ध्यान में सबसे बड़ी बाधा: आत्मा का सिद्धांत

 

Sanjay Jothe

ध्यान एक ऐसा विषय है जिसके बारे में सबसे ज्यादा धुंध बनाकर रखी जाती है और पूरा प्रयास किया जाता है कि इस सरल सी चीज को न समझते हुए लोग भ्रमित रहें. इस भ्रम का जान बूझकर निर्माण किया जाता है ताकि कुछ लोगों संस्थाओं और वर्गों की संगठित दुकानदारी और सामाजिक नियंत्रण बेरोकटोक बना रहे.

open eyed buddha

Open eyed Buddha: Painting by Babasaheb Ambedkar

ध्यान को चेतना या होश के एक विषय की भाँती समझना एक आयाम है और ध्यान सहित अध्यात्म को एक मनोवैज्ञानिक षड्यंत्र के उपकरण की तरह देखना दूसरा आयाम है. अक्सर एक आयाम में बात करने वाले दूसरे आयाम की बात नहीं करते लेकिन मैं दोनों की बातें करूंगा ताकि बात पूरी तरह साफ़ हो जाए.

पहले हम ध्यान को उसके चेतना और होश वाले अर्थ में समझते हैं. असल में ध्यान का अर्थ शुद्धतम होश से है. ध्यान करना या ध्यान लगाना शब्द मूलतः गलत है और 'ध्यानपूर्ण होना' या 'ध्यान में होना' शब्द ही सही है लेकिन भाषा की मजबूरी है कि 'ध्यान करना' एक प्रचलन बन गया है. इस हद तक 'ध्यान करने' की सलाह की भाषागत विवशता को माफ़ किया जा सकता है लेकिन दुर्भाग्य से मामला यहीं नहीं रुकता. जो परम्पराएं ध्यान फैलने ही नहीं देना चाहती और ध्यान के, होश के और तर्क के खिलाफ काल्पनिक इश्वर से याचना करते हुए ही जिनका जन्म हुआ है वे आजकल ध्यान की ठेकेदारी लेकर बैठ गयी हैं.

इन शोषक और अन्धविश्वासी परम्पराओं से जब ध्यान की सबसे बड़ी प्रस्तावनाएँ आती हैं तब जरुरी हो जाता है कि उनकी प्रस्तावनाओं में छुपे षड्यंत्रों और विरोधाभासों की पोल खोली जाए.

भारत में ध्यान की मौलिक प्रस्तावना श्रमणों (जैनों और बौद्धों) से आई है जो प्रार्थना और याचना की बजाय पुरुषार्थ और तर्कपूर्ण इंक्वाइरी में भरोसा रखते थे. इस प्रकार ध्यान 'भौतिकवादी' और 'मनोवैज्ञानिकों' की देन है. जिस क्रिया या अभ्यास को साधना या अध्यात्मिक अभ्यास कहकर बोझिल कर दिया गया है वह अपने क्षणभंगुर मन और सांत व्यक्तित्व के निष्पक्ष दर्शन के अलावा और कुछ भी नहीं है. इसमें एक वैज्ञानिक सी अप्रोच चाहिए जो अपने मन को प्रयोगशाला बनाकर उसमे हो रही उठा पटक को बिना निर्णय लिए बिना नाम दिए जानता रहे. इस तरह देखने जानने में समझ आता है कि हकीकत में घटनाओं, मन और व्यक्तित्व सहित जीवन और समय मात्र का भी कोई केंद्र नहीं है. सब कुछ संयोग है और सब कुछ और परिवर्तनशील है. ऐसे में अस्तित्व में खूंटे की तरह गाड़ दिए गये इश्वर की कल्पना भी एक मजाक भर है.

यह भौतिकवाद की निष्पत्ति है. जैसे शरीर निरंतर वर्धमान है या क्षीण हो रहा है उसी तरह मन भी है, उसमे भी बाहरी संवेदनाएं और संस्कार प्रवेश कर रहे हैं और समय और परिस्थिति के अनुसार फलित हो रहे हैं. इस पूरे प्रवाह में आपके लिए करणीय इतना ही है कि इसे चुपचाप या तटस्थ होकर जानते रहें. यहाँ नोट करना चाहिए कि यह आतंरिक या मानसिक धरातल की तटस्थता है. सामाजिक और दुनियावी आयाम में इस तटस्थता का सीमित उपयोग ही हो सकता है.

शरीर और मन सहित इनके समुच्चय अर्थात व्यक्तित्व को उसकी पूरी नग्नता में काम करते हुए देखना होता है. हमारी इंच इंच गतिविधि का पूरा होश हमें स्वयं होना चाहिए. जैसे अभी आप कुछ पढ़ रहे हैं, किसी कुर्सी पर बैठे हैं, पंखा चल रहा है, कोई गंध आ रही है, विचार चल रहे हैं, पैरों में जूते या चप्पल है, नाक पर चश्मा रखा है, कोई आवाज आ रही है, श्वास चल रही है कपड़ा बदन को छू रहा है पीठ से कुर्सी चिपकी है इत्यादि सारी घटनाओं को क्या आप एकसाथ इकट्ठे बिना विभाजन किये हुए जान सकते हैं? अगर हाँ तो यही ध्यान है.

ऐसे सर्वग्राही होश के अर्थ में, ध्यान दुनिया की सबसे सरल चीज है. इसकी आन्तरिक संरचना भी बहुत सरल है. मूल रूप से इसकी केन्द्रीय प्रस्तावना इतनी ही है कि जो कुछ भी जानने में आता है वह क्षणभंगुर और संयोग या प्रवाह है उसे तूल देना और उससे बंधना या उसे किसी निर्णय के खांचे में बैठाना गलत है. अन्य परंपराएं आधी बात मानती हैं और आधी से डरती हैं. बुद्ध कहते हैं कि ज्ञान का विषय तो क्षणभंगुर है ही ज्ञाता भी क्षणभंगुर ही है, इनके बीच ज्ञान की जो 'प्रक्रिया' चल रही है वही असली है. उसका कोई केंद्र नहीं है.

बुद्ध की यह प्रस्तावना ही ध्यान का सार है. और मूलतः यह अनत्ता की बात है. सरल शब्दों में इसका मतलब ये हुआ कि शरीर और मन सहित व्यक्तित्व भी समय के प्रवाह में एक संयोग की तरह उभरा है वह भी खो जाएगा. उसमे भविष्य या अतीत का प्रक्षेपण करना गलत है. अब जब शरीर मन के समुच्चय रूप इस व्यक्तित्व या आत्म का कोई ठोस अस्तित्व ही नहीं है तो इसके पहले और इसके बाद की अवस्था ही वास्तविक अवस्था हुई, मतलब ये कि इस शरीर और मन के संगठित होने या बनने के पहले की और इनके बिखर जाने के बाद की अवस्था ही वास्तविकता या सच्चाई है, और यह सच्चाई एकदम खालीपन या आकाश जैसी है.

जैसे कमरे में कोई आया और घंटेभर बैठकर चला गया. ऐसे ही समय और आकाश के आंगन में आपका शरीर और मन आया और कुछ समय बाद चला गया. एक खालीपन में सब कुछ आया और चला गया. खालीपन ही बच रहा. यही खालीपन शून्य है. यही ध्यान या समाधी है.

यह बहुत ही सरल बात है. फिर से देखिये, शरीर की एक एक संवेदना जब होश के घेरे में आ जाए, जब मन की एक एक संवेदना होश के घेरे में आ जाए तब होश एकदम से भभक उठता है. तब होश का कोई केंद्र नहीं होता और तब झूठा व्यक्तित्व या आत्म भी निरस्त हो जाता है तब समय का रेशा रेशा अनुभव होने लगता है. तब पहली बार पता चलता है कि समय भी होश के सामने बौना है और असल में समय बेहोशी में ही काम करता है. बेहोशी ही मन है और बेहोशी ही समय है. इसीलिये श्रमणों ने मन को ही समय कहा है. ये आप करके देख सकते हैं.

अगर ऊपर बताये तरीके से आप सौ प्रतिशत संवेदनाओं को अभी एक क्षण में जान रहे हैं तो आप समय से या मन से एकदम आजाद हो जाते हैं. हालाँकि यह कहना गलत है कि आप आजाद हो जाते हैं, यह भाषा की दिक्कत है. असल में कहेंगे कि वहां आजादी की प्रक्रिया रह गयी. न कोई आजादी एक लक्ष्य रूप में है न कोई व्यक्ति आजादी के याचक के रूप में है.

इस प्रक्रिया को एक अभ्यास के रूप में चरणबद्ध ढंग से लिया जा सकता है. जैसे बुद्ध श्वासों पर अवधान को ध्यान की शुरुआत बताते हैं. फिर श्वासों से होते हुए शरीर और मन की संवेदना पर जाते हैं उसके बाद संवेदना को जान रही आभासी सत्ता को भी निशाने पर लेते हैं. इस तरह एक निरंतर जागरूकता का बढ़ता हुआ दायरा बना रहता है. इस होश की अवस्था में तत्काल ही शरीर मन और समय से दूरी बन जाती है.

यह तत्काल ही मुक्त करने लगता है भविष्य में किसी एकमुश्त निर्वाण की कोई आवश्यकता नहीं, वह होता भी नहीं. अभी आप जितने होशपूर्ण हैं उतने ही आप निर्वाण में हैं. पूरा होश पूरा निर्वाण है. यह अभी इसी जगत की बात है, इसका परलोक और विदेह मुक्ति जैसी मूर्खताओं से कोई संबंध नहीं. इसे अभी आप करके देख सकते हैं. आप हिसाब किताब और योजनाओं के बोझ में जितने दबे हैं उतने डिप्रेशन और तनाव में होंगे यही बंधन है. आप जितने निर्विचार और आकाश की तरह होंगे उतने क्रिएटिव होंगे उतने आजाद होंगे, ये तत्काल मुक्ति है.

अब आते हैं इसके सामाजिक नियंत्रण वाले पक्ष पर. जैसा ऊपर मैंने लिखा कि कुछ ईश्वरवादी याचक और प्रार्थना वाली संस्कृतियाँ भी रही हैं जो वैज्ञानिक और तर्कपूर्ण ओबजर्वेशन में नहीं बल्कि किसी काल्पनिक इश्वर की शक्ति आशीर्वाद समर्पण और शरणागती आदि आदि में भरोसा रखती हैं. अब तो श्रमण धर्म भी इन्ही के एक रूप में बदल गये हैं. बुद्ध और महावीर भी पूजे जाते हैं. ये गलत है. ऐसी याचक परम्पराओं को ब्राह्मण पोअर्न्प्रा कहा गया है. ये श्रमणों से विपरीत परम्परा है.

यह असल में ज्ञान या विज्ञान की परंपरा नहीं बल्कि सामाजिक नियंत्रण की राजनीति है. यह श्रमणों द्वारा निर्मित ज्ञान का इस्तेमाल समाज को कंट्रोल करने में करती है और होशियारी से अपनी चालबाजियों सहित सृष्टि जीवन और जगत के केंद्र में एक काल्पनिक इश्वर और आत्मा को बैठा देती है. इनमे से और जहरीली परम्पराएं हैं जो इनसे भी आगे बढ़कर पुनर्जन्म की भी बातें करती हैं.

अब ऐसी परम्पराओं के ध्यान की प्रस्तावना पर आइये. ये कहते हैं कि एक विशुद्ध और निर्लिप्त आत्मा होती है जो शरीर मन और विचारों से परे होती है. जब शरीर मन और विचार सहित संस्कारों की परछाई पीछे छुट जाती है तब यह आत्मा स्वयं को जानती है. इसे आत्मसाक्षात्कार कहते हैं. कुछ परंपरायें इसे ही अंतिम बताती हैं और कुछ इससे आगे जाकर परमात्मा को भी खड़ा करती हैं और उसके आधार पर एक और बड़ी राजनीति खेलती हैं. हालाँकि इनकी तथाकथित 'आत्मसाक्षात्कार' की टेक्नोलोजी वही है जो श्रमण बुद्ध ने बताई है. लेकिन वे बुद्ध का नाम नहीं लेते.

बुद्ध के अनुसार शरीर और मन सहित विचार और संस्कार और स्वयं समय भी एक संयोग है इसलिए क्षणभंगुर है इसलिए उनकी कोई सत्ता नहीं है और इसीलिये खालीपन या सबकी अनुपस्थिति ही एकमात्र सच्चाई है. इसकी उपमा बुद्ध ने शुन्य और आकाश से दी है. इस आकाश को चिदाकाश और ओमाकाश और न जाने क्या क्या नाम देकर वेदान्तियों ने अपना जाल फैलाया है.

अब मजा ये कि इसी आकाश भाव की प्रशंसा ब्राह्मणी और ईश्वरवादी परम्पराएं भी करती हैं लेकिन बड़ी चतुराई से इसे आकाश या शुन्य न कहकर आत्मा और परमात्मा का नाम दे देते हैं. फिर कहते हैं कि आत्मा सनातन होती है. अनंतकाल की स्मृति लिए वह एक से दुसरे गर्भ में घुमती रहती है जब तक कि सारी स्मृतियों और संस्कारों से मुक्त न हो जाए. अब यहाँ खेल देखिये. अगर आपका एक आत्मा के रूप में ठोस अस्तित्व है और आपका लाखों वर्ष का अतीत है जो कभी डिलीट नहीं किया जा सकता तो मुक्ति या आजादी का क्या अर्थ हुआ? तब आप लाखों वर्षों में बने हुए मन के बोझ से कैसे बच सकेंगे? और बचने की प्रक्रिया के दौरान जो कर्म हो रहे हैं उनका हिसाब कब होगा?

इतनी बड़ी हार्ड डिस्क में इतनी मेमोरी को मेनेज करने के लिए तब एक सुपर कम्प्यूटर की कल्पना करनी पड़ती है. उस सुपर कम्प्यूटर को इश्वर कहा जाता है, जिसके बारे में ये दावा है कि वो गूगल बाबा की तरह सबकुछ जानता है सबकी मेमोरी रोज स्केन करता है और अपना निर्णय भी देता है. इस तरह ये हार्ड डिस्क स्वयं (अर्थात एक आदमी या व्यक्तित्व या आत्मा) एक जीता जागता केंद्र है जिसका अपना ठोस 'स्व' है और अतीत और भविष्य है और उसके बाद ये सज्जन हैं जो इश्वर कहलाते हैं ये भी अनंत से अनंत तक फैले हैं और फैसला करते हैं. अब ये दो केंद्र हैं.

पहली दिक्कत ये कि पहला केंद्र अर्थात आत्मा भी सनातन है और न मिटाई जा सकती है न जलाई जा सकती न सुखाई जा सकती है. ऐसे में उसका एक ठोस अस्तित्व हुआ जिसमे बसी हुई स्मृतियाँ भी ठोस हो गईं जिन्हें अन्कीया या डिलीट करने के लिए ध्यान करना है. ऐसी परम्पराओं का ध्यान असल में उनकी सांसारिक याचना का ही आंतरिक और मानसिक अभ्यास होता है. जैसे ये बाहर याचना करते हैं वैसे ही भीतर भी इश्वर से प्रार्थना करते हैं कि उनकी हार्ड डिस्क की मेमोरी उड़ा दे या डिस्क फोर्मेट कर दे. इसी को मुक्ति कहते हैं. अब एक और मजा देखिये ये हार्ड डिस्क पूरी तरह संस्कारों स्मृतियों और अस्मिता से मुक्त होने के बावजूद एक व्यक्तिव की तरह मुक्ति को अनुभव करती है. ये बड़ी गजब की जलेबी है जो सिर्फ ब्राह्मणी सिद्धांतकार ही बना सकते हैं.

आत्मा मुक्त होकर भी एक व्यक्ति के रूप में मुक्ति का आनन्द भोगती है और परमात्मा भी वहीं बगल में जमे रहते हैं. मतलब कि दो केंद्र जो पहले थे वे अब भी उसी ठसक के साथ बने हुए हैं और मुक्ति या आजादी भी घटित हो गयी. ये गजब की जलेबी है.

हालाँकि ब्राह्मणी परंपरा भी उपर उपर ये जरुर कहती है कि 'मैं और मेरे' से या आत्मभाव से मुक्ति ही मुक्ति है. लेकिन ऐसी श्रमण अर्थ की भौतिकवादी मुक्ति की सलाह और टेक्नोलोजी को चुराते हुए भी वे आत्मा को जमीन में खूंटे की तरह स्थिर रखते हैं. जबकि बुद्ध कहते हैं कि आपके व्यक्तिव या स्थाई मन या शरीर जैसा कुछ नहीं है. थोड़ा विश्राम लेकर इसे देख समझ लो. मन को देखो शरीर को देखो कि कैसे रोज बदलता है. इस तरह एक केंद्र का आभास सहज ही टूट जाता है. यही आजादी है या निर्वाण है जो होश के साथ रोज इंच इंच बढ़ता है.

लेकिन दुर्भाग्य ये है कि हमारे आसपास के लोग ब्राह्मणी धारणा के प्रभाव में आत्मा और परमात्मा को सनातन मानते हैं और आँख बंद करके इस आत्मा और परमात्मा को खोजते हैं. एक खालीपन या अनुपस्थिति की तरफ ले जाने वाली कोई भी विधि उनपर काम नहीं करती क्योंकि दो दो सनातन सांड उनके मन में दंगल कर रहे होते हैं. इन सांडों को लड़ाने वाली परंपरा भी अंतिम रूप से यही कहती है कि अंत में आत्मा परमात्मा नहीं बल्कि कोरा निराकार बच रहता है वही परम समाधान है.

लेकिन वहां तक जाने की पहली शर्त ही वे पूरी नहीं होने देते और निराकार की बजाय दो दो आकारों में और लाखों साल के अतीत और भविष्य में इस तरह उलझाते हैं कि आदमी आँख बंद करके निरंतर बदलते शरीर और मन की क्षणभंगुरता की बजाय इन दो सनातन केंद्र को खोजने लगता है.

इस तरह ब्राह्मणी परंपरा जो ध्यान की जो विधि सिखाती है और इसका जो लक्ष्य बताती है उनमे भारी विरोध है. आत्मा को सनातन बताती है और आत्मभाव से मुक्त होने को मुक्ति बताती है. अब अगर आत्मा सनातन है तो आत्मभाव भी सनातन ही हुआ ना? उससे कैसे छुटकारा होगा? इसी उलझन को कम करने के लिए वे काल्पनिक इश्वर को खड़ा करते हैं कि इसकी कृपा से सब हो जाएगा, श्रृद्धा रखो.

बुद्ध कहते हैं कि ये दोनों सांड – आत्मा और परमात्मा हैं ही नहीं. शरीर मन और इनके समुच्चय रूप इस आभासी मैं की सत्ता भी निरंतर बदल रही है और इसे जानने वाला यह होश भी निरंतर बदल रहा है इस तरह एक बदलने वाली चीज दूसरी बदलने वाली चीज को जान रही है इसलिए कोई खूंटा या केंद्र है ही नहीं. इनके बीच में ज्ञान की प्रक्रिया चल रही है जो खुद भी बदलती जाती है. इसीलिये तटस्थता या उपेक्षा या आजादी संभव है. इस तरह बुद्ध को ठीक से समझें तो अनत्ता ही ध्यान है, यही शुन्य है और यही मन और शरीर को अपनी ही काल्पनिक कैद से आजाद और निर्भार करने वाली वास्तविक उपेक्षा या आजादी है.

 ~~~

 

संजय जोठे लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कररहे हैं।

Other Articles from the Author

Other Related Articles

Support Mahabodhi Residential School in Mizoram
Tuesday, 12 December 2017
  Sudip Chakma Dear Friends, I am very glad and excited to be connected with you through this media, from a remote Village, Tuichawng in Lunglei District Mizoram, India. Our school, Mahabodhi... Read More...
Embracing my Dalit-hood while rejoicing in accomplishments
Tuesday, 12 December 2017
  Chandramohan S During the award ceremony of M. Harish Govind Prize, many asked me why I need a "Dalit Poet" labeling. They were shocked that there were just a handful of Dalit poets who write... Read More...
Caste system and the chains of mind
Tuesday, 12 December 2017
  Tereza Menšíková Visiting India was my dream since childhood. Many stories were told by journalists, travelers, and fiction writers about the mysterious land of Mother India and they... Read More...
Call for Papers: “Doing Ambedkarism Today: Issues of Caste, Gender and Community”
Monday, 11 December 2017
  Call for papers for workshop on: “Doing Ambedkarism Today: Issues of Caste, Gender, and Community” Dates – 19th to 22nd February 2018 Deadline for Proposals – 31st December... Read More...
Arguing for ‘Feminist Ambedkarism’
Sunday, 10 December 2017
  Mahipal Mahamatta I am very glad to introduce to you an important work from Maharashtra, "स्त्रीवादी आंबेडकरवाद" (Feminist Ambedkarism), written by... Read More...

Recent Popular Articles

Index of Articles in Features
Sunday, 30 July 2017
  2017 ~ Crossing Caste Boundaries: Bahujan Representation in the Indian Women's Cricket Team by Sukanya Shantha ~ Dalit University: do we need it? by Vikas Bagde ~ The beautiful feeling of... Read More...
No Mr. Tharoor, I Don’t Want to Enter Your Kitchen
Saturday, 16 September 2017
Tejaswini Tabhane Shashi Tharoor is an author, politician and former international civil servant who is also a Member of Parliament representing the constituency of Thiruvananthapuram, Kerala. This... Read More...
Why Not Janeu Under My Kurta?
Wednesday, 09 August 2017
  Rahmath EP Lipstick Under My Burkha is a ‘by the Brahmin for the Brahmin' movie to propagate the Savarna definition of the ‘oppressed women’. The whole movie gives you a clear picture of... Read More...
A Peep into the Soft Porn Film Industry of Keralam
Friday, 30 June 2017
  Anilkumar PV The setting of the last millennium saw the rise of a new star in the horizon of Malayalam film industry: Shakeela. It was in the year 2000 that her first Malayalam movie Kinnara... Read More...
Some of us will have to fight all our lives: Anoop Kumar
Thursday, 20 July 2017
  Anoop Kumar (This is the transcipt of his speech at the celebrations of the 126th Birth Anniversary of Dr. Babasaheb Amebdkar in Ras Al Khaimah organised by Ambedkar International... Read More...