'अनारकली ऑफ आरा': हाशिये के समाज की हौसले से लबरेज बगावत...!

 

अरविंद शेष (Arvind Shesh)

arvind shesh newदुख से पैदा हुआ जीवट जब दुख को पैदा करने वालों के सामने चुनौती फेंकता है तो आसमान से उम्मीद की बरसात होती है... और जमीन पर नए हौसले से लबरेज़ ख्वाबों की फसल लहलहाने लगती है...!

दिसंबर, 2016 में पंजाब के बठिंडा के किसी समारोह में एक गर्भवती महिला स्टेज डांसर ने अपने डांस से झूमते बंदूक लहराते कुछ गुंडे मेहमानों को अपने साथ मनमानी करने से मना किया और गुंडों ने डांसर को गोली मार दी। तो 'अनारकली ऑफ आरा' अपने सबसे पहले सीन को लगभग इसी सच के साथ उतारती है।

तकरीबन ढाई-तीन दशक पहले बिहार में कई ऐसी शादियों का गवाह रहा हूं, जिनमें अगर 'बाई जी का नाच' नहीं आया तो बरातियों और घरातियों (लड़की पक्ष वाले) के लिए शादी का समूचा आयोजन अधूरा माना जाता था। 'बाई जी के नाच' की मौजूदगी से दूल्हे पक्ष की 'औकात' मापी जाती थी! (आज भी ऐसा होता है या नहीं, पता नहीं!) हालांकि यह आमतौर पर सवर्ण और खासतौर पर राजपूतों की शादियों की 'शोभा' होती थी।

तो ऐसी ही एक शादी में 'बाई जी' के नाच के मनोरंजन और मन को भयानक धक्का देने वाली हकीकत के साथ फिल्म की शुरुआत हुई, तभी फिल्मकार की मंशा (पढ़ें मकसद) साफ हो जाती है! 'दिखने' में ही [क्या चुनाव है..!] 'राजपूत' लगते बरातियों के 'चाचा' ने 'बाई जी' को 'नेग' की तरह बंदूक की नोक पर नोट फंसा कर होंठों से पकड़ने का एक तरह से हुक्म जारी किया और फिर अचानक बंदूक की गोली के धमाके के बाद पर्दे पर अंधेरा छा गया।

फिर आप पर्दे पर उभरा एक बच्ची का जड़ हो गया चेहरा नहीं देखते हैं, अगर देख सकते हैं तो देखते हैं कि कैसे चंद घड़ी के भीतर दो औरतों की तकदीर तय कर दी जाती है और उसे तय करने वाले वे लोग कौन होते हैं! मस्त झूमती मर्द भीड़ के साथ वह 'चाचा' टाइप चेहरा एक व्यवस्था की नुमाइंदगी का महज एक छौंक भर होता है... चौड़े कंधे... ऊंचे भारी शरीर वाला... हाथों में बंदूक लहराता... ऐंठी हुई मूछों वाला मर्द...!

बहरहाल, 'बारह साल बाद' की कहानी आगे बढ़ती है, सामंती ठसक के साथ जीते समाज की हर परत को बेपर्द करती चलती। इसमें आपको पर्दे के बीच में जितना दिखता है, उससे ज्यादा पर्दे के कोने-अंतरे से झांक रहा होता है। जिसने कस्बे या गांवों की जिंदगी जी होगी, उसे याद होगा कि कमर तक चढ़े छोटे बुशर्ट और टखने से ऊपर पैंट के साथ हवाई चप्पल पहने... बाएं हाथ को पीछे पीठ से सटा कर दाहिनी ओर लाकर दाहिने हाथ के कोहनी पर पकड़े और चुपके से अनारकली को देखता अनवर एक समूची हकीकत की तस्वीर दिखता है..! पहली ही मुलाकात में अनवर के ढोलक की थाप पर चेहरे के लय के साथ बैठे-बैठे थिरकती अनारकली पर नजर नहीं ठहरे तो आपको दूसरी बार इस फिल्म को देखना चाहिए! इसी तरह 'रंगीला संगीत मंडली' के मालिक और स्टेज पर अनाउंसर रंगीला के कपड़े और उसकी एकदम ठस्स देशज थिरकन और पांव पीछे मोड़ कर उछलना जिंदा दृश्य हैं!

 तो झांकते हुए दृश्यों की बात थी। दशहरे के मौके पर थाने में स्टेज शो के दौरान 'ऐ दरोगा दुनलिया में जंग लागा हो...' गीत पर शराब में झूमते हुए स्टेज पर चढ़ कर अनारकली से सार्वजनिक मनमानी करते धर्मेंद्र चौहान और उससे पहले के स्टेज शो के बाद गली के अंधेरे में नशे में डगमगाते हुए 'ऐ सखी तू... ना सखी बदरा...' दोहराते आदमी में फर्क करना बहुत मुश्किल नहीं है। एक शख्स स्टेज पर जाकर सरेआम मनमानी करने की कूबत रखता है और दूसरा शख्स वैसी ही हालत में डगमगाते कदमों से अंधेरी गली में गुनगुनाता गुजरता है। आखिर एक यूनिवर्सिटी के राजपूत वीसी धर्मेंद्र चौहान के सामाजिक रुतबे और अंधेरी गली में डगमगाते दिखने में ही किसी हाशिये के समाज से या सीधे कहें तो दलित-वंचित जाति की नुमाइंदगी करते लगते उस आदमी की सामाजिक 'औकात' में फर्क तो है...। कहां से आती है 'बाई जी' के नाच से उपजी कुंठा को सरेआम आपराधिक तरीके से जाहिर करने की हिम्मत और उसी कुंठा को अंधेरी गली में बिखेर कर खुद को 'राजा' मान लेने का भरम...! मर्दाना कुंठा का कुआं हर मोहल्ले में है... अलग-अलग समाज... अलग-अलग कुआं...! कहीं सरेआम रुतबे के रोब का नाच तो कहीं अंधेरे में अकेले उड़ेल देने की राहत..! फिर इसमें संस्कृति के जीवन यानी जाति से जो मानस बनता है, उसे देखा जा सकता है... महसूस किया जा सकता है..!

Anaarkali-Of-Aarah

 स्टेज पर नशे में झूमता धर्मेंद्र चौहान जब अनारकली से मनमानी करने की कोशिश करता रहता है, ठीक उसी समय अनारकली को बचने के लिए उधर से इधर होने के रंगीला के हाथों के इशारे दरअसल यह बताते हैं कि दृश्यों में कल्पनाशीलता कैसे रची जाती है! वहीं अपनी मंडली की अनारकली को बचाने के लिए धर्मेंद्र चौहान से महज गुहार लगाते रंगीला यादव के सामाजिक मनोविज्ञान को समझने के लिए थोड़ा धीरज चाहिए! आखिर रंगीला उस वक्त धर्मेंद्र चौहान से महज रुक जाने की गुजारिश ही क्यों करता रहा, ठीक धर्मेंद्र चौहान की तरह ही हमलावर क्यों नहीं हो सका...! क्या जाति की हैसियत से बनने वाले मनोविज्ञान और मानस की संरचना का असर यहां नहीं दिखता है? उसके बाद धर्मेद्र चौहान के गाल पर अनारकली की थप्पड़ में मुझे बंदूक की गोली की उस आवाज का पता मिलता लगा, जिसने अनारकली की मां चमकी देवी को मार डाला था...! वैसे घुमावदार मूंछों वाले मर्द धर्मेंद्र चौहान को वहां ऐसा करते देखते हुए क्या आपको पहले दृश्य में बंदूक लहराते हुए उस ऐंठी हुई मूंछों वाले 'चाचा' टाइप मर्द की याद आई..?

इस हंगामे के बाद अनारकली को वेश्यावृत्ति के आरोप में फंसाए जाने से लेकर धर्मेंद्र चौहान को थप्पड़ मारने के बारे में बताने, फिर हमले के बाद अनवर के साथ दिल्ली भागने और दिल्ली के उठा-पटक के दृश्यों में जो जिंदगी डाली गई है, वह वही डाल सकता था, जो ऐसी आबो-हवा का 'रिसर्च' करने का दावा नहीं करता हो, बल्कि खुद उन दृश्यों के साथ कभी घुला-मिला रहा हो...!

 इस सबके बीच धर्मेंद्र चौहान, बुलबुल पांडेय और रंगीला के बरक्स अनारकली, अनवर, हिरामन जिस प्रतिनिधि चरित्र को जीते हैं, उसकी परतों को ठीक से उधेड़ा जाए तो पितृसत्ता और ब्राह्मणवाद के तंत्र के बरक्स मैदान में खड़ी शासित स्त्री के लिए स्पेस और उसकी चुनौती दिखेगी। यह चुनौती दिल्ली से वापस लौटती है। फिर जिस तरह धर्मेंद्र चौहान ने सरेआम स्टेज पर अनारकली के सम्मान, गरिमा और अस्मिता को तार-तार करने की कोशिश की थी, उसी तरह स्टेज पर ही अनारकली नाचती है धर्मेंद्र चौहान के लिए, मगर उसी को अंजाम तक पहुंचा देती है, उसके पहले वाली हरकत के साथ! वहां अनारकली का केवल नाचना नहीं है, गीतों के बोल नहीं है, बगावत और चुनौती की समूची जिंदा तस्वीर है। स्वरा भास्कर और उनके निर्देशक ने वहां नाचने और गाने को जो अभिव्यक्ति दी है, वह शायद बहुत लंबे समय तक लोगों को याद रहे!

अपनी जिंदगी की हकीकत के स्वीकार के बावजूद अपनी मर्जी को अपने हक के तौर पर अनारकली शायद ज्यादा ताकतवर तरीके से दर्ज करती है। औरत गाने वाली हो, कोई और हो या फिर बीवी हो! और अगर किसी को धोखा हो कि अनारकली बगावत और प्रतिरोध के उस स्तर तक कैसे गई तो यह कोई सवाल नहीं होगा। सबसे शुरू में पर्दे पर अपनी मां को गोली मारे जाते देखने के बाद से लेकर अनारकली के चरित्र को इस तरह गढ़ा गया है कि किसी भी सीन में उसकी आक्रामकता जरा भी हैरान नहीं करती। बल्कि ज्यादा सहज और स्वाभाविक लगती है!

swara bhaskar of aarahबेशक आभिजात्य आग्रहों की दुनिया में अनारकली के संघर्ष को स्त्रीवाद की क्लासिकी के तौर पर नहीं देखा जाएगा। इसकी कोई जरूरत भी नहीं। लेकिन दिलचस्प यही है कि स्त्री के जमीनी संघर्ष के अलग-अलग आयामों और आख्यानों से ही स्त्रीवाद की सैद्धांतिकी तैयार होती है, हो सकती है! अनारकली अपनी लड़ाई और जवाब की जमीन खुद बनाती है। जब अनारकली की चुनौती के लहजे में गीत ये लफ्ज लहराते हैं कि 'अब त गुलमिया के ना ना ना...' तब अचानक लगता है कि धर्मेंद्र चौहान और बुलबुल पांडेय की शक्ल में ब्राह्मणवाद के जीवन-तत्त्व सामंती मर्दवाद किसी डर के जादू से जड़ हो गए। वह जादू दरअसल हिम्मत और हौसले से लबरेज वह स्त्री है, जो धर्मेंद्र चौहान और बुलबुल पांडेय की बिसात पर उन्हीं को मात देती है!

मेरे जैसे हर चीज में राजनीति खोजने वालों के लिए यह फिल्म खालिस राजनीति है और कम से कम मेरे लिए राहत की वजह यह ज्यादा है। 'अब त गुलमिया के ना ना ना' की अनारकली की घोषणा सामंती मर्दवाद को खौफ से भर देता है, तो हिरामन के 'देस के लिए खा लीजिए...' जैसे डायलॉग से लेकर 'सूट-बूट', 'जुमला', 'दुबई' जैसे शब्दों से लैस 'मोरा पिया मतलब का यार...' गीत मौजूदा सत्ताधारी तबकों की राजनीति को सीधे निशाने पर लेती है। हिरामन के 'देस के लिए...' या अनारकली के 'कड़ाही भी आपका और तेल भी आपका... अब पूड़ी बनाइए या हलवा... आपकी मर्जी...!' अपने हर संवैधानिक अधिकार को भी 'देश के लिए...' के खत्म मान लेने और देश को अपनी कड़ाही मानने वाली सत्ता का चरित्र आज क्या है... जनता उसकी नजर में क्या है... कब वह अपनी मर्जी से जनता का हलवा या पूड़ी बना कर बाजार में नहीं बेच रही है...! तो ऐसे संवादों को केवल द्विअर्थी के दायरे में देखने के बजाय अगर सत्ता के चरित्र के आईने में देखें तो शायद कुछ ज्यादा खुलता है।

स्टेज पर एक गाने के दौरान अनारकली जब ठिठोली में रंगीला के दाहिने पांव को मारती है और रंगीले अंदाज में रंगीला कहता है कि 'अब बाकी जिंदगी 'बाएं' पर, तो इसका मतलब समझना बहुत मुश्किल नहीं होता! बल्कि हाल के दिनों में जहां सत्ता के लिहाज से सत्ता के हक में फिल्मी मोर्चे पर सरेंडर जैसा दिखता है, वहीं अपनी कहानी और प्रस्तुति में स्थानीयता के बावजूद 'अनारकली ऑफ आरा' यह बताने के लिए काफी है कि कल्पनाशीलता और जीवट हो तो एक फिक्र के दौर में भी सियासत के सामने खड़ा हुआ जा सकता है, कुछ सवाल रखे जा सकते हैं...!

फिल्मकार ने एक जो सबसे जरूरी काबिलियत दिखाई है, वह यह है कि जिस पूरी फिल्म में गाली-गलौज को भर देने की गुंजाइश थी, उसे गालियों से लगभग बचा ले जाना! इससे पहले यही काबिलियत 'पान सिंह तोमर' में तिग्मांशु धूलिया ने साबित की थी! इसके लिए मेरी ओर से निर्देशक अविनाश को खास मुबारकबाद!

बाकी मैं आमतौर पर फिल्मों के कला पक्ष पर बहुत ज्यादा ध्यान नहीं देता, क्योंकि समझना नहीं आता। फिर भी, यह कहा जा सकता है कि निर्देशक अविनाश की यह पहली फिल्म नहीं लगती...! ऐसा लगता है कि वे कई और फिल्में बना चुके हैं! अनारकली की कितनी भी तारीफ कम ही होगी। स्वरा भास्कर ने तो जैसे अनारकली को ही जीया है...। पंकज त्रिपाठी की हरेक गतिविधि... शारीरिक मूवमेंट दर्ज करने वाली है, संजय मिश्रा नहीं हैं, वे वीसी धर्मेंद्र चौहान हैं, इश्तियाक खान सिर्फ हिरामन ही दिखे... अनवर का चुनाव कामयाब है। एटीएम, मफलर सभी इस फिल्म के लिए जीवन हैं! गीतों से भरी इस फिल्म के गीत जमीनी हकीकत से खुद को जोड़ते हैं और इस फिल्म की तरह स्थायी महत्त्व के हैं।

जब स्कूल में बच्ची अनारकली को किसी मास्टर ने कहा होगा 'गंदा गाना' गाने के लिए, तो आखिर वह कौन-सी मानसिक प्रताड़ना होगी कि अनारकली ने स्कूल जाना छोड़ दिया होगा..! क्या हम कल्पना कर सकते हैं कि देश के स्कूलों में दलित-वंचित तबकों के वे तमाम बच्चे स्कूल जाना इसलिए छोड़ देते हैं कि स्कूल कई बार उन्हें सामाजिक यातना और अपमान के ठिकाने लगने लगते हैं..! तो इस सिरे से जुड़े अनारकली के तेवर शुरू से ही बगावती रहे, इसलिए बाद में अगर किसी पर उसका चप्पल चल जाता है, रंगीला के चांटे के बदले वह उसे उससे ज्यादा जोर का चांटा लगा देती है, कभी वह किसी पेशाब करते लड़के के साइकिल को लेकर तेजी से भाग जाती है तो कभी सीधे धर्मेंद्र चौहान की निजी महफिल में ताली बजा कर पीट कर बताने चली जाती है कि 'हम तुमको चांटा मारे थे' तो यह कहीं से भी जबरन या अस्वाभाविक नहीं लगता है!

Anaarkali-Of-Aarah2इसके अलावा, ग्रामीण और कस्बाई इलाकों में रंगीला यादव की 'रंगीला संगीत मंडली' जैसी मंडलियों के समाज का चेहरा देखा जाए, तो शायद अनारकली, अनवर, चचा या खुद रंगीला अमूमन हर मामले में सत्ता के सामाजिक ध्रुव के बरक्स हाशिये के समाज पर ही दिखेंगे...। पता नहीं 'तीसरी कसम' का हिरामन केवल हिरामन था या नहीं! लेकिन 'अनारकली...' का हिरामन अगर केवल हिरामन ही रहता तो मेरी नजर में वह हिरामन तिवारी से ज्यादा अहम होता...! इसके बावजूद, फिल्म में कई ऐसी हिम्मत दिखती है कि हिरामन तिवारी को अपवाद में हिरामन के तौर पर स्वीकार कर लिया जा सकता है! एक विश्वविद्यालय के वीसी धर्मेंद्र चौहान और बुलबुल पांडेय के जरिए शायद फिल्मकार ने यह दिखाने की कोशिश की है कि सत्ता और उसके तंत्र की कमान आखिर समाज के किन तबकों की अंगुलियों में हैं..! खासतौर पर वीसी धर्मेंद्र चौहान के गले में लटका दिखता सफेद धागे का मोटा माला दरअसल 'जनेऊ' का आभास देता है। 'गुड्डू रंगीला' फिल्म का वह दृश्य याद आता है जब खाप पंचायत में खड़े 'जाट' बिल्लू को बनियान के ऊपर से ब्राह्मणों वाला जनेऊ पहने दिखाया जाता है..! फिर अनारकली को अपनी गीता के लिए लिखी शायरी सुनने के बदले मुफ्त में लिप्स्टिक देने वाले दुकानदार की एक लाइन एक त्रासद सामाजिक बयान है- 'हमारा नाम नहीं बोलिएगा, नहीं त खेला हो जाएगा... कास्ट का प्रोब्लम है..!' यहां एक शब्द 'कास्ट' डाल देने के बाद इस दृश्य का क्या महत्त्व हो गया है, यह अलग से बताने की जरूरत नहीं है! इस तरह के प्रयोग पर्दे पर बदलते समाज की जरूरत का अहसास करते हैं..!

जो हो, इस फिल्म का आखिरी सीन आंखों में ठहर गया लगता है। धर्मेंद्र चौहान या ब्राह्मणवादी सामंती मर्दवाद को सरेआम बेपर्द करके जलील करने के बाद अनारकली जब अपने रास्ते में अकेले निकल पड़ती है तो सुनसान सड़क पर उसके चेहरे के आजाद भाव, जीत की मुस्कान के साथ सिर झटकने से लेकर अपने घाघरे को झटका देकर हवा में उड़ाने की बेफिक्री का दृश्य रचना आसान नहीं!

अब सवाल है कि स्टेज पर गाने-नाचने वाली अनारकली में यह आग क्यों दिखती है कि वह पूरी फिल्म में कहीं भी किसी मर्द और उसकी धौंस के आगे दबती नहीं है। बल्कि वह चाहे उसकी संगीत मंडली का मालिक रंगीला हो, पुलिस वाले या फिर दबंग वीसी धर्मेंद्र चौहान...!

हो सकता है कि इसे कोई इस तरह देखे कि अनारकली जिस तरह के गीत-संगीत की दुनिया में होती है, उसमें ऐसी बातें आम होने की वजह से अभ्यस्त हो गई होगी। लेकिन सच इससे इतर भी हो सकता है। ग्रामीण समाजों या फिर शहरों की दलित-पिछड़ी जातियों के परिवारों के बीच जीवन को जिसने करीब से देखा होगा, उसे याद आ सकता है कि कदम-कदम पर अनारकली जिस प्रतिरोध के साथ खड़ी हो जाती है, यानी कभी रंगीला को थप्पड़ के बदले ज्यादा जोर का थप्पड़, चिढ़ाने वाली छोटी बात पर धर्मेंद्र चौहान के एटीएम नाम के शख्स पर चप्पल चला देने से लेकर मंच पर खुद को छेड़ते धर्मेंद्र चौहान को आखिरकार जोर का चांटा लगा देना...! फिर उसके घर जाकर एक उल्टे हाथ से तालियां बजा कर चुनौती के लहजे में यह कहना कि 'हम चांटा मारे थे आपको' या उसके घर में बुलाए जाने के बावजूद दबाव के सामने नहीं झुकना और यहां तक कह देना कि 'पइसो ले लेंगे और देबो नहीं करेंगे... जो करना है, कर लीजिए... बाकी कुत्ते हैं आप... भौंकते रहिए...!'

यह सब करने या लोकलाज की परवाह किए बिना अपने खिलाफ किसी बर्ताव या दमन का सार्वजनिक रूप से प्रतिरोध जताने की हिम्मत और इसका जीवट आमतौर पर समाज के हाशिये पर जीने वाले दलित-वंचित जातियों के परिवारों की महिलाओं के बीच ही देखा जाता है। वे समाज में जेंडर और जाति की अवस्थिति की वजह से होने वाले शोषण और दमन के तौर-तरीकों को ज्यादा बर्दाश्त नहीं कर पाती है और विरोध करते हुए मौखिक से लेकर शारीरिक प्रतिरोध भी जताती है। तो अगर इसकी छौंक अनारकली में साफ दिखती है, अपनी मर्जी के खिलाफ किसी की भी किसी हरकत पर उसे बख्शती नहीं है, तो यह दरअसल एक खुली तस्वीर है कि अनारकली समाज के किस हिस्से की नुमाइंदगी कर रही है!

यह ध्यान रखने की बात है कि नाचने-गाने वाली से लेकर देह-व्यापार तक में झोंक दी गई महिलाओं में से ज्यादातर दलित-पिछड़ी जातियों से ही आती हैं। और यही वजह है कि इन्हें इतनी आसानी से 'उपलब्ध' मान लिया जाता है और इनके खिलाफ मनमानी करने वाले सामंती मिजाज वाले लोग जरा भी नहीं हिचकते हैं। बड़ी तादाद में स्त्रियों के #इस काम में लगे होने की व्यवस्था भी शायद इसी नाते चलने दी जाती है। अगर अपमान, शोषण और दमन के कुचक्र में फंसी ये महिलाएं सत्ताधारी सामाजिक तबकों का चेहरा होतीं तो इस त्रासदी की शक्ल आज शायद यही नहीं होती।

जो लोग समाज, जाति-व्यवस्था, उसकी हाइरार्की, उसमें सामाजिक हैसियत के मनोविज्ञान से तय होने वाले नाम की परतें उधेड़ सकते हैं, उनके लिए यह समझना मुश्किल नहीं होगा कि 'चमकी देवी' किसी सवर्ण महिला का नाम नहीं होता है, न 'रंगीला' किसी सवर्ण पुरुष का नाम होता है। इसलिए कई बार ऐसा लगता है कि पटकथा, संवाद लेखक से लेकर निर्देशक अविनाश ने जानबूझ कर परदे पर समाज के साथ इतना बारीक खेला है।

सहानुभूति दया की शक्ल में यथास्थितिवाद का औजार होती है। यह फिल्म मेरे लिए मुग्ध होने का मसला इसलिए है कि रोने-गाने को यथार्थ दृश्यों की तरह जीवंत करने और सामाजिक त्रासदी को नियति की तरह पेश करने के बजाय शासित और पीड़ित ध्रुव की ओर से प्रतिरोध और बगावत का एक खास मकसद सामने रखती है...! वर्चस्व की सत्ता प्रतिरोध और बगावत की आवाज ही सुनती है...! यह फिल्म और फिल्मकार इसलिए मेरे लिए मुग्ध होने का मामला है...!

~~~

 

अरविंद शेष हिंदी भाषा के एक जाने माने पत्रकार , लेखक एवं कवि हैं और चार्वाक के नाम से अपना ब्लॉग चलाते हैं। उनसे This email address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it. पते पर संपर्क किया जा सकता है।

Other Related Articles

The revolution is a tea party for the Indian left
Friday, 05 May 2017
  Kuffir Sitaram Yechury's concerns have been consistently strange: do the communists in India really stand for the working classes? Who do they stand for, which class do they represent exactly?... Read More...
वे अपनी आंखों में समानता स्वतंत्रता का नीला सपना लिए चले थे
Friday, 05 May 2017
  अनिता भारती (Anita Bharti) ओम प्रकाश वाल्मीकि जी को याद करते हुए हमने अपनी समूची... Read More...
'अनारकली ऑफ आरा': हाशिये के समाज की हौसले से लबरेज बगावत...!
Tuesday, 02 May 2017
  अरविंद शेष (Arvind Shesh) दुख से पैदा हुआ जीवट जब दुख को पैदा करने वालों के सामने... Read More...
The Homicidal Republic - India i.e. भारत
Thursday, 27 April 2017
  Anshul Kumar  Victor Hugo once said, "There is in every village, a torch-the teacher, an extinguisher-the priest." Village becomes homicidal if teachers are priests in disguise and vice... Read More...
Hindu nationalism and Muslim nationalism co-produce each other: Khalid Anis Ansari
Monday, 24 April 2017
  Round Table India In this episode of the Ambedkar Age series, Round Table India talks to Prof. Khalid Anis Ansari, Director, Dr. Ambedkar Centre for Exclusion Studies & Transformative... Read More...

Recent Popular Articles

Wherever Caste exists in the World, Ambedkar and Marx will remain Irreconcilable
Wednesday, 30 November 2016
  Dr Manisha Bangar NVP BAMCEF In India, and wherever in the world Caste exists, Ambedkar and Marx will remain Irreconcilable. Starting from the happenings in Hyderabad Central University in... Read More...
The cashlessness of the Bahujan
Thursday, 15 December 2016
  Kuffir How are you going to break up Caste, if people are not free to consider whether it accords with morality? ~ Babasaheb Ambedkar The saddest joke is Modi's promotion of a cash-less... Read More...
From Breast Tax to Brahminical Stripping in Comics: Orijit Sen and Brahmin Sadomasochism
Thursday, 02 March 2017
  Pinak Banik "Only dead dalits make excellent dalits.Only dead dalits become excellent sites where revolutionary fantasies blossom!" ~ Anoop Kumar The context for this article centers around... Read More...
Interview with Prof Vivek Kumar on the Bahujan Movement
Monday, 13 March 2017
  Round Table India In this episode of the Ambedkar Age series, Round Table India talks to Prof Vivek Kumar, Professor, Centre for the Study of Social Systems, School of Social Sciences,... Read More...
Brahmin Feminism sans Brahmin Patriarch
Monday, 06 February 2017
  Kanika S It has almost become common sense that feminism has been shaped exclusively by a class of women that came from Brahmin-Savarna castes in India, to the extent that even trashy... Read More...

Recent Articles in Hindi

पेरियार से हम क्या सीखें?

पेरियार से हम क्या सीखें?

  संजय जोठे  इस देश में भेदभाव और शोषण से भरी परम्पराओं का विरोध करने वाले अनेक विचारक और क्रांतिकारी हुए हैं जिनके बारे में हमें बार-बार पढ़ना और समझना चाहिए. दुर्भाग्य से इस देश के शोषक वर्गों के षड्यंत्र के कारण इन क्रांतिकारियों का जीवन परिचय और समग्र कर्तृत्व छुपाकर रखा जाता है. हमारी अनेकों पीढियां इसी षड्यंत्र में जीती आयीं हैं. किसी देश के उद्भट विचारकों और क्रान्तिकारियों को इस...

Read more

कृष्ण: भारतीय मर्द का एक आम चेहरा...!

कृष्ण: भारतीय मर्द का एक आम चेहरा...!

(कृष्ण की लोक लुभावन छवि का पुनर्पाठ!)मानुषी आखिर ये मिथकीय कहानियां किस तरह की परवरिश और शिक्षा देती हैं, जहां पुरुषों को सारे अधिकार हैं, चाहे वह स्त्री को अपमानित करे या दंडित, उसे स्त्री पलट कर कुछ नहीं कहती। फिर आज हम रोना रोते हैं कि हमारे बच्चे इतने हिंसक और कुंठित क्यों हो रहे हैं। सारा दोष हम इंटरनेट और टेलीविजन को देकर मुक्त होना चाहते हैं। जबकि स्त्री...

Read more

राष्ट्रवाद और देशभक्ति

राष्ट्रवाद और देशभक्ति

संजय जोठे धर्म जो काम शास्त्र लिखकर करता है वही काम राष्ट्र अब फ़िल्में और विडिओ गेम्स बनाकर बनाकर करते हैं. इसी के साथ सुविधाभोगी पीढ़ी को मौत से बचाने के लिए टेक्नालाजी पर भयानक खर्च भी करना पड़ता है ताकि दूर बैठकर ही देशों का सफाया किया जा सके, और यही असल में उस तथाकथित “स्पेस रिसर्च” और “अक्षय ऊर्जा की खोज” की मूल प्रेरणा है, यूं तो सबको...

Read more