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Is Fascism knocking at the door?

 

Dr. Mudnakudu Chinnaswamy

Mudnakudu ChinnaswamyValedictory Speech delivered at Vidrohi Sahitya Sammelana held on 24-12-2017 in Shahada, Nandurbar district, Maharashtra

Hon. President of the Sammelana, the dignitaries on the Dais and the august literary audience before me.

I am extremely happy to be present here today for two reasons. One is my poems are getting published in Marathi and the other is, it is a veritable privilege for any writer to be honoured by the Maharashtra Vidrohi Sanskritik Sanghatan. I belong to the early generation of poets who started protest poetry in late 1970s consequent to the Dalit- Bandaya movement in Karnataka, which is interestingly the replication of the struggle that occurred in Maharashtra at the same time. My poetry has been translated into Spanish and English and anthologies have been published. Collections have so far been published in Hindi, Urdu, and Telugu and the Marathi version is in the offing. I thank wholeheartedly Sri Baburao Kamble, a poet well known to Marathi audience, who undertook the task of translation.

Today, I must remember Late Sri Shankar M. Patil who was a resident of Kolhapur and a Kannadiga. He was instrumental in bringing Vacana literature into Marathi. It was he who coordinated with Vidrohi Sanskritik Sanghatan for publishing this collection a few years back. I was more than happy to understand that a prestigious, progressive literary organisation is introducing me to Marathi poetry. But after his sad demise, I searched for the manuscript, ringing up to his relatives and friends, since my translator didn't keep a copy of it. Finally, I found Prof. Raja Sirguppe was in possession of it and both of us rejoiced. He was graceful enough to agree to fulfill the ambition of our friend Sri Shankar M. Patil. I owe my sincere gratitude to all these noble personalities. Maharashtra and Karnataka were historically bound together and have shared a common cultural heritage. The first Marathi inscription was found in Shravanabelagola and the Chalukyas and Rashtrakutas crossed Godavari and ruled. Books have been written tracing the origin of the great warrior king Shivaji to the northern part of Karnataka.

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Sayyids in Muslim Societies


Morimoto Kazuo

The world today is home to a great number of putative lineal descendants—and collateral relatives—of Muḥammad, the Prophet of Islam. Let us begin by sharing three recent episodes involving some of these kinsfolk of the Prophet.

sayyids and sharifs

Episode I: The film Close-Up (1990) by the renowned Iranian film director Abbas Kiarostami is an intricate cross between documentary and fiction, featuring a man apprehended for falsely presenting himself as Mohsen Makhmalbaf, a leading figure of Iranian cinema. The film re-enacts the interaction between the cinema-loving "conman" and his "victims," the Āhankhāh family, as well as the trial of the case before a judge. Just as the trial is approaching its conclusion, an interesting incident takes place in the film. The defendant's mother, clad in a black chador, suddenly steps forward and begins to plead with the judge that he should consider the prophetic descent of her son when handing out his sentence. It is true that this incident may not have taken place in reality. However, Kiarostami must certainly have thought that the scene would not appear unrealistic to his audience.

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जाति पाति: आदर्श और हक़ीकत (पंजाब के सन्दर्भ में)

 
Sardar Ajmer Singh (सरदार अजमेर सिंह)

(यह आलेख आज़ाद भारत के पंजाब प्रांत में दलित/पछड़ा वर्ग एवं सिख के 'हम हिंदू नहीं' दृष्टिकोण का ब्राह्मणवादी आर्य समाज और इसके पोषक बन गए राजनीतिक दलों के बरक्स जो भी हुआ है, उसका ऐतिहासिक विवरण है। पंजाब की राजनीति को देखने, समझने और परखने का, पाठकों को, यह आलेख बढ़िया मौका प्रदान करता है। सरदार अजमेर सिंह द्वारा लिखी यह रचना उनकी पंजाबी में लिखी बहुचर्चित किताब 'बीसवीं सदी की सिख राजनीति - एक ग़ुलामी से दूसरी ग़ुलामी' से ली गई है, एवं अनुदित है - गुरिंदर आज़ाद [अनुवादक])
s ajmer singh
बेशक़ गुरु साहेबान (सिख गुरु) ने हिन्दू समाज की सबसे बड़ी लाहनत, जाति पाति प्रणाली का, सिद्धांत और अमल के स्तर पर ज़ोरदार खंडन करते हुए, सिख समाज में इसकी पूरी तरह से मनाही कर दी थी। गुरु काल के बाद धीरे धीरे सिखी के बुनियादी सिद्धांत कमज़ोर पड़ने शुरू हो गए। जिन हिंदूवादी अभ्यासों का गुरु साहेबान ने खंडन किया था, उन्होंने सिख धर्म और समाज को फिर से अपने क़ातिलाना शिकंजे में ले लिया। हिन्दूवाद के दुष्प्रभावों का सबसे गाढ़ा इज़हार सिख पंथ में जात पात प्रणाली की फिर से अमल के रूप में हुआ। ऐसे अनेक ऐतिहासिक प्रमाण और हवाले मिलते हैं जो उनीसवीं सदी तक सिख पंथ के फिर से जात-पात प्रबंध की मुकम्मल जकड़ में आ जाने की पुष्टि करते हैं। 

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जट्टवाद एक दीर्घ रोग

 

सरदार अजमेर सिंह (Sardar Ajmer Singh)

(यह लेख सरदार अजमेर सिंह की बहुचर्चित किताब 'बीसवीं सदी की सिख राजनीति: एक ग़ुलामी से दूसरी ग़ुलामी तक' जो कि पंजाबी भाषा में है, से हिंदी में अनुदित किया गया है सरदार अजमेर सिंह पंजाब के एक जाने माने इतिहासकार हैं। ब्राह्मणवाद की गहन समझ रखने वाले अजमेर सिंह महसूस करते हैं कि पंजाब अपने असली इतिहास के साथ तभी बच सकता है, एवं उसका भविष्य सुरक्षित हो सकता है अगर वह अलग सिख स्टेट बने। पंजाब की तारीख़ का सिख परीपेक्ष्य में मूल्यांकन करने वाले शायद वह इकलौते साहित्यकार हैं जिन्होंने ब्राह्मणवाद की नब्ज़ को पकड़कर सिखों में घुस चुके ब्राह्मणवाद की निशानदेही की है। उनकी लिखी किताबों के माध्यम से व्यापक जगत ने दृष्टिकोण के वह कोने भी छूये हैं जिससे खुद सिख संसार अनभिज्ञ था या यूं कहिये ब्राह्मणवादी स्टेट ने ऐसा कर दिया था। उनके इस आलेख में वह जट्टवाद को परत दर परत खोलते हैं। सिख एवं दलित बहुजन दृष्टिकोण से यह लेख बेहद पठनीय है। ~ गुरिंदर आज़ाद [अनुवादक])

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पंजाब के जट्ट भाईचारे की शुरुआत को लेकर कई तरह की बातें प्रचलित हैं। ज़्यादा वज़नदार विचार यह है कि इसके पुरखे मध्य एशिया के 'हून' और 'सीथियन' नाम के ख़ानाबदोश कबीलों से ताल्लुक रखते थे जिन्होंने इस इलाके में आर्य लोगों की घुसपैठ से काफी समय बाद निवास करना शुरू किया। क्यूंकि इन कबीलों का कोई पक्का ठिकाना नहीं था और उनका जीवन निर्वाह ज़्यादातर मार-धाड़ पर ही टिका हुआ था, इस कारण वीरता और लड़ाकूपन इनके खून में घुलमिल गया था। उनका नंबर संसार के नामी मुहिमबाज़ और मारखोर टोलों में आता है। समझा जाता है कि उन्होंने उनसे पहले आबाद हुए आर्य लोगों को खदेड़ के गंगा के मैदान की तरफ धकेल दिया था और इस भू-हिस्से में पक्के ठिकाने बनाकर खेती का व्यवसाय शुरू कर दिया। इसी वजह के चलते गंगा के मैदान में ब्राह्मण पुजारीवाद के असर तले पैदा हुए सभ्याचार का पंजाब के ग्रामीण मालिक किसानों पर उतना गाढ़ा रंग नहीं चढ़ा जितना पंजाब से बाहर अन्य किसान भाईचारों पर देखने को मिलता है। पंजाबी किसान, काफी हद तक, एवं काफी देर तक, इस सभ्याचार से अलग-जुदा रहा है। कबाईली नमूने की आर्थिक एवं भाईचारक बनावट ने पंजाबी ग्रामीण-किसान भाईचारे में भाईचारक-भाव, आज़ाद तबियत और बराबरी की जो स्पिरिट भर दी, वह पंजाबी जट्ट किसान के आचार का एक उभरा हुआ लक्षण हो गुज़रा। उसके स्वभाव और आचरण का दूसरा अहम् लक्षण शख्सियत प्रस्ति है। अर्थात वह हद दर्जे का व्यक्तिवादी है। आम तौर पर जट्ट वही सब करता है जो उसे खुद को अच्छा लगता है। इसका दूसरों पर पड़ने वाले प्रभाव की उसको कोई ख़ास परवाह नहीं होती। न वह इसमें किसी का दख़ल सहन करता है। उसमे खुद पर भरपूर भरोसा, जो अक्सर घमंड का रूपधारण कर लेता है, कमाल का ऊधम और बेशुमार पहल कदमी है। सो जहाँ लीडरों की अगुआई का इंतज़ार किये बिना व्यक्तिगत पहल कदमी और ऊधम की ज़रुरत है, वहाँ वह पूरा कामयाब है। पर जहाँ कामयाबी के लिए चिंतन और जथेबंदी की ज़रुरत पड़ी तो वह अक्सर फेल हुआ; सिवा ऐसे मौकों के कि जब किसी नामवर शख्सियत ने, या सांझे आदर्श या निश्चय ने या सांझे खतरे ने उसे जथेबंद होने के लिए प्रेरित करने में सफलता हासिल कर ली। जट्ट किसान में राज-काज का उतना कौशल या तज़ुर्बा नहीं, जितना खेती का है। इस लिए जहाँ भी, और जब भी, उसने अपनी फितरत के पीछे लग के राज करने का जतन किया, तो वह अक्सर फेल हुआ है।

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Dr. Ambedkar's Invaluable Advice on the Sikh Right to Self-rule

 

Sardar Ajmer Singh

This article is an excerpt from S. Ajmer Singh's book "Biswi Sadi Ki Sikh Rajneeti: Ek Ghulami Se Dusri Ghulami Tak" (The Sikh Politics of the 20th Century: From One Slavery to Another)

s ajmer singh

On the circumstances emerging after the partition of Punjab, and the creation of a Self-ruled Sikh state

After the partition of India, there was a significant shuffling of the various classes in proportion to the overall population in East Punjab. The Hindus and Sikhs of Western Punjab and the northwestern border areas were forced to leave their homes and cross the border into the newly formed Indian state. And from this side of the border, the Muslim population of Eastern Punjab moved en masse to West Punjab. The displaced or uprooted Sikh families from Lyallpur, Mintgumri and Sheikhupura came and settled in their ancestral villages in the Jalandhar division. A large part of the displaced Hindu population from Pakistan went and settled in the areas lying on the other side of the river Ghaggar. This shuffling or change in the population severely affected the relations between both the Hindu and Sikh communities. In the total population of East Punjab which stood at 1 crore 25 lakhs, the population of the Hindus reached about 62 percent and the Sikhs about 35 per cent. In this manner, for the first time in the history, the Hindus became a majority in Punjab. Similarly, for the first time in history the Sikh brotherhood achieved a majority in a united area (the areas between the rivers Ravi and Ghaggar).

There is no doubt that the Sikh community suffered a lot, both in terms of lives lost and material losses as a result of the partition of Punjab, but the political avenues that this catastrophe opened up for the Sikh community, is something only an astute mind like Dr. Ambedkar's could properly assess. In February 1948, when a deputation of Sikhs apprised Dr. Ambedkar of the difficulties being faced by the Sikh community due to partition, his researched and prescient reply* was:

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