Brahminical Patriarchy and Social Media

 
Bhagyesha Kurane

bhagyeshaSocial media has become an integral part of our lives these days. There are various notions prevalent about whether one should use social media, and if at all it is to be used, then how. Some people view social media only as a tool to pass their time and beyond a certain limit, see any engagement as wastage of time. Many parents are wary of social media out of concern for their daughters who might be harassed by anti-social elements and hence warn them to stay away. At the same time, social media helps one to connect with many people whether we may know them personally or not and it is through such communication that exchange of thoughts takes place. I also joined social media thinking of exploring the possibility of whether this media can be used as a viable alternative option to traditional media. So I started communicating with people through media such as WhatsApp and Facebook. I have been using Facebook for the past six years now. While I think about social media as an alternative to traditional media, it also becomes imperative for me to discuss about safety and security of girls/women in detail. Of course, it is also related in the context of the recent Amar Khade incident.

First of all, we need to take into account that in our brahminical patriarchal society there are certain rules that girls are supposed to follow, as far as use of mobile phones is concerned. Many a times it is just out of necessity that a girl is allowed to use a mobile phone albeit with certain harsh restrictions. The reason being the caste based society considers the girl as the 'honour' of the family. So her parents fear that through mobile phone she may come in contact with someone and get emotionally involved, thus marrying the person out of her own volition and this can result in loss of 'honour' for the family. That's why parents try to limit the use of mobile phones as far as possible and hence check call records and other details on mobile phones. In such a situation, for many girls to be able to use and access social media freely itself becomes a daunting task. Defying traditional restrictions she tries to express herself through social media. But our brahminical patriarchal society looks at her as a form of readily available entertainment instead of looking at her as an individual human being. That's why, often, these girls have had to face sexual exploitation in the online world.

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जाति पाति: आदर्श और हक़ीकत (पंजाब के सन्दर्भ में)

 
Sardar Ajmer Singh (सरदार अजमेर सिंह)

(यह आलेख आज़ाद भारत के पंजाब प्रांत में दलित/पछड़ा वर्ग एवं सिख के 'हम हिंदू नहीं' दृष्टिकोण का ब्राह्मणवादी आर्य समाज और इसके पोषक बन गए राजनीतिक दलों के बरक्स जो भी हुआ है, उसका ऐतिहासिक विवरण है। पंजाब की राजनीति को देखने, समझने और परखने का, पाठकों को, यह आलेख बढ़िया मौका प्रदान करता है। सरदार अजमेर सिंह द्वारा लिखी यह रचना उनकी पंजाबी में लिखी बहुचर्चित किताब 'बीसवीं सदी की सिख राजनीति - एक ग़ुलामी से दूसरी ग़ुलामी' से ली गई है, एवं अनुदित है - गुरिंदर आज़ाद [अनुवादक])
s ajmer singh
बेशक़ गुरु साहेबान (सिख गुरु) ने हिन्दू समाज की सबसे बड़ी लाहनत, जाति पाति प्रणाली का, सिद्धांत और अमल के स्तर पर ज़ोरदार खंडन करते हुए, सिख समाज में इसकी पूरी तरह से मनाही कर दी थी। गुरु काल के बाद धीरे धीरे सिखी के बुनियादी सिद्धांत कमज़ोर पड़ने शुरू हो गए। जिन हिंदूवादी अभ्यासों का गुरु साहेबान ने खंडन किया था, उन्होंने सिख धर्म और समाज को फिर से अपने क़ातिलाना शिकंजे में ले लिया। हिन्दूवाद के दुष्प्रभावों का सबसे गाढ़ा इज़हार सिख पंथ में जात पात प्रणाली की फिर से अमल के रूप में हुआ। ऐसे अनेक ऐतिहासिक प्रमाण और हवाले मिलते हैं जो उनीसवीं सदी तक सिख पंथ के फिर से जात-पात प्रबंध की मुकम्मल जकड़ में आ जाने की पुष्टि करते हैं। 

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जट्टवाद एक दीर्घ रोग

 

सरदार अजमेर सिंह (Sardar Ajmer Singh)

(यह लेख सरदार अजमेर सिंह की बहुचर्चित किताब 'बीसवीं सदी की सिख राजनीति: एक ग़ुलामी से दूसरी ग़ुलामी तक' जो कि पंजाबी भाषा में है, से हिंदी में अनुदित किया गया है सरदार अजमेर सिंह पंजाब के एक जाने माने इतिहासकार हैं। ब्राह्मणवाद की गहन समझ रखने वाले अजमेर सिंह महसूस करते हैं कि पंजाब अपने असली इतिहास के साथ तभी बच सकता है, एवं उसका भविष्य सुरक्षित हो सकता है अगर वह अलग सिख स्टेट बने। पंजाब की तारीख़ का सिख परीपेक्ष्य में मूल्यांकन करने वाले शायद वह इकलौते साहित्यकार हैं जिन्होंने ब्राह्मणवाद की नब्ज़ को पकड़कर सिखों में घुस चुके ब्राह्मणवाद की निशानदेही की है। उनकी लिखी किताबों के माध्यम से व्यापक जगत ने दृष्टिकोण के वह कोने भी छूये हैं जिससे खुद सिख संसार अनभिज्ञ था या यूं कहिये ब्राह्मणवादी स्टेट ने ऐसा कर दिया था। उनके इस आलेख में वह जट्टवाद को परत दर परत खोलते हैं। सिख एवं दलित बहुजन दृष्टिकोण से यह लेख बेहद पठनीय है। ~ गुरिंदर आज़ाद [अनुवादक])

s ajmer singh

पंजाब के जट्ट भाईचारे की शुरुआत को लेकर कई तरह की बातें प्रचलित हैं। ज़्यादा वज़नदार विचार यह है कि इसके पुरखे मध्य एशिया के 'हून' और 'सीथियन' नाम के ख़ानाबदोश कबीलों से ताल्लुक रखते थे जिन्होंने इस इलाके में आर्य लोगों की घुसपैठ से काफी समय बाद निवास करना शुरू किया। क्यूंकि इन कबीलों का कोई पक्का ठिकाना नहीं था और उनका जीवन निर्वाह ज़्यादातर मार-धाड़ पर ही टिका हुआ था, इस कारण वीरता और लड़ाकूपन इनके खून में घुलमिल गया था। उनका नंबर संसार के नामी मुहिमबाज़ और मारखोर टोलों में आता है। समझा जाता है कि उन्होंने उनसे पहले आबाद हुए आर्य लोगों को खदेड़ के गंगा के मैदान की तरफ धकेल दिया था और इस भू-हिस्से में पक्के ठिकाने बनाकर खेती का व्यवसाय शुरू कर दिया। इसी वजह के चलते गंगा के मैदान में ब्राह्मण पुजारीवाद के असर तले पैदा हुए सभ्याचार का पंजाब के ग्रामीण मालिक किसानों पर उतना गाढ़ा रंग नहीं चढ़ा जितना पंजाब से बाहर अन्य किसान भाईचारों पर देखने को मिलता है। पंजाबी किसान, काफी हद तक, एवं काफी देर तक, इस सभ्याचार से अलग-जुदा रहा है। कबाईली नमूने की आर्थिक एवं भाईचारक बनावट ने पंजाबी ग्रामीण-किसान भाईचारे में भाईचारक-भाव, आज़ाद तबियत और बराबरी की जो स्पिरिट भर दी, वह पंजाबी जट्ट किसान के आचार का एक उभरा हुआ लक्षण हो गुज़रा। उसके स्वभाव और आचरण का दूसरा अहम् लक्षण शख्सियत प्रस्ति है। अर्थात वह हद दर्जे का व्यक्तिवादी है। आम तौर पर जट्ट वही सब करता है जो उसे खुद को अच्छा लगता है। इसका दूसरों पर पड़ने वाले प्रभाव की उसको कोई ख़ास परवाह नहीं होती। न वह इसमें किसी का दख़ल सहन करता है। उसमे खुद पर भरपूर भरोसा, जो अक्सर घमंड का रूपधारण कर लेता है, कमाल का ऊधम और बेशुमार पहल कदमी है। सो जहाँ लीडरों की अगुआई का इंतज़ार किये बिना व्यक्तिगत पहल कदमी और ऊधम की ज़रुरत है, वहाँ वह पूरा कामयाब है। पर जहाँ कामयाबी के लिए चिंतन और जथेबंदी की ज़रुरत पड़ी तो वह अक्सर फेल हुआ; सिवा ऐसे मौकों के कि जब किसी नामवर शख्सियत ने, या सांझे आदर्श या निश्चय ने या सांझे खतरे ने उसे जथेबंद होने के लिए प्रेरित करने में सफलता हासिल कर ली। जट्ट किसान में राज-काज का उतना कौशल या तज़ुर्बा नहीं, जितना खेती का है। इस लिए जहाँ भी, और जब भी, उसने अपनी फितरत के पीछे लग के राज करने का जतन किया, तो वह अक्सर फेल हुआ है।

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मुलगा पहायला आला

 

Vidya

vidya

"मुलगा पहायला आला"

 मुलगा पाहायला येतो तेव्हा मुलीला काय वाटत असेल? आज मला मुलगा पाहायला आलेला. मुलगा पाहायला येणं म्हणजे नेमकं काय? जेव्हा मुलगी "वयात येते", म्हणजे कि ती प्रेम किंवा मुलांशी मैत्री वगैरे करायला लहान असते मात्र लग्न करून संसार करायला समर्थ असते, तेव्हा तिचा बाप (किंवा घरचा करता पुरुष,..हो फक्त पुरुषच ..कारण हा अधिकार बायकांना नाहीच) हा मुलगा शोधतो ... अर्थातच जातीचा आणि 'स्टेटस' चा (मुलीचं मेंटल, इमोशनल, फिसिकल स्टेटस नाही, ते गेलं चुलीत)..शोधण्याची मोहीम हि वेबसाईटवर तर कमी होते पण काका, मामा, ताईच्या सासऱ्यांच्या बहिणीचा दिराचा मावस भाऊ, अगदी सगळेच, कोणीपण, हे सगळं करतात...काय सुख मिळतं यांना काय माहीत... May be मला वाटतं कि मुलगी वयात आली आहे तर त्यांना sense of pride वाटत असणार कि त्यांनी तिचे कदम "डगमगण्या अगोदरच" तिला वाचवले .. त्यांना कितीही पिण्याचे, दुसऱ्या बायकांचे व्यसन असले तरी मुलीने मात्र स्वतःच्या मनाप्रमाणे मुलगा बघू नये हि त्यांची "निरागस" आशा असते .. असो..

मग मुलगा सुचवायचं कार्यक्रम सुरु झाला कि सर्व decide होत.. मुलगी चुकून नौकरी करत असेल आणि सुट्टी मिळणं अव्हघड असेल या बघण्याच्या कार्यक्रमासाठी तरी ती office मध्ये काही कारण देऊन "स्व-इच्छेने" जाते .. मामा काका भाऊजी या सर्वांना विचारून मात्र दिवस ठरवतात आणि त्या मुलाच्या जॉब प्रमाणे सगळं ठरत कारण कि त्याचा जॉब महत्वाचा .. आणि समजा जर मुलीला जॉब नसेल तर तिला एकाच प्रश्न विचारतात कि "नाश्त्यामध्ये कोणती मिठाई खाशील बाळा? बाप तोपर्यंत मुलाचं नाव पण पूर्ण सांगत नाही कारण कि Facebook वर पोरीने search करू नये म्हणून .. कारण मुलीने उगीच काही "उकरून काढल" तर काय? आणि Facebook तुमचा फक्त चेहरा दाखवत नई तर तुमचे मित्र, लाईक्स, विचार सगळं काही दाखवतं...आणि हे असल काही मुलीला अगोदर कळू नये... मुलीने मुलाला नापसंत केला म्हणजे कि बापासाठी अपमानजनक गोष्ट .. आणि मग मुलीला एवढे superpowers कोणी दिले म्हणून लोकं तोंडात शेण घालतील .. मग आई आत्या यांच्यावर मोठी जबाबदारी असते कि मुलीला नीट नेसावे . असो.

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Where are the Women Professors from the SC/ST/OBC categories?

 

Prachi Patil

Prachi-BeaulaSpeech made at the protest organised by United OBC Forum and BAPSA on 9th June, 2016 against the discriminatory Anti-OBC Reservation circular of UGC/MHRD which denies OBC reservations in Faculty Recruitments and Promotions.

Jai Bhim Friends,

I will only take a few minutes of your time. Speakers before me have placed their important points on the issues of OBC reservation in Higher Education and Faculty Recruitment and spoken about the new Anti-OBC Reservation circular by UGC/MHRD. I will specifically talk about the condition of SC/ST/OBC women's representation in academic spaces, be it as students or as professors. Friends, few days back I was reading an article titled 'Dalit Feminist Standpoint' and when I read the author's name I found that the author was a Brahman woman! So you can see for yourself the condition of SC/ST/OBC women.

What is the reason that a Dalit woman is not allowed to write about her own standpoint in the academic spaces and that standpoint is written by upper-caste or Brahman women? Friends, I see many upper-castes writing papers and thesis on 'Dalit patriarchy' but someone needs to tell them that Dalit patriarchy is a matter concerning Dalit women and you should leave it to them, Dalit women have been fighting against it since ages. You should talk about your own patriarchy and casteism which you practise against SC/ST/OBC women to keep them out of the academic sphere. I want to question the Savarna women feminists from this platform, you speak of 'sisterhood', you speak of 'gender equality', you speak of 'gender justice', you speak of 33% Women's Reservation Bill, but I want to know why you are silent on the issue of 'reservation within reservation' in the Women's Reservation Bill? I wish to know when will SC/ST/OBC women get representation within the demand of 33% Women's Reservation Bill? Many friends have spoken before me about the reservation for OBC candidates, but let us not forget to include women in this. SC/ST/OBC women must have 50% representation within the SC/ST/OBC reservation.

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Dr. Ambedkar's Invaluable Advice on the Sikh Right to Self-rule

 

Sardar Ajmer Singh

This article is an excerpt from S. Ajmer Singh's book "Biswi Sadi Ki Sikh Rajneeti: Ek Ghulami Se Dusri Ghulami Tak" (The Sikh Politics of the 20th Century: From One Slavery to Another)

s ajmer singh

On the circumstances emerging after the partition of Punjab, and the creation of a Self-ruled Sikh state

After the partition of India, there was a significant shuffling of the various classes in proportion to the overall population in East Punjab. The Hindus and Sikhs of Western Punjab and the northwestern border areas were forced to leave their homes and cross the border into the newly formed Indian state. And from this side of the border, the Muslim population of Eastern Punjab moved en masse to West Punjab. The displaced or uprooted Sikh families from Lyallpur, Mintgumri and Sheikhupura came and settled in their ancestral villages in the Jalandhar division. A large part of the displaced Hindu population from Pakistan went and settled in the areas lying on the other side of the river Ghaggar. This shuffling or change in the population severely affected the relations between both the Hindu and Sikh communities. In the total population of East Punjab which stood at 1 crore 25 lakhs, the population of the Hindus reached about 62 percent and the Sikhs about 35 per cent. In this manner, for the first time in the history, the Hindus became a majority in Punjab. Similarly, for the first time in history the Sikh brotherhood achieved a majority in a united area (the areas between the rivers Ravi and Ghaggar).

There is no doubt that the Sikh community suffered a lot, both in terms of lives lost and material losses as a result of the partition of Punjab, but the political avenues that this catastrophe opened up for the Sikh community, is something only an astute mind like Dr. Ambedkar's could properly assess. In February 1948, when a deputation of Sikhs apprised Dr. Ambedkar of the difficulties being faced by the Sikh community due to partition, his researched and prescient reply* was:

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