बाबासाहिब की विरासत

 

ललित कुमार (Lalit Kumar)

lalit kumarभारत रत्न डा. भीमराव अम्बेडकर का एक प्रसिद्ध कथन है जिस तरह मनुष्य नश्वर हैं. उसी तरह विचार भी नश्वर हैं. एक विचार को प्रचार-प्रसार की ज़रुरत होती है, जैसे कि एक पौधे को पानी की. नहीं तो दोनों मुरझा कर मर जाते हैं.ये इस देश की और खास कर उस दबे कुचले अश्प्रिश्य समाज की विडम्बना हि कही जायेगी कि जिन डा. अम्बेडकर को अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति श्रीमान ओबामा ये कह कर याद करते हैं कि अगर डा. अम्बेडकर हमारे यहां जन्मे होते तो हम उन्हें सूर्य कह कर पुकारते, जिन्हें विश्व प्रसिद्ध कोलम्बिया विश्व विध्यालय के अब तक के 100 शीर्ष विध्यर्थियो में स्थान प्राप्त है, उनके विचारों की बहुमूल्य विरासत को भारत में उसी तरह मर जाने के लिये छोड़ दिया गया जैसे एक पौधे को बिना पानी के अपनी ही मौत मरने के लिये छोड़ दिया जाता है. ये इस देश की उस एक चौथाई आबादी का कैसा दुर्भाग्य है जो डा. भीमराव अम्बेडकर को श्रद्धा से बाबासाहिब कहती है, अपना मसीहा, अपना भगवान मानकर पूजती तो है लेकिन मानसिक दासता, सामाजिक और आर्थिक असमानता, शोषण और अत्यचार को धूल चटा कर रख देने उनके विचारों की शक्ति से बहुदा अनभिज्ञ है.

ये सामाजिक बदलाव को समर्पित मार्क्स के विचारों की ताकत ही थी जिसने रूस की सारे विश्व के परिदृश्य को बदलकर रख देने वाली क्रांती को जन्म दिया. लेकिन मार्क्सवाद की भारत में व्यव्हारिकता पर महान अर्थ्शास्त्री, समाजशास्त्री और मानवशस्त्री डा. अम्बेडकर के विचार थे कि भारत के सामाजिक ढाँचे की खामियाँ आर्थिक असमानता पर आधारित नहीं हैं इसीलिये वर्ग संघर्ष पर आधारित समाजवाद या मार्क्सवाद इसका इलाज नहीं हो सकता. यूँ तो बाबासाहिब का योग्दान श्रमिक वर्ग, महिला शसक्तीकरण, आर्थिक नियोजन से लेकर देश की बहूद्देशिय परियोजनाओ तक है. लेकिन उनके क्रांतिकारी विचारों की अगर सबसे ज्यादा कही जरूरत थी तो थी देश के समाजिक ढाँचे के कारण फैली असमानता को दूर करने के लिये. देश हर साल 14 अप्रैल को विभिन्न सरकारी व गैरसरकारी कर्यक्रमो के माध्यम से भारत रत्न डॉ० भीमराव अंबेडकर को याद तो करता है लेकिन समता पूरक समाज निर्माण के उद्देश्यपरक उनके अमूल्य क्रांतिकारी विचारों को अबतक न सिर्फ अनदेखा किया गया है अपितु कुछ समय से तो एक ऐसे सामाजिक वातावरण को प्रोत्साहित किया गया है जो बाबासाहिब के क्रांतिकारी विचारों को हतोत्साहित करे.

इसे हमारे देश की बदनसीबी हीकहा जायेगा कि इसका आम जनमानस और अधिकतर नीतिनिर्माता इसकी जाति आधारित असमानता को मार्क्सवाद के वर्ग संघर्ष से इतर न तो सही तरह समझ पाये और न ही इसे दूर करने के लिये क्रित संकल्प ही रहे. इससे अधिक दुर्भाग्य और क्या होगा कि पिछले कुछ वर्षों में वर्ग संघर्ष की ये अवधारणा बडी़ ही है. इसीलिये रह रह कर आरक्षण का आधार जातिगत से हटाकर आर्थिक करने की आवाजें उठती रहती हैं. लेकिन क्या भारत से जातिगत असमानता दूर हो गयी है, क्या जातिगत शोषण का खात्मा हो गया है, क्या एक जाति का व्यक्ति अन्य जाति के व्यक्ति कोसमानता, भ्रात्रित्व की भावना से देखता है. निश्चित ही ये बदलाव नहीं हुए है. चातुर्वर्ण्य आधारित जातिव्यवस्था जो इस देश का सहस्रो वर्षों का कलंक है उसका खात्मा तब तक नहीं हो सकता इस व्यवस्था को बाबा साहिब की रचित पुस्तकों "हू वर शूद्राज", "हू वर अंटचएबल्स"" के माध्यम से इसे समझ नहीं लिया जाता और "ऐन्हिलेशन औफ कास्ट" में बताए गये उपायो को सहजता पूर्वक अपनाने की राज्नीतिक इच्छा शक्ति नहीं दिखाइ जाती.

यह इस देश की बहुत बडी़ त्रासदी है कि राजनीतिक स्वर्थो के चलते देश के लिये विनाशक और अंततह देश के सम्विधान के लिये भी विनाश्कारी हो चली इसी समाजिक असमानता को दूर करने के लिये सम्विधान सभा में 25 नवंबर 1949 को दिये गये अपने याद्गार भाषण में जो चेतावनी दी थी कि हजारों जातियों में बंटे भारतीय समाज का एक राष्ट्र बन पाना आसान नहीं होगा,उसमें कोताही बरती गयी. क्या यह देश की सेहत के लिये अच्छा न होता कि जो लोग एक भारत एक राष्ट्र की बात करते हैं उन्हें डा. भीमराव अम्बेडकर के 25 नवंबर 1949 को सम्विधान सभा में दिये गये उनके दर्शन से राष्ट्रवाद को समझते. सम्विधान सभा में डा. अम्बेडकर ने कहा था कि 'भारत एक बनता हुआ राष्ट्र है. अगर भारत को एक राष्ट्र बनना है, तो सबसे पहले इस वास्तविकता से रूबरू होना आवश्यक है कि हम सब मानें कि जमीन के एक टुकड़े पर कुछ या अनेक लोगों के साथ रहने भर से राष्ट्र नहीं बन जाता. राष्ट्र निर्माण में व्यक्तियों का मैं से हम बन जाना बहुत महत्वपूर्ण होता है.'उनके इस कथन से बड़कर राष्ट्रवाद और क्या होगा कि'यदि हम एक संयुक्त एकीकृत आधुनिक भारत चाहते हैं तो सभी धर्मों के धर्मग्रंथों की संप्रभुता का अंत होना चाहिए' . राज्नीतिक इच्छशक्ति का भी ये कैसा विरोधाभास है कि देश की प्रमुख राज्नीतिक पार्टियाँ बाबासाहिब के नाम पर वोट की फसल तो काटती हैं लकिन उनके विचारों को पूरी तरह दफ्ना कर.

देश की चौथाई आबादी जिन्हें दलित भी कहा जाता है और जिनके उद्धार के लिये उनकेबाबासाहिब ने जीवन भर संघर्स कीया जिसे बाबासाहिब के विचारों की नीव पर मानवता की एक शानदार इमारत खड़ी करनी चाहिये थी उसने तो उनके विचारो की विरासत के साथ और भी नाइंसाफी कि है. पीड़ी दर पीड़ी बाबासाहिब के अथक प्रयत्नों से मिले आरक्षण का लाभ तो लेती रही लेकिन अपने समाज, अपनी भावी पीड़ीयों कि खातिर इन्होने बाबासाहिब के बहुमूल्य विचारों का जो प्रचार प्रसार करना चाहिये था वो नहीं किया. अपने अनुयायियों की इन्ही सब बातों से त्रस्त होकर बाबासाहिब कहा करते थे कि मुझे मेरे समाज के पड़े लिखे लोगों ने धोखा दिया है. कितने आश्चर्य की बात है कि आज भी अधिकतर दलित वर्ग के पड़े लिखे लोगों के घड़ों में उनके भगवान उनके अपने बाबासाहिब की एक अच्छी सी जीवनी भी नहीं होती. बाबासाहिब की प्रसिद्ध पुस्तक, 'एनिहिलेशन ऑफ कास्ट' जिसने साहिब कांशीराम की जिंदगी की धारा ही बदल्दी उस पुस्तक में उद्ध्रित विचारों के बारे आम जनमानस को कोइ जानकारी हो ऐसी कल्पना करना तो फिर बैमानी होगी. ऐसा तब है जब बाबासाहिब को भारत्न मिले हुए भी लगभग 27 वर्ष हो गये. ऐसी उदासीनता तब है जबकि ये एक शास्वत सत्य है कि जिसने भी बबासाहिब के साहित्य को पड़ा है वो एक नयी उर्जा और नये आत्मविश्वास के साथ उनके मिशन को आगे बडाने में जुत गया है.

इसमें कोई दो राय नहीं कि अगर समाज के पड़े लिखे लोगों ने बाबासाहिब के विचारो को शिरोधार किया होता तो उन्हें पता चलता कि आखिरकार 1936 में ही बाबासाहिब ने क्यूँ कह दिया था कि 'मैंने एक हिंदू के रूप में जन्म लिया है कयुंकी वो मेरे वश में नहीं था लेकिन में एक हिंदू के रूप में मरूंगा नहीं'. उन्हें समझ आ जाता कि क्यूँ 14 अक्टूबर 1956 को नागापुर में दीक्षा भूमि में उन्होनें अपने लगभग पाँच लाख अनुयायियों के साथ हिंदू धर्म छोड़कर बौद्ध धर्म में दीक्षा ले ली थी. न सिर्फ दीक्षा ली थी वरन अपने अनुयायियों को हिंदू धर्म के मिथक और आडम्बरों से सावधान रहने की 22 प्रतिग्याये भी दिलवाई थीं. साहिब कांशीराम और बहन कु. मायावती के संघर्ष की सफलता ने ये सिद्ध करके दिखया है कि अगर देश के दलित और पिछड़े तबके ने बाबासाहिब के विचारों का अनुसरण किया होता तो आज आज़ादी और आरक्षण के लगभग सात दशक बाद भी देश की सत्ता, शासन और प्रशासन में भयंकर असमानता की ऐसी हालत न होती कि इन वर्गों कीलगभग 65% जनसंख्या की भागेदारी देश के प्रशासनिक, न्यायिक और वैधानिक क्षेत्र की असल प्रभावकारी जगहों पर लगभग नगण्य ही रहती. इसके उलट इसमें कोई शक नहीं है कि अगर सम्पूर्ण देश के दबे कुचले वर्गो ने बाबा साहिब के विचारों को भी उन्ही की तरह अपने दिल की गहराइयो में जगह दी होती तो ज़रूर इस देश में भी क्रांति आयी होती और इन वर्गों की संतानें इस देश की शासक कौम बनी होती.

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Lalit Kumar is a Mechanical Engineer of 1996 batch from NIT, Kurukshetra. At present he is employed in the Ministry Of Defence/Department Of Defence P & S, Government of India.

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