आत्मसम्मान के नाम एक विमर्श: कश्मीर

 
 
पुष्पेंद्र जौहर
 
pushpसितम्बर 2010 में कश्मीर के रहने वाले एक ख़ास मित्र मुझसे हिजबुल मुजाहिदीन जैसे स्थानीय मिलिटेंट संघठनो द्वारा युवा कश्मीरियों की हाल में की गयी भर्ती के नतीजों पर चर्चा कर रहे थे। शुरूआती दिनों से लेकर 1990 में अपनी पराकाष्ठा तक पहुंची मिलिटेंसी की पृष्ठभूमि में हो रही उस चर्चा में उनका निष्कर्ष था कि भले ही इससे मिलिटेंट संगठनों में कुछ और लोगों की भर्ती हो और वे मारे भी जाएं, मगर ये सब भी 1990 का वो दौर नहीं ला सकता जब ये मिलिटेंसी अपने चरम पर था। उनका मानना था कि कश्मीर का बढ़ता हुआ मध्यम वर्ग मिलिटेंसी के अनिश्चित परिणामों के मद्देनज़र उसकी पुनरावृत्ति नहीं चाहता है। उनके अनुसार भारत सरकार कश्मीर का 'प्रबंधन' बहुत अच्छा कर रही है। मैंने यही सवाल हाल ही में फिर उनसे पूछा तो उन्होंने बताया कि वो किस तरह एक सहकर्मी के बेटे को मिलिटेंसी से दूर करने में प्रयासरत हैं।
 
अपने दोस्त से पिछले वर्ष हुई वार्ता के कुछ दिनों बाद मैं युवाओं का इंटरव्यू लेने श्रीनगर के केंद्र नौहट्टा (जो शहर-ए-खास के नाम से भी जाना जाता है) पहुंचा और वहाँ ये जानना चाहा कि लोग इस बढ़ती हुई मिलिटेंसी को कैसे देखते हैं। हिज्बुल मुजाहिदीन के प्रख्यात एरिया कमांडर बुरहान वानी उन लोगों में से एक था जिसके बारे में मैं पिछले डेढ़ साल से पढ़ रहा था। तमाम स्थानीय अखबारों में उसके बारे में पढ़ने के अलावा मैंने विभिन्न क्षेत्रों से आए कश्मीरियों से वानी और उसके सहयोगियों के प्रति उनकी राय भी जानना चाही। इस क्षेत्र (नौहट्टा) को चुनने की खास वजह थी। यहाँ मेरे आने से एक हफ्ते पहले एक मस्जिद की दीवार पर एरिया कमांडर बुरहान मुज़फ्फर वानी की बड़ी सी तस्वीर लगाई गयी थी।
 
स्थानीय अख़बारों1 के अनुसार इस साहसिक घटना ने पूरी सुरक्षा तंत्र को हिला दिया था और सुरक्षा बल पूरी तैयारी से दोषियों का पता लगाने में लग गए थे। प्रदर्शनों और पत्थरबाजी के लिए जाना जाने वाला जुमे का दिन भी आज बिलकुल शांत था। वहाँ मैं कश्मीरी मामलों के जानकार एक साथी के साथ गया था जिनका परिवार कश्मीर पर मेरी रिसर्च में मदद कर रहा था। वहाँ हमने कुछ युवाओं से संपर्क करने की कोशिश की मगर वे हमारे सवालों से बिलकुल बेखबर लगे। निश्चित तौर पर ऐसा वे जानबूझकर करते होंगे। वहां लोगों में न केवल झिझक थी, बल्कि उन्हें हमारी पहचान और नीयत पर भी शक था। उनके लिए हम पुलिस मुखबीर से लेकर सरकारी जासूस, कुछ भी हो सकते थे इसलिए अगर हमने और अधिक सवाल पूछने की कोशिश की होती तो हमारे लिए बड़ी समस्या खड़ी हो सकती थी। जल्द ही उस परिवार से भी फोन आ गया जिनके साथ मैं रह रहा था और हमें तुरंत लौटने को कहा गया क्योंकि अगर हम आसपास शक का दायरा और बढ़ाते तो हमारे साथ हाथापाई भी हो सकती थी। इस तरह से लौट आने पर भले ही वहां जाने का मेरा उद्देश्य पूरा नहीं हुआ हो, मगर वहां के परिदृश्य से विचारों को नई रौशनी ज़रूर मिली। हो सकता है कि मैं कार्यप्रणाली स्तर पर चूक गया था या फिर वहाँ मौजूद अपारदर्शिता को अलग तरह सेसमझा जा सकता है। जो भी हो, मगर वहाँ के लोगों की एकजुटता, एहतियात और किसी भी बाहरी के प्रति अविश्वास एक अभेद्य सुरक्षा तंत्र का सूचक था
 
बुरहान वानी: पोस्टर बॉय से शहीद
 
करीब एक महीने पहले, ईद उल फितर के तीसरे दिन हम लोग अपने दोस्त की कार से श्रीनगर से बडगाम जिले में पनाहपोरा* जा रहे थे। रामबाग पुल के बाद हम 7 वर्षीय ज़ीशान* और उसकी छोटी बहन सबा* के लिए पटाखे खरीदने को रुके। वो दोनों बच्चे उसी परिवार se थे जिनके साथ मैं कश्मीर में रह रहा था। जब मैं कार में वापस आया तो मेरे दोस्त ने मुझे अपने मोबाइल फोन पर एक फेसबुक अपडेट दिखाया जिसमे लिखा था कि 'हिजबुल मुजाहिदीन कमांडर बुरहान वानी मारा गया'। साथ में मरे हुए वानी की तस्वीर भी थी। मेरा दिल एकदम से बैठ गया!
 
उस शाम जब हम सावधानीपूर्वक श्रीनगर की गलियों के रस्ते बडगाम को निकल रहे थे, तो सारे रास्तों में अजीब सी बेचैनी स्पष्ट थी। रामबाग से हम हैदरपोरा की तरफ बढे और हमहमा से दाहिने मुड़ गए। हम जैसे जैसे ओमपुरा मार्केट की तरफ बढ़ रहे थे, पहले से ये बताना मुश्किल था कि बडगाम शहर को जाने वाले बाएं मोड़ को पत्थरों और ईंटों से अवरुद्ध कर दिया गया होगा। थोडा आगे जाने पर हमें करीब 30-40 युवा लड़के चेहरों को आधा ढके और हाथ में ईंट पत्थर लिए दिखाई पड़े। बस उनकी बेचैन आँखों को ही देखा जा सकता था जो हर गुजरने वाली चीज़ का पूरी तरह आंकलन कर रही थीं। हमारी कार में जम्मू कश्मीर का नंबर नहीं था। उन्होंने हमें रोका नहीं, बल्कि कार को सड़क की दाहिनी तरफ मौजूद रास्ते से जाने दिया। पीछे सीट पर बैठे दोनों बच्चे इस बात से बेखबर थे कि अभी हमारे साथ क्या गुज़रा था मगर मुझे तो आने वाले दिनों की आहटें स्पष्ट सुनाई देने लगी थीं।
 
अनुशासन, शोषण या एकीकरण: हिंसा के तरीके
 
मिलिटेंट्स के लिए ऐसा युद्ध लड़ने के क्या मायने होंगे जिसका परिणाम अनिश्चिता से भरपूर हो। ऐसा युद्ध जो एक भरी पूरी सेना से लड़ा जा रहा है जो विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की तथाकथित रक्षक है। मगर ये सवाल बेमतलब से हैं क्योंकि उन मिलिटेंट्स की चिंताएं अकादमिक और वस्तुपरक चिंताओं से भिन्न हैं। ऐसा लगता है कि उनकी चिंताएं अपने अस्तित्व को लेकर है जहाँ वे सेना के हाथों उस रोज़ रोज़ के अपमान से परे जीवन के अर्थ तलाशना चाहते हैं। कश्मीरी युवाओं को 'अनुशासित' करने के लिए सेना द्वारा अपनाए जाने वाले तरीके इन युवाओं के आत्मसम्मान पर चोट करते हैं। युवाओं को रोज़ रोज़ बंद करके उनसे पूछताछ करना कश्मीर में सेना की कार्यप्रणाली का हिस्सा है। कश्मीर में प्रतिरोध स्वरूप सेना और भारत सरकार के अन्य प्रतीकों पर पत्थर फेंकने वाले युवक उसी चोट खाई जमात का हिस्सा होते हैं।

बुरहान वानी भी ऐसा ही एक केस था जिसे अनुशासन की उस प्रक्रिया से गुजरना गंवारा नहीं हुआ। जब CRPF के कुछ जवानों ने उससे और उसके भाई को दुकान से सिगरेट लाने को कहा, तो वो सिर्फ निकोटीन की तलब नहीं थी, बल्कि उस अवाम पर एक तुच्छ और अशिष्ट किस्म की धौंस जमाने का प्रयोग भी था जिस पर वे नियंत्रण रखना चाहते हैं। पुरुषों में सत्ता की समझ की जड़ें उनके अपने पितृसत्तात्मक समाज में हुई परवरिश पर निर्भर करती है। यद्यपि संस्कृतिक सन्दर्भ के आधार पर शब्दावली अलग हो मगर कश्मीर घाटी में व्याप्त पितृसत्ता भारत के अन्य भागों से बहुत भिन्न नहीं है। जब वर्दीधारी सैनिक कश्मीरी पुरुषों पर ताकत का प्रयोग करते हैं तो वे ऐसी तकनीकों को इस्तेमाल में लाते हैं जो पुरुषों को सबसे ज़्यादा अपमानित कर सके। गालियों का प्रयोग बेहद हिसाब से होता है और जानबूझकर माँ बहन का नाम इस सन्दर्भ में लिया जाता है कि व्यक्ति खुद को अवैध संतान समझे। कश्मीरी महिलाएं ऐसी स्थिति ज़रा अलग तरह से झेलती हैं। उन्हें गालियों की जगह अश्लील और भद्दी टिप्पणियों का सामना करना पड़ता हैं। ऐसे तमाम अपमानजनक तरीके लगातार तैयार और संशोधित किए जाते हैं ताकि 'अनुशासनहीन' कश्मीरियों पर भीतर तक असर हो सके।

कश्मीर में अपमान के मायने?

2012 के शरदऋतू में मैंने एक युवा इंजीनियर, सुवैद वानी* का इंटरव्यू लिया था जो कि मध्य कश्मीर में बड़गाम जिले के एक गांव का रहने वाला है। बातचीत के दौरान एक शब्द जो बार बार आ रहा था, वो था अपमान या जलालत। मैंने उनसे पूछा कि उनके लिए अपमान के क्या मायने हैं? इसके जवाब में उन्होंने एक घटना का ज़िक्र किया। 2008 के चुनाव के ठीक पहले अर्धसैनिक बल की पूरी एक कंपनी ने आसपास के कई गाँवों पर नज़र रखने के लिए उनके गांव के बाहर एक अस्थायी बेस बनाने का निर्णय लिया था। उसी शाम कंपनी के मेजर साहब द्वारा गाँव के सरपंच को बुलाया गया। मगर सरपंच रात भर घर नहीं आया। अगली सुबह भोर के वक्त उसे अपने घर की तरफ रेंगते हुए जाते देखा गया। वो रात उसके लिए बेहद कठिन और भयानक बीती थी। उस मुसलमान सरपंच को कुछ सैनिकों ने जबरदस्ती शराब पिलाई, उसे मारा पीटा और उसके साथ यौन हिंसा भी की। इतना सब झेलने के बाद उसने शांत रहने का निर्णय किया। वो ऐसी बातें नहीं थी जिसको लेकर वो चारों तरफ शोर मचाता फिरता। भले ही गाँव वाले सब समझ गए थे मगर उन्होंने भी खामोश रहना ही ठीक समझा ताकि सरपंच को इस घटना से उबरने का सहारा और बल मिल सके। इस घटना को दोबारा सुनने के बाद मुझे इस बात का अंदाज़ा तो लग ही गया कि कश्मीर में अपमान के क्या मायने हो सकते हैं, या कम से कम एक अर्थ का तो पता चल ही गया।

मैं इस सोच में पड़ गया कि आखिर अर्धसैनिक बल ऐसा काम क्यों करेंगे? क्या ये सिर्फ मनोरंजन के लिए था? इसका जवाब शायद सत्ता के आमतौर पर काम करने के तरीकों में मिले जिस तरह वो आम जनता पर थोपी जाती है, खासकर उनपर जो ऐसे गैरकानूनी दमन को चुनौती देते हैं। अपनी निष्ठुरता के अलावा ये एक प्रतीकात्मक घटना भी थी जहाँ गाँव के मुखिया के सम्मान पर चोट की गई थी। ये पूरे गाँव को एक संदेश था कि वे अब सेना के नियंत्रण में हैं और बेहतर होगा कि वे सुधर जाएं अन्यथा गंभीर परिणाम हो सकते हैं। उन्होंने सरपंच के साथ यौन हिंसा की क्योंकि बोलचाल की भाषा में किसी पुरुष के साथ ऐसा कृत्य उसके पुरुषत्व पर सबसे कठोर प्रहार होता है। इस वृत्तान्त में तो इसे सामूहिक पुरुषत्व पर हमला कहना उचित होगा, जिसे सत्ता ने दमन के हथियार के रूप में इस्तेमाल किया। उन लोगों के पास क्या विकल्प होगा जिन्हें ये पता हो कि एक चुने हुए जन प्रतिनिधि को भी इस कदर जलालत से गुज़ारना पड़ सकता है?

ऐसे में वे किस तरह अपने और एक दूसरे के आत्मसम्मान और प्रतिष्ठा को परिभाषित कर सकेंगे? हिंसा सिर्फ अपने भौतिक रूप में ही नहीं दाखिल होती है, बल्कि हरबार स्त्रोत से उत्पन्न होते हुए वो अपना रूप, अपनी बनावट, अपनी गंध और स्पर्श बदलती रहती है। वैसे अधिकतर मामलों में हिंसा और सत्ता का उद्भव एक ही स्त्रोत से होता आया है। जब भी इस तरह का कोई हमला होता है तो उसके खिलाफ आम लोग यथाशक्ति प्रतिरोध करते हैं। उनके प्रतिरोध का बल उन तमाम शक्तियों का समावेश है जो सत्ता और उसके संरक्षकों की मुखालफत करता है। हथियारबंद संघर्ष के रूप में उभर रहा ये प्रतिरोध कोई नई घटना नहीं है। इसके लक्षण तो शुरुआती दिनों में ही दिखने लगे थे जब केंद्र सरकार अनुच्छेद 370 और जम्मू कश्मीर के अस्थायी विलय की शर्तों से छेड़छाड़ कर रही थी (नूरानी, 2000)।

बुरहान और उसके जैसों ने इस आधीनता के खिलाफ लड़ने के लिए राष्ट्रवाद की पृष्ठभूमि लिए हथियारों का हिंसक रास्ता चुना है। फिर किसका अपराध बड़ा कहा जाएगा? राष्ट्रवाद का सिद्धांत अगर सेना के मृत जवानों को देशवासियों की नज़र में शहीद की तरह पेश करता है तो फिर यही तर्क मारे गए युवा कश्मीरियों पर भी तो लागू होगा। वे भी तो लंबे समय से चले आ रहे राष्ट्रवाद के नाम पर ही लड़ रहे हैं। उन्हें भी शहीद का दर्ज़ा क्यों ना मिले खासकर जब समय ही शहादत की प्रमाणिकता का निर्माण करने में प्रासंगिक हो।

भले ही बुरहान के हाथों की गयी किसी हत्या को अफसर नकारते रहे हों, मगर जम्मू कश्मीर पुलिस और अर्धसैनिक बलों के लिए वो महत्वपूर्ण था और उन्होंने उसके सर 2 पर 10 लाख रुपए का इनाम भी रखा था। इसी हिंसक क्रम में उन्होंने 13 अप्रैल 2015 को बुरहान के 23 वर्षीय भाई खालिद मुज़फ्फर वानी को बर्बरतापूर्वक मार डाला जिसे बाद में हिजबुल मुजाहिदीन का एक 'ओवर ग्राउंड वर्कर' बताया गया। 8 जुलाई 2016 को उन्होंने बुरहान को उसके साथ सरताज अहमद शेख और परवेज़ अहमद के साथ मार दिया। क्या ये कदम मिलिटेंसी को कुचलने के लिए उठाया गया था? पिछले एक दशक में ऐसी नृशंस हत्याएं उस अनकही नीति की तरफ इशारा करती हैं जहाँ मिलिटेंसी को सिर्फ इसलिए ज़िंदा रखा जाता है जिससे कि सुरक्षा तंत्र और सेना की मौजूदगी को उचित ठहराया जा सके और युद्ध का बाज़ार चलता रहे।

ये कहना आसान और सरल होगा कि कश्मीर घाटी के युवाओं को हिंसा के रास्ते से हटाना ज़रूरी है लेकिन कालक्रम के अनुसार ये सही नहीं है क्योंकि हिंसा की विधिवत शुरुआत और उसे संस्थागत सरकार द्वारा किया गया है। कश्मीरियों के हथियार उठाने से काफी पहले ही इसकी शुरुआत हो चुकी थी। वास्तव में अपने विभिन्न स्वरूपों में हिंसा की शुरुआत तभी हो गयी थी जब नया नया सृजित हुआ भारत वो सब करने लगा जिसके लिए उसका पढ़ा लिखा अभिजात्य वर्ग कभी अंग्रेजों की आलोचना करता था। उस वर्ग के ज़्यादातर लोग स्वतंत्रता सेनानीयों की तरह सम्मानित हुए और इतना ही नहीं बल्कि उन्होंने इन वंशानुगत खिताबों से अपने वंश के अन्य सदस्यों को भी नवाज़ा, ठीक वैसे जैसा कि जातिप्रथा में होता है। मूलत: उच्च जातियों (जिनमे मुस्लिम और ईसाई भी शामिल हैं) में जन्मे उन लोगों ने अंग्रेजों से सत्ता प्राप्त कर लेने के बाद भारतीय संघ के विभिन्न हिस्सों में ब्रिटिश राज जैसा ही अत्याचार जारी रखा। ऐसा एक ब्राह्मणवादी राष्ट्र के निर्माण के लिए किया गया जो कि मुठ्ठी भर उच्च जाति के लोगों के वर्गीय हित का पोषण करता रहे। उच्च जाति समूह के सदस्यों द्वारा ये सुनिश्चित किया गया कि वे ऐसे सभी प्रभावशाली पदों पर काबिज़ हो जहाँ से वे समाज के निम्न स्तर (निम्न जाति) से आई बहुसंख्यक आबादी के भविष्य का निर्धारण कर सकें। सत्ता पर काबिज़ उन लोगों ने उन तमाम लिखित एवं सामाजिक करारों (Aloysius, 1997) में जोड़ तोड़, विकृति तथा हेराफेरी करके भारतीय उप महाद्वीप की अधिकांश आबादी पर एक काल्पनिक पहचान थोप दी। ये पहचान बेहद अस्थायी थी और कश्मीर, ओडिशा, तमिलनाडु, नागालैंड, मणिपुर जैसे क्षेत्रों के लोगों के लिए तो इसका कोई अर्थ नहीं था। नई नई गठित ब्राह्मणवादी भारत सरकार एक कृत्रिम रूप से निर्मित पहचान, "भारतीय" को दृढ़ करने, बल्कि थोपने की प्रक्रिया में उन तमाम शर्तों को बदलने के लिए जोर शोर से आगे बढ़ गई जिन शर्तों पर जम्मू कश्मीर शासन अस्थायी रूप से भारत में शामिल होने के लिए राज़ी हुआ था।।

आत्मसम्मान के नाम एक विमर्श

एक अन्य इंटरव्यू3 के दौरान दक्षिण कश्मीर के एक युवा राजनितिक नेता ने मुझसे कहा कि "कश्मीर में युवाओं को जिस चीज़ की परवाह सबसे पहले होती है वो है सम्मान। हम उन्हें महसूस कराते हैं कि हमारा संगठन उनका सम्मान करता है और यही वजह है कि हमारी पार्टी में युवा आबादी की बढ़ती हुई उपस्थिति देखी जा सकती है।" जब उनसे पूछा गया कि क्या ये युवक आज़ादी के विचार नहीं रखते हैं? तो उन्होंने कहा, "आज़ादी अधिकांश कश्मीरियों की पहली प्राथमिकता है और हम युवाओं के साथ और उनके लिए काम करते हुए इसे गौण करने की दिशा में काम करते हैं। हमारा फोकस उनके प्रति सम्मानपूर्वक व्यवहार रखने और उस प्रतिष्ठा को वापस लाने पर होता है जिससे इन तमाम सालों में ये वंचित रहे हैं।"

 कश्मीरी अवाम के भीतर आज़ादी की भावना को समझने के लिए कश्मीर में एक 'मुख्यधारा' के राजनेता के ऐसे विचार महत्वपूर्ण है। उन्होंने कश्मीरी युवाओं को संस्था एवं सम्मान देने के महत्त्व की बात कही। लेकिन राज्य की एजेंसियों के साथ मिलीभगत करके अर्धसैनिकबल उन्ही लोगों को शारीरिक और मानसिक बल से क्षीण और गुलाम बनाने का काम कर रहे हैं। ऐसी कार्यवाहियां कश्मीर को अस्थिर और हिंसाग्रस्त रखने में भारतीय शासकों की भूमिका की स्पष्ट सूचक हैं।

कश्मीर में कानूनन बंदूक चलाने वाले रोज़ आए दिन लोगों के सम्मान को ठेस पहुँचाते हैं। सुरक्षाबल खुद को मिली हुई शक्तियों का इस्तेमाल उन लोगों पर करना सीखते हैं जो देश के शत्रु प्रतीत होते हैं। देश की सेवा करने की इन्हें ट्रेनिंग दी जाती है। इस ट्रेनिंग का उद्देश्य उस शासक वर्ग के हितों की रक्षा करना है जो विभिन्न जन समूह को एकदूसरे के खिलाफ खड़ा करके इस कृत्रिम व्यवस्था को चलाना चाहता है। ट्रेनिंग ये भी सुनिश्चित करती है कि जो भी इस अधिपत्य को चुनौती दे उससे सख्ती से निपटा जाए। ऐसी व्यवस्था से लोगों को होने वाली असंख्य पीड़ाएं सिर्फ स्थानीय स्तर पर परिवार और अन्य सामाजिक संस्थाओं द्वारा प्रचलित तरीकों से कम नहीं की जा सकती है। कश्मीरियों के सामूहिक और व्यक्तिगत अंतस में एक बहुआयामी मानमर्दन बस सा गया है। गालियों से शुरू होकर 'सुरक्षा कारणों' के नाम पर होने वाले निजी तथा सार्वजानिक स्थलों के अतिक्रमण, से लेकर सेना द्वारा युवाओं को बार बार मारे पीटे जाने वालीं रोज़ रोज़ की घटनाएं इन कश्मीरियों के लिए अपमान का पर्याय बन चुकी हैं।

इसलिए जब कोई बुरहान वानी अपनी इच्छा से बंदूक उठाकर इस अपमान का जवाब देता है तो तमाम युवा कश्मीरियों को लगता है कि बुरहान की ललकार उनकी अपनी आवाज़ है। उन्हें लगता है कि वो वही कर रहा है जो रोज़ रोज़ अपमान सहता कश्मीरी खुद करना चाहता है।बुरहान जैसे लोगों में उन्हें अपनी आवाज़ मिलती है। वानी, पंडित4, परवेज़ और मारे गए अन्य लड़ाकों ने अपनी नौकरी से निराश होकर या किसी आर्थिक हानि के कारण बंदूक नहीं उठाई थी। ये तथ्य कुछ लोगों के इस दावे को सिरे से खारिज करता है कि कश्मीर में मिलिटेंसी का मुख्य कारण युवाओं में बढ़ती बेरोजगारी हैं। दरअसल यहाँ असल मसला कश्मीरियों के आत्मसम्मान का है। उस आत्मसम्मान का जिसके वृहद मायनो में व्यक्ति को अपने समाज में आर्थिक स्थायित्व के साथ साथ राजनितिक अधिकार भी मिल सके। और उस राजनितिक अधिकार मे आत्म-निर्णय का अधिकार तो स्पष्ट रूप से शामिल हो।

नागरिकों के आत्मसम्मान की रक्षा के लिए ये आवश्यक है कि कश्मीर या फिर उपमहाद्वीप के बाकी हिस्सों में सभी जातियों, पथों और संप्रदायों को उचित प्रतिनिधित्व मिले, ऐसा ना होने पर ये अन्यायपूर्ण यथास्थित बनी रहेगी। कश्मीर में इन सात दशकों में भारत की भूमिका से सीखते हुए इस बात पर ज़ोर देने की ज़रूरत है कि जब तक सभी लोगों और सामाजिक समूहों को अपने हितों का सम्मानपूर्वक चुनाव कर पाने की आज़ादी नहीं मिलेगी, तब तक वहाँ सच्चा लोकतंत्र नहीं स्थापित हो सकता है।

* व्यक्तियों और स्थानों के नाम बदल दिए गए हैं 

 अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद: जी. रंजन

मूल अंग्रेजी में इधर पढ़िए

~

 Notes

1. http://epaper.greaterkashmir.com/epapermain.aspx?queryed=9&eddate=08/29/2015

 2. http://kashmirreader.com/2016/07/08/hm-commander-burhan-wani-killed-in-kashmir/

 http://www.greaterkashmir.com/news/kashmir/police-announce-reward-on-militants-in-tral/205060.html

 NDTV report titled "Rs 10 lakh offer to Find Burhan, 21, Who is All Over Social Media". 17 August, 2015.

3. Interview, Gupkar Road, Srinagar, J&K, 12 August 2015.

4. http://kashmirreader.com/2016/04/08/thousands-attend-funeral-of-slain-militants-in-pulwama/

 

 

References

 1. Aloysius, G. (1997). Nationalism Without A Nation in India. New Delhi: Oxford University Press.

 2. Noorani, A.G. (2000). "Contours of Militancy," Frontline, Vol 17, Issue 20.

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पुष्पेंद्र जौहर (This email address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it. ) दिल्ली विश्वविद्यालय के मानव शास्त्र विभाग से पी.एच.डी. कर रहे हैं।
 

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