब्राह्मण एक जाति नहीं वर्ण है जबकि यादव या जाटव अपने वर्ण को इकट्ठा न करते हुए स्वयं एक जाति के रूप में एक वर्ण से भिड़ने निकलता है और इसीलिये हारता है.

यह बात गौर करने लायक है. वर्ण की लड़ाई, जाति की लड़ाई और धर्म की लड़ाई का अपना-अपना स्थान है. जाति पर गर्व करना सिर्फ जातीय लड़ाई तक सीमित कर देता है और वर्ण और धर्म के विकल्प पर ध्यान ही नहीं जाने देता. इसीलिये जातीय अस्मिता पर आवश्यकता से अधिक जोर देने पर वर्ण और धर्म की वृहत्तर और ताकतवर सच्चाइयों पर से हमारा ध्यान हट जाता है और इसका परिणाम ये होता है कि जातीय अस्मिता पर गर्व करने की सलाह उलटी पड जाति है. ये सलाह कैसे उलटी पड़ जाती है? आइये इसे भी समझते हैं.

जब एक जाटव या चर्मकार या एक महार को उसकी जाति पर गर्व करना सिखाया जाता है तो वह भारत के समाज में अपनी जाति के अस्तित्व को सिर्फ एक जाति के रूप में ही देखता है, वर्ण और धर्म के बड़े और महत्वपूर्ण खेल को वो देखना भूल जाता है. अब वह सिर्फ जातिगत पहचान में अपनी बुद्धि लगाएगा. अब वह इस्लाम, इसाइयत या बौद्ध धर्म की श्रेष्ठताओं की तुलना में या नास्तिकता और विज्ञानवाद की तुलना में अपनी जातीय, वर्णगत और धार्मिक पहचान को देखना या उसका मूल्यांकन करना भूल जाता है. ऐसी तुलना करना भूलते ही वह धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक बदलाव की चेतना जागने की संभावना से भी दूर हो जाता है और अपनी छोटी सी जातीय पहचान में फंस जाता है. और चूँकि यह जातीय पहचान भी कोई बहुत गर्व करने लायक नहीं है बल्कि ब्राह्मणवादी धर्म के अंधविश्वासपूर्ण मिथकीय कथाओं के षड्यंत्र में ही लिपटी हुई है. ऐसे में जब जातीय अस्मिता अपने अतीत का निर्माण करने निकलती है तो उसे ब्राह्मणवादी और हिन्दू कथानकों में से ही अपने अतीत और अपनी महानता का निर्माण करना होता है. और यहीं पर आकर वह ब्राह्मणवादी षड्यंत्र में गहरे फंसता जाता है.

ऐसी खतरनाक और असहाय दशा में वह इस षड्यंत्र को देख ही नहीं पाता. वो यह नहीं देख पाता कि जाति के इस दलदल को जाति से नहीं बल्कि वर्ण या धर्म के विमर्ष से खत्म करना होता है. हम कीचड में फंसे हुए कीचड पर ही गर्व करते रहेंगे तो उससे बाहर निकलने की योजना कैसे बना सकेंगे? यही वह केन्द्रीय समस्या है जिसमे फंसकर जाति पर गर्व की राजनीति ने आकर दम तोड़ दिया है. और इसका सबसे बड़ा फायदा उन लोगों को हुआ है जिन्होंने जातीय अस्मिता की बजाय वर्ण की अस्मिता की या धर्म की अस्मिता की राजनीति खेली है. ध्यान दीजिये ब्राह्मण एक जाति नहीं वर्ण है, वैश्य और क्षत्रिय एक जाति नहीं वर्ण है जबकि जाटव, यादव और महार, कोली, कुर्मी, कुम्हार, मुसहर, वाल्मीकि आदि सब जातियां हैं. इस सबका क्या अर्थ है?

इसका इतना ही अर्थ है कि जातीय अस्मिता पर गर्व को क्या एक धार्मिक अस्मिता के या एक सांस्कृतिक अस्मिता के गर्व में बदला जा सकता है? अब समस्या यह भी है कि अधिकाँश लोगों को अपनी वर्णगत या धर्मगत या सांस्कृतिक अस्मिता की कोइ खबर ही नहीं है. सदियों से शिक्षा और मेलजोल से वंचित रखने का परिणाम है ये. ऐसे में किस पर गर्व करें या किस झंडे या शास्त्र या महापुरुष के इर्द गिर्द इकट्ठे हों? क्या सभी शूद्र इकट्ठा हो सकते हैं? क्या सभी शूद्र और दलित, आदिवासी इकट्ठा हो सकते हैं और शूद्र या चौथे वर्ण के रूप में अपनी पहचान को थोपने की तैयारी कर सकते हैं? थोड़ी देर के लिए मान लेते हैं कि ऐसा होने लगा. लेकिन फिर भी यह सवाल फिर उठेगा कि इस शूद्र वर्ण की अस्मिता जब अपने अतीत को खोजने निकलेगी तब फिर उसे ब्राह्मणी शास्त्रों की मिथकीय गप्प से ही गुजरना पडेगा. तब फिर से वही समस्या खड़ी होगी जो जाटव, यादव या महार के साथ अपने अतीत की खोज के समय पैदा होती है. क्या यह घनचक्कर नजर आता है?

इसका यह अर्थ हुआ कि आप एक जातीय या वर्णगत पहचान से नहीं बल्कि एक भिन्न सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान से ही इस फंदे से छूट सकते हैं. और यहीं अंबेडकर अपना अंतिम निर्णय सुनाते हुए बौद्ध धर्म में प्रवेश कर जाते हैं. यहाँ यह भी जानना जरुरी है कि एक अन्य धर्मनिरपेक्ष अस्मिता – 'सर्वहारा' भी हमारे लिए काम की नहीं है. सर्वहारा ठीक वही बात है जिसे आजकल 'आर्थिक आधार पर आरक्षण' देने वाले कहते फिरते हैं. इस विमर्श में "गरीब" के अर्थ में क्लास या वर्ग का एक इकाई बनते ही इस गरीब के नाम पर 'एक गाँव में एक गरीब ब्राह्मण रहता था' वाली कहानिया फिर ज़िंदा हो जायेंगी और इन कहानियों से चले आ रहे सवर्णों के हाथों में बीपीएल कार्ड प्रगट हो जायेंगे और सर्वहारा का वास्तविक भारतीय चेहरा – जो कि दलित आदिवासी और ओबीसी हैं – वे फिर से गरीब सवर्ण द्विजों की भीड़ में खो जायेंगा. इसीलिये लोहिया ने वर्ग संघर्ष को नकारते हुए वर्ण संघर्ष की बात की थी.

अब इस विस्तार में जाने के बाद यह भी हम जानते हैं कि धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक बदलाव हमको एकसाथ ही चलाना पडेगा. हम पूरे भारतीय शूद्रों और दलितों के बौद्ध हो जाने तक सामाजिक राजनीतिक आन्दोलन को स्थगित नहीं रख सकते. यह न तो आवश्यक है न ही संभव है. तब क्या करें? यह बहुत महत्वपूर्ण सवाल है और इसका उत्तर ज़रा भी कठिन नहीं है. इसका उत्तर वही है जो अंबेडकर और कांशीराम दोनों ने प्रयोग करके दिखाया है लेकिन उसे हम बीच में अधूरा छोड़ चुके हैं. वह उत्तर यह है की बौद्ध धर्म के धीरे-धीरे प्रचार द्वारा हमारी सभी जातियों को अंधविश्वास से बाहर निकाला जाये और हमारे बच्चों, युवकों और स्त्रीयों को वैज्ञानिक, लोकतांत्रिक और समतामूलक विचारधारा की तरह बौद्ध धर्म की शिक्षा दी जाए. यहाँ नोट करते चलें की धर्मांतरण करने की कोई आवश्यकता नहीं है. सारे दलित और शूद्र बौद्ध हैं ही. इसे सिर्फ फिर से जीना शुरू करना है और अपने घरों से अंधविश्वासपूर्ण पूजा पाठ शास्त्र, व्रत उपवास और त्योहारों को बाहर निकाल देना है. अपनी स्त्रीयों और बच्चों को बुद्ध और बौद्ध धर्म के बारे में अंबेडकर और ज्योतिबा फूले के बारे में शिक्षित करना है. यह एक धीमा लेकिन पक्का काम है. यह काम करते हुए हमें हिन्दू धर्म का अपमान नहीं करना है. उन्हें गाली देकर उनका महत्व नहीं बढ़ाना है, उन्हें उनके हाल पर छोड़कर चुपचाप अपने धर्म और संस्कृति को आगे बढ़ाना है. अगर हम यह काम करते हुए इसी नजरिये से जातीय राजनीति को वर्ण की राजनीति और वर्ण की राजनीति को धर्म की राजनीति तक उठा सकें तो हम न सिर्फ दलितों शूद्रों और आदिवासियों का बल्कि एक आम भारतीय का भी हित साध सकते हैं. अंततः धर्म की राजनीति भी फिर भारतीय और गैर भारतीय के द्वंद्व की राजनीति में प्रवेश करेगी. तब विशुद्ध भारतीय होना एकमात्र मूल्य रह जाएगा. यही मूल्य फिर एक स्वस्थ और मंगलमय राष्ट्रवाद का जनक होगा.

हमारी राजनीति इस तरह क्रम में जाति से वर्ण और वर्ण से धर्म तक ऊपर उठ सके और राजनीतिक विकास के साथ ही सामाजिक धार्मिक विकास और बदलाव को भी सुनिश्चित करती चले इसकी बड़ी आवश्यकता है. उत्तर प्रदेश के चुनाव परिणाम अब इस आवश्यकता को रेखांकित कर रहे हैं इसकी तरफ ध्यान देना जरुरी होता जा रहा है.

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 संजय जोठे लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कररहे हैं।

Ilustration by Unnamati Syama Sundar

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