<SiteLock

बुद्ध पूर्णिमा पर बुद्ध के दुश्मनों को पहचानिए

 

संजय जोठे (Sanjay Jothe)

बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर बुद्ध के सबसे पुराने और सबसे शातिर दुश्मनों को आप आसानी से पहचान सकते हैं. यह दिन बहुत ख़ास है इस दिन आँखें खोलकर चारों तरफ देखिये. बुद्ध की मूल शिक्षाओं को नष्ट करके उसमे आत्मा परमात्मा और पुनर्जन्म की बकवास भरने वाले बाबाओं को आप काम करता हुआ आसानी से देख सकेंगे. भारत में तो ऐसे त्यागियों, योगियों, रजिस्टर्ड भगवानों और स्वयं को बुद्ध का अवतार कहने वालों की कमी नहीं है. जैसे इन्होने बुद्ध को उनके जीते जी बर्बाद करना चाहा था वैसे ही ढंग से आज तक ये पाखंडी बाबा लोग बुद्ध के पीछे लगे हुए हैं.

buddha seated

 बुद्ध पूर्णिमा के दिन भारत के वेदांती बाबाओं सहित दलाई लामा जैसे स्वघोषित बुद्ध अवतारों को देखिये. ये विशुद्ध राजनेता हैं जो अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेंकने के लिए बुद्ध की शिक्षाओं को उलटा सीधा तोड़ मरोड़कर उसमे आत्मा परमात्मा घुसेड देते हैं. भारत के एक फाइव स्टार रजिस्टर्ड भगवान् – भगवान् रजनीश ने तो दावा कर ही दिया था कि बुद्ध उनके शरीर में आकर रहे, इस दौरान उनके भक्तों ने प्रवचनों के दौरान उन्हें बुद्ध के नाम से ही संबोधित किया लेकिन ये "परीक्षण" काम नहीं किया और भगवान रजनीश ने खुद को बुद्ध से भी बड़ा बुद्ध घोषित करते हुए सब देख भालकर घोषणा की कि "बुद्ध मेरे शरीर में भी आकर एक ही करवट सोना चाहते हैं, आते ही अपना भिक्षा पात्र मांग रहे हैं, दिन में एक ही बार नहाने की जिद करते हैं" ओशो ने आगे कहा कि बुद्ध की इन सब बातों के कारण मेरे सर में दर्द हो गया और मैंने बुद्ध को कहा कि आप अब मेरे शरीर से निकल जाइए.

जरा गौर कीजिये. ये भगवान् रजनीश जैसे महागुरुओं का ढंग है बुद्ध से बात करने का. और कहीं नहीं तो कम से कम कल्पना और गप्प में ही वे बुद्ध का सम्मान कर लेते लेकिन वो भी इन धूर्त बाबाजी से न हो सका. आजकल ये बाबाजी और उनके फाइव स्टार शिष्य बुद्ध के अधिकृत व्याख्याता बने हुए हैं और बहुत ही चतुराई से बुद्ध की शिक्षाओं और भारत में बुद्ध के साकार होने की संभावनाओं को खत्म करने में लगे हैं. इसमें सबसे बड़ा दुर्भाग्य ये है कि दलित बहुजन समाज के और अंबेडकरवादी आन्दोलन के लोग भी इन जैसे बाबाओं से प्रभावित होकर अपने और इस देश के भविष्य से खिलवाड़ कर रहे हैं.

 इस बात को गौर से समझना होगा कि भारतीय वेदांती बाबा किस तरह बुद्ध को और उनकी शिक्षाओं को नष्ट करते आये हैं. इसे ठीक से समझिये. बुद्ध की मूल शिक्षा अनात्मा की है. अर्थात कोई 'आत्मा नहीं होती'. जैसे अन्य धर्मों में इश्वर, आत्मा और पुनर्जन्म होता है वैसे बुद्ध के धर्म में इश्वर आत्मा और पुनर्जन्म का कोई स्थान नहीं है. बुद्ध के अनुसार हर व्यक्ति का शरीर और उसका मन मिलकर एक आभासी स्व का निर्माण करता है जो अनेकों अनेक गुजर चुके शरीरों और मन के अवशेषों से और सामाजिक सांस्कृतिक शैक्षणिक आदि आदि कारकों के प्रभाव से बनता है, ये शुद्धतम भौतिकवादी निष्पत्ति है. किसी व्यक्ति में या जीव में कोई सनातन या अजर अमर आत्मा जैसी कोई चीज नहीं होती. और इसी कारण एक व्यक्ति का पुनर्जन्म होना एकदम असंभव है.

जो लोग पुनर्जन्म के दावे करते हैं वे बुद्ध से धोखा करते हैं. इस विषय में दलाई लामा का उदाहरण लिया जा सकता है. ये सज्जन कहते हैं कि वे पहले दलाई लामा के तेरहवें या चौदहवें अवतार हैं और हर बार खोज लिए जाते हैं. अगर इनकी बात मानें तो इसका मतलब हुआ कि इनके पहले के दलाई लामाओं का सारा संचित ज्ञान, अनुभव और बोध बिना रुकावट के इनके पास आ रहा है. सनातन और अजर-अमर आत्मा के पुनर्जन्म का तकनीकी मतलब यही होता है कि अखंडित आत्मा अपने समस्त संस्कारों और प्रवृत्तियों के साथ अगले जन्म में जा रही है.

अब इस दावे की मूर्खता को ठीक से देखिये. ऐसे लामा और ऐसे दावेदार खुद को किसी अन्य का पुनर्जन्म बताते हैं लेकिन ये गजब की बात है कि इन्हें हर जन्म में शिक्षा दीक्षा और जिन्दगी की हर जेरुरी बात को ए बी सी डी से शुरू करना पड़ता है. भाषा, गणित, इतिहास, भूगोल, विज्ञान आदि ही नहीं बल्कि इनका अपना पालतू विषय – अध्यात्म और ध्यान भी किसी नए शिक्षक से सीखना होता है. अगर इनका पुनर्जन्म का दावा सही है तो अपने ध्यान से ही इन चीजों को पिछले जन्म से 'री-कॉल' क्यों नहीं कर लेते? आपको भी स्पेशल ट्यूटर रखने होते हैं तो एक सामान्य आदमी में और इन अवतारों में क्या अंतर है?

इस बात को ठीक से देखिये. इससे साफ़ जाहिर होता है कि अवतार की घोषणा असल में एक राष्ट्राध्यक्ष के राजनीतिक पद को वैधता देने के लिए की जाती है. जैसे ही नया नेता खोजा जाता है उसे पहले वाले का अवतार बता दिया जाता है इससे असल में जनता में उस नेता या राजा के प्रति पैदा हो सकने वाले अविश्वास को खत्म कर दिया जाता है या उस नेता या राजा की क्षमता पर उठने वाले प्रश्न को भी खत्म कर दिया जाता है, जनता इस नये नेता को पुराने का पुनर्जन्म मानकर नतमस्तक होती रहती है और शिक्षा, रोजगार, विकास, न्याय आदि का प्रश्न नहीं उठाती, इसी मनोविज्ञान के सहारे ये गुरु सदियों सदियों तक गरीब जनता का खून चूसते हैं. यही भयानक राजनीति भारत में अवतारवाद के नाम पर हजारों साल से खेली जाती रही है. इसी कारण तिब्बत जैसा खुबसूरत मुल्क अन्धविश्वासी और परलोकवादी बाबाओं के चंगुल में फंसकर लगभग बर्बाद हो चुका है. वहां न शिक्षा है न रोजगार है न लोकतंत्र या आधुनिक समाज की कोई चेतना बच सकी है.

अब ये लामा महाशय तिब्बत को बर्बाद करके धूमकेतु की तरह भारत में घूम रहे हैं और अपनी बुद्ध विरोधी शिक्षाओं से भारत के बौद्ध आन्दोलन को पलीता लगाने का काम कर रहे हैं.

भारत के बुद्ध प्रेमियों को ओशो रजनीश जैसे धूर्त वेदान्तियों और दलाई लामा जैसे अवसरवादी राजनेताओं से बचकर रहना होगा. डॉ. अंबेडकर ने हमें जिस ढंग से बुद्ध और बौद्ध धर्म को देखना सिखाया है उसी नजरिये से हमे बुद्ध को देखना होगा. और ठीक से समझा जाए तो अंबेडकर जिस बुद्ध की खोज करके लाये हैं वही असली बुद्ध हैं. ये बुद्ध आत्मा और पुनर्जन्म को सिरे से नकारते हैं.

लेकिन भारतीय बाबा और फाइव स्टार भगवान लोग एकदम अलग ही खिचडी पकाते हैं. ये कहते हैं कि सब संतों की शिक्षा एक जैसी है, सबै सयाने एकमत और फिर उन सब सयानों के मुंह में वेदान्त ठूंस देते हैं. कहते हैं बुद्ध ने आत्मा और परमात्मा को जानते हुए भी इन्हें नकार दिया क्योंकि वे देख रहे थे कि आत्मा परमात्मा के नाम पर लोग अंधविश्वास में गिर सकते थे. यहाँ दो सवाल उठते हैं, पहला ये कि क्या बुद्ध ने स्वयं कहीं कहा है कि उन्होंने आत्मा परमात्मा को जानने के बाद भी उसे नकार दिया? दुसरा प्रश्न ये है कि बुद्ध अंधविश्वास को हटाने के लिए ऐसा कर रहे थे तो अन्धविश्वास का भय क्या उस समय की तुलना में आज एकदम खत्म हो गया है?

दोनों सवालों का एक ही उत्तर है – "नहीं".

गौतम बुद्ध कुटिल राजनेता या वेदांती मदारी नहीं हैं. वे एक इमानदार क्रांतिचेता और मनोवैज्ञानिक की तरह तथ्यों को उनके मूल रूप में रख रहे हैं. उनका अनात्मा का अपना विशिष्ठ दर्शन और विश्लेषण है. उसमे वेदांती ढंग की सनातन आत्मा का प्रक्षेपण करने वाले गुरु असल में बुद्ध के मित्र या हितैषी नहीं बल्कि उनके सनातन दुश्मन हैं. आजकल आप किसी भी बाबाजी के पंडाल या ध्यान केंद्र में चले जाइए. या यहीं फेसबुक पर ध्यान की बकवास पिलाने वालों को देख लीजिये. वे कृष्ण और बुद्ध को एक ही सांस में पढ़ाते हैं, ये गजब का अनुलोम विलोम है. जबकि इनमे थोड़ी भी बुद्धि हो तो समझ आ जाएगा कि बुद्ध आत्मा को नकारते हैं और कृष्ण आत्मा को सनातन बताते हैं, कृष्ण और बुद्ध दो विपरीत छोर हैं. लेकिन इतनी जाहिर सी बात को भी दबाकर ये बाबा लोग अपनी दूकान कैसे चला लेते हैं? लोग इनके झांसे में कैसे आ जाते हैं? यह बात गहराई से समझना चाहिए.

असल में ये धूर्त लोग भारतीय भीड़ की गरीबी, कमजोरी, संवादहीनता, कुंठा, अमानवीय शोषण, जातिवाद आदि से पीड़ित लोगों की सब तरह की मनोवैज्ञानिक असुरक्षाओं और मजबूरियों का फायदा उठाते हैं और तथाकथित ध्यान या समाधि या चमत्कारों के नाम पर मूर्ख बनाते हैं. इन बाबाओं की किताबें देखिये, आलौकिक शक्तियों के आश्वासन और अगले जन्म में इस जन्म के अमानवीय कष्ट से मुक्ति के आश्वासन भरे होते हैं. इनका मोक्ष असल में इस जमीन पर बनाये गये अमानवीय और नारकीय जीवन से मुक्त होने की वासना का साकार रूप है. इस काल्पनिक मोक्ष में हर गरीब शोषित इंसान ही नहीं बल्कि हराम का खा खाकर अजीर्ण, नपुंसकता और कब्ज से पीड़ित हो रहे राजा और सामंत भी घुस जाना चाहते हैं. आत्मा को सनातन बताकर गरीब को उसके आगामी जन्म की विभीषिका से डराते हैं और अमीर को ऐसे ही जन्म की दुबारा लालच देकर उसे फंसाते हैं, इस तरह इस मुल्क में एक शोषण का सनातन साम्राज्य बना रहता है. और शोषण का ये अमानवीय ढांचा एक ही बिंदु पर खड़ा है वह है – सनातन आत्मा का सिद्धांत.

इसके विपरीत बुद्ध ने जिस निर्वाण की बात कही है या बुद्ध ने जिस तरह की अनत्ता की टेक्नोलोजी दी है और उसका जो ऑपरेशनल रोडमेप दिया है उसके आधार पर यह स्थापित होता है कि आत्मा यानी व्यक्तित्व और स्व जैसी किसी चीज की कोई आत्यंतिक सत्ता नहीं है. यह एक कामचलाऊ स्व या व्यक्तित्व है जो आपने अपने जन्म के बाद के वातावरण में बहुत सारी कंडीशनिंग के प्रभाव में पैदा किया है, ये आपने अपने हाथ से बनाया है और इसे आप रोज बदलते हैं.

आप बचपन में स्कूल में जैसे थे आज यूनिवर्सिटी में या कालेज में या नौकरी करते हुए वैसे ही नहीं हैं, आपका स्व या आत्म या तथाकथित आत्मा रोज बदलती रही है. शरीर दो पांच दस साल में बदलता है लेकिन आत्मा या स्व तो हर पांच मिनट में बदलता है. इसी प्रतीति और अनुभव के आधार पर ध्यान की विधि खोजी गयी. बुद्ध ने कहा कि इतना तेजी से बदलता हुआ स्व – जिसे हम अपना होना या आत्मा कहते हैं – इसी में सारी समस्या भरी हुयी है. इसीलिये वे इस स्व या आत्मा को ही निशाने पर लेते हैं. बुद्ध के अनुसार यह स्व या आत्मा एक कामचलाऊ धारणा है, ये आत्म सिर्फ इस जीवन में लोगों से संबंधित होने और उनके साथ समाज में जीने का उपकरण भर है. इस स्व या आत्म की रचना करने वाले शरीर, कपड़े, भोजन, शिक्षा और सामाजिक धार्मिक प्रभावों को अगर अलग कर दिया जाए तो इसमें अपना आत्यंतिक कुछ भी नहीं है. यही अनात्मा का सिद्धांत है. यही आत्मज्ञान है. बुद्ध के अनुसार एक झूठे स्व या आत्म के झूठेपन को देख लेना ही आत्मज्ञान है.

लेकिन वेदांती बाबाओं ने बड़ी होशियारी से बुद्ध के मुंह में वेदान्त ठूंस दिया है और इस झूठे अस्थाई स्व, आत्म या आत्मा को सनातन बताकर बुद्ध के आत्मज्ञान को 'सनातन आत्मा के ज्ञान' के रूप में प्रचारित कर रखा है. अगर आप इस गहराई में उतरकर इन बाबाओं और उनके अंधभक्तों से बात करें तो वे कहते हैं कि ये सब अनुभव का विषय है इसमें शब्दजाल मत रचिए. ये बड़ी गजब की बात है. बुद्ध की सीधी सीधी शिक्षा को इन्होने न जाने कैसे कैसे श्ब्द्जालों और ब्रह्म्जालों से पाट दिया है और आदमी कन्फ्यूज होकर जब दिशाहीन हो जाता है तो ये उसे तन्त्र मन्त्र सिखाकर और भयानक कंडीशनिंग में धकेल देते हैं. इसकी पड़ताल करने के लिए इनकी गर्दन पकड़ने निकलें तो ये कहते हैं कि ये अनुभव का विषय है. इनसे फिर खोद खोद कर पूछिए कि आपको क्या अनुभव हुआ ? तब ये जलेबियाँ बनाने लगते हैं. ये इनकी सनातन तकनीक है.

असल में सनातन आत्मा सिखाने वाला कोई भी अनुशासन एक धर्म नहीं है बल्कि ये एक बल्कि राजनीती है. इसी हथकंडे से ये सदियों से समाज में सृजनात्मक बातों को उलझाकर नष्ट करते आये हैं. भक्ति भाव और सामन्ती गुलामी के रूप में उन्होंने जो भक्तिप्रधान धर्म रचा है वो असल में भगवान और उसके प्रतिनिधि राजा को सुरक्षा देता आया है. यही बात है कि हस्ती मिटती नहीं इनकी, इस भक्ति में ही सारा जहर छुपा हुआ है. इसी से भारत में सब तरह के बदलाव रोके जाते हैं. और इतना ही नहीं व्यक्तिगत जीवन में अनात्मा के अभ्यास या ज्ञान से जो स्पष्टता और समाधि (बौद्ध समाधी)फलित हो सकती है वह भी असंभव बन जाती है.

ये पाखंडी गुरु एक तरफ कहते हैं कि मैं और मेरे से मुक्त हो जाना ही ध्यान, समाधि और मोक्ष है और दूसरी तरफ इस मैं और मेरे के स्त्रोत – इस सनातन आत्मा – की घुट्टी भी पिलाए जायेंगे. एक हाथ से जहर बेचेंगे दुसरे हाथ से दवाई. एक तरफ मोह माया को गाली देंगे और अगले पिछले जन्म के मोह को भी मजबूत करेंगे. एक तरह शरीर, मन और संस्कारों सहित आत्मा के अनंत जन्मों के कर्मों की बात सिखायेंगे और दुसरी तरफ अष्टावक्र की स्टाइल में ये भी कहेंगे कि तू मन नहीं शरीर नहीं आत्मा नहीं, तू खुद भी नहीं ये जान ले और अभी सुखी हो जा. ये खेल देखते हैं आप? ले देकर आत्मभाव से मुक्ति को लक्ष्य बतायेंगे और साथ में ये भी ढपली बजाते रहेंगे कि आत्मा अजर अमर है हर जन्म के कर्मों का बोझ लिए घूमती है.

अब ऐसे घनचक्कर में इन बाबाओं के सौ प्रतिशत लोग उलझे रहते हैं, ये भक्त अपने बुढापे में भयानक अवसाद और कुंठा के शिकार हो जाते हैं. ऐसे कई बूढों को आप गली मुहल्लों में देख सकते हैं. इनके जीवन को नष्ट कर दिया गया है. ये इतना बड़ा अपराध है जिसकी कोई तुलना नहीं की जा सकती. दुर्भाग्य से अपना जीवन बर्बाद कर चुके ये धार्मिक बूढ़े अब चाहकर भी मुंह नहीं खोल सकते.

लेकिन बुद्ध इस घनचक्कर को शुरू होने से पहले ही रोक देते हैं. बुद्ध कहते हैं कि ऐसी कोई आत्मा होती ही नहीं इसलिए इस अस्थाई स्व में जो विचार संस्कार और प्रवृत्तियाँ हैं उन्हें दूर से देखा जा सकता है और जितनी मात्रा में उनसे दूरी बनती जाती है उतनी मात्रा में निर्वाण फलित होता जाता है. निर्वाण का कुल जमा अर्थ 'नि+वाण' है अर्थात दिशाहीन हो जाना. अगर आप किसी विचार या योजना या अतीत या भविष्य का बोध लेकर घूम रहे हैं तो आप 'वाण' की अवस्था में हैं अगर आप अनंत पिछले जन्मों और अनंत अगले जन्मों द्वारा दी गयी दिशा और उससे जुडी मूर्खता को त्याग दें तो आप अभी ही 'निर्वाण' में आ जायेंगे. लेकिन ये धूर्त फाइव स्टार भगवान् और इनके जैसे वेदांती बाबा इतनी सहजता से किसी को मुक्त नहीं होने देते. वे बुद्ध और निर्वाण के दर्शन को भी धार्मिक पाखंड की राजनीति का हथियार बना देते हैं और अपने भोग विलास का इन्तेजाम करते हुए करोड़ों लोगों का जीवन बर्बाद करते रहते हैं.

 बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर इन बातों को गहराई से समझिये और दूसरों तक फैलाइये. एक बात ठीक से नोट कर लीजिये कि भारत में गरीबॉन, दलितों, मजदूरों, स्त्रीयों और आदिवासियों के लिए बुद्ध का अनात्मा का और निरीश्वरवाद का दर्शन बहुत काम का साबित होने वाला है. बुद्ध का निरीश्वरवाद और अनात्मवाद असल में भारत के मौलिक और ऐतिहासिक भौतिकवाद से जन्मा है. ऐसे भौतिकवाद पर आज का पूरा विज्ञान खड़ा है और भविष्य में एक स्वस्थ, नैतिक और लोकतांत्रिक समाज का निर्माण भी इसी भौतिकवाद की नींव पर होगा. आत्मा इश्वर और पुनर्जन्म जैसी भाववादी या अध्यात्मवादी बकवास को जितनी जल्दी दफन किया जाएगा उतना ही इस देश का और इंसानियत का फायदा होगा.

अब शेष समाज इसे समझे या न समझे, कम से कम भारत के दलितों, आदिवासियों, स्त्रीयों और शूद्रों (ओबीसी) सहित सभी मुक्तिकामियों को इसे समझ लेना चाहिए. इसे समझिये और बुद्ध के मुंह से वेदान्त बुलवाने वाले बाबाओं और उनके शीशों के षड्यंत्रों को हर चौराहे पर नंगा कीजिये. इन बाबाओं के षड्यंत्रकारी सम्मोहन को कम करके मत आंकिये. ये बाबा ही असल में भारत में समाज और सरकार को बनाते बिगाड़ते आये हैं. अगर आप ये बात अब भी नहीं समझते हैं तो आपके लिए और इस समाज के लिए कोई उम्मीद नहीं है. इसलिए आपसे निवेदन है कि बुद्ध को ठीक से समझिये और दूसरों को समझाइये.

~~~

 

संजय जोठे लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कर रहे हैं।

 

Other Articles from the Author

Other Related Articles

The Real Remedy for Breaking Caste
Tuesday, 22 September 2020
  Dhamma Darshan Nigam   “I am convinced that the real remedy is inter-marriage. Fusion of blood can alone create the feeling of being kith and kin, and unless this feeling of kinship, of... Read More...
Lineage and Caste in Islam
Sunday, 20 September 2020
  Shafiullah Anis   (Round Table India and SAVARI have been hosting a series of online talks by activists and thinkers on issues of importance to the Bahujan. This is the... Read More...
For the perfect progressive recipe, skip caste, sprinkle Dalit swadanusaar: Gaurav Somwanshi
Friday, 11 September 2020
  Gaurav Somwanshi (Round Table India and SAVARI have been hosting a series of online talks by activists and thinkers on issues of importance to the Bahujan. This is the transcript of Gaurav... Read More...
Deconstructing the greatness of Indian Gurus
Saturday, 05 September 2020
  Prof Vivek Kumar  September 5th, the birth anniversary of Sarvaplli Radhakrishnan, is celebrated as teacher’s day in India. Students wish their teachers ‘Wish you happy Teacher’s... Read More...
Comprehending Honour Killings in India
Saturday, 05 September 2020
  Aniruddha Mahajan Honour killing is an ugly reality in India. In fact, the nation where the societal structure is based on caste system, such incidents will not astonish much but will surely... Read More...

Recent Popular Articles

Knowing (Reading) Ambedkar And Being An Ambedkarite: Through The Anti-Caste And Feminist Lens
Friday, 01 May 2020
  Shivani Waldekar In the contemporary period we see that there are very few informed Ambedkarites who are coming to the forefront and challenging the social, economic, cultural, political,... Read More...