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जट्टवाद एक दीर्घ रोग

 

सरदार अजमेर सिंह (Sardar Ajmer Singh)

(यह लेख सरदार अजमेर सिंह की बहुचर्चित किताब 'बीसवीं सदी की सिख राजनीति: एक ग़ुलामी से दूसरी ग़ुलामी तक' जो कि पंजाबी भाषा में है, से हिंदी में अनुदित किया गया है सरदार अजमेर सिंह पंजाब के एक जाने माने इतिहासकार हैं। ब्राह्मणवाद की गहन समझ रखने वाले अजमेर सिंह महसूस करते हैं कि पंजाब अपने असली इतिहास के साथ तभी बच सकता है, एवं उसका भविष्य सुरक्षित हो सकता है अगर वह अलग सिख स्टेट बने। पंजाब की तारीख़ का सिख परीपेक्ष्य में मूल्यांकन करने वाले शायद वह इकलौते साहित्यकार हैं जिन्होंने ब्राह्मणवाद की नब्ज़ को पकड़कर सिखों में घुस चुके ब्राह्मणवाद की निशानदेही की है। उनकी लिखी किताबों के माध्यम से व्यापक जगत ने दृष्टिकोण के वह कोने भी छूये हैं जिससे खुद सिख संसार अनभिज्ञ था या यूं कहिये ब्राह्मणवादी स्टेट ने ऐसा कर दिया था। उनके इस आलेख में वह जट्टवाद को परत दर परत खोलते हैं। सिख एवं दलित बहुजन दृष्टिकोण से यह लेख बेहद पठनीय है। ~ गुरिंदर आज़ाद [अनुवादक])

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पंजाब के जट्ट भाईचारे की शुरुआत को लेकर कई तरह की बातें प्रचलित हैं। ज़्यादा वज़नदार विचार यह है कि इसके पुरखे मध्य एशिया के 'हून' और 'सीथियन' नाम के ख़ानाबदोश कबीलों से ताल्लुक रखते थे जिन्होंने इस इलाके में आर्य लोगों की घुसपैठ से काफी समय बाद निवास करना शुरू किया। क्यूंकि इन कबीलों का कोई पक्का ठिकाना नहीं था और उनका जीवन निर्वाह ज़्यादातर मार-धाड़ पर ही टिका हुआ था, इस कारण वीरता और लड़ाकूपन इनके खून में घुलमिल गया था। उनका नंबर संसार के नामी मुहिमबाज़ और मारखोर टोलों में आता है। समझा जाता है कि उन्होंने उनसे पहले आबाद हुए आर्य लोगों को खदेड़ के गंगा के मैदान की तरफ धकेल दिया था और इस भू-हिस्से में पक्के ठिकाने बनाकर खेती का व्यवसाय शुरू कर दिया। इसी वजह के चलते गंगा के मैदान में ब्राह्मण पुजारीवाद के असर तले पैदा हुए सभ्याचार का पंजाब के ग्रामीण मालिक किसानों पर उतना गाढ़ा रंग नहीं चढ़ा जितना पंजाब से बाहर अन्य किसान भाईचारों पर देखने को मिलता है। पंजाबी किसान, काफी हद तक, एवं काफी देर तक, इस सभ्याचार से अलग-जुदा रहा है। कबाईली नमूने की आर्थिक एवं भाईचारक बनावट ने पंजाबी ग्रामीण-किसान भाईचारे में भाईचारक-भाव, आज़ाद तबियत और बराबरी की जो स्पिरिट भर दी, वह पंजाबी जट्ट किसान के आचार का एक उभरा हुआ लक्षण हो गुज़रा। उसके स्वभाव और आचरण का दूसरा अहम् लक्षण शख्सियत प्रस्ति है। अर्थात वह हद दर्जे का व्यक्तिवादी है। आम तौर पर जट्ट वही सब करता है जो उसे खुद को अच्छा लगता है। इसका दूसरों पर पड़ने वाले प्रभाव की उसको कोई ख़ास परवाह नहीं होती। न वह इसमें किसी का दख़ल सहन करता है। उसमे खुद पर भरपूर भरोसा, जो अक्सर घमंड का रूपधारण कर लेता है, कमाल का ऊधम और बेशुमार पहल कदमी है। सो जहाँ लीडरों की अगुआई का इंतज़ार किये बिना व्यक्तिगत पहल कदमी और ऊधम की ज़रुरत है, वहाँ वह पूरा कामयाब है। पर जहाँ कामयाबी के लिए चिंतन और जथेबंदी की ज़रुरत पड़ी तो वह अक्सर फेल हुआ; सिवा ऐसे मौकों के कि जब किसी नामवर शख्सियत ने, या सांझे आदर्श या निश्चय ने या सांझे खतरे ने उसे जथेबंद होने के लिए प्रेरित करने में सफलता हासिल कर ली। जट्ट किसान में राज-काज का उतना कौशल या तज़ुर्बा नहीं, जितना खेती का है। इस लिए जहाँ भी, और जब भी, उसने अपनी फितरत के पीछे लग के राज करने का जतन किया, तो वह अक्सर फेल हुआ है।

जात-पात के नज़रिये से पंजाब का जट्ट किसान किसी भी अन्य जाति को अपने से ऊँचा नहीं समझता। उसमें सभी को 'चल हट' कहकर चलने की भावना और रुचि बहुत बलवान है। उसमे हिंदुस्तान की अन्य गैर-ब्राह्मणी या ग़ैर सवर्ण जातियों की तरह एहसास-ए-कमतरी पैदा नहीं हुई, बल्कि वह खुद को औरों से ऊँचा समझने का गुमान पालता है। जब वह आर्थिक तौर पर पैरों के बल खड़ा होता है तो उसकी यह भावना सात आसमान चढ़ जाती है। फिर वह अपनी फसल की ढेरी पर खड़ा होकर करीब से गुज़र रहे हाथी पर स्वार राजे को भी 'पिल्ले' का भाव पूछने में गुरेज़ नहीं करता।

शुरुआत से ही पंजाबी जट्ट किसान की जमहूरी स्पिरिट, अर्थात बंधुत्व भाव, केवल अपने भाईचारे तक ही सीमित रहा है। खेती के धंधे में मसरूफ होने के समय से ही वह गाँव की अन्य जातियों को ज़मीन के अधिकार में हिस्सेदार बनाने को तैयार नहीं हुआ। केवल ऐसा विचार भर ही उसे आग लगा देता रहा है। इस एक बात से ही उसकी जमहूरी स्पिरिट और इन्साफ की भावना में मौजूद टेढ़ की असलियत एकदम उभर के सामने आ जाती है। जहाँ यह बात उसकी तारीफ में जाती है कि उसने शुरुआत से ही ब्राह्मण को हाज़री नहीं दी और वह, इतिहास में कभी भी, हिन्दू समझ अनुसार ऊंची जातियों के सामने झुक के रहने को तैयार नहीं हुआ, वहीँ उसके इस 'बड़प्पन' को नकारता पक्ष यह है कि मनुवाद के असर तले उसके भीतर गाँव की पछड़ी और निम्न समझी जाने वाली जातियों प्रति बदगुमानी पैदा हो गई और वह हिन्दू समाज अनुसार ही सवर्ण जातियों की नक़ल करके उन्हें अपने से 'नीचे' और 'नीच' समझने लग गया।

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जट्ट किसान के भीतर मौजूद बराबरी, बंधुत्व भाव और लड़ाकूपन का जज़्बा ही, पहले पहल, उसे सिख लहर की तरफ प्रेरित करने वाला पहला तत्व बना। सिख विचारधारा ने, सिख लहर की चढ़त के शुरुआती दौर में, पंजाब के जट्ट भाईचारे में बराबरी और बंधुत्व-भाव के आदर्श को तगड़ा प्रोत्साहन दिया लेकिन यह थोड़े समय के लिए साबित हुआ। इसका असर बहुत लंबे समय तक क़ायम न रह सका। बड़ा कारण यह है कि सिख लहर के आदर्श जट्ट किसानी के आर्थिक हितों और सामाजिक स्वभाव के अनुसार फिट नहीं बैठते थे। क्यूंकि सिख लहर के बराबरी और बंधुत्व-भाव के आदर्शों को अमल में साकार करने के लिए, जट्ट किसान, गाँव की दबी कुचली जातियों से सांझ डालने को तयार नहीं था सो वह उनसे आर्थिक क्षेत्र में ज़मीन बांटने और समाजी क्षेत्र में उन्हें अपने बराबर का रुतबा देने को राज़ी नहीं था। इसलिए सिख लहर की जमहूरी स्पिरिट और इसका इंक़लाबी जट्ट जोश जट्ट किसानी के आर्थिक हितों और सामाजिक स्वभाव के साथ टकरा के धीमा पड़ना शुरू हो गया। जितना समय सिख लहर की हुक़ूमत से टक्कर रही, तब तक इसमें आदर्शक जान क़ायम रही। लेकिन हुक़ूमत पर भारी पड़ते ही इसका इंक़लाबी तत्व कमज़ोर पड़ना शुरू हो गया और ताक़त की बढ़ौतरी के साथ इसने बिल्कुल उलटी खासियत ग्रहण करनी शुरू कर दी। कुछ समय बाद 'भाई' 'सरदार' बनने शुरू हो गए। जट्टों का सामाजिक रुतबा ऊँचा हो गया। सत्ता में आने से उनकी आर्थिक पोजीशन तगड़ी हो गई। गाँव की अन्य, ज़मीन जायदाद से मरहूम जातियां, वैसे की वैसे ही रह गईं और समाज में असमान बाँट जैसे की तैसे। मिसलों के बाद के दौर और उसके बाद के अमल ने इस धारणा की पुष्टि कर दी कि ऐसे आदर्श, जो किसी वर्ग के आर्थिक हितों और समाजिक दर्जे के अनुकूल न हों, वह समय पड़ने से दब-मिट जाते हैं। जब आर्थिक और सामाजिक बनावट आदर्शवाद के अनुकूल न हो तो ऐसे आदर्शवाद बहुत टिकाऊ साबित नहीं होते। कुछ गिने चुने व्यक्तियों को छोड़ कर, आम जनता के लिए वह कुछ देर बाद उतने सार्थक नहीं रह जाते। इस तरह जट्ट किसान के आर्थिक हित और उसकी जात -पात वाली भावना हौले-हौले सिख धर्म की इंक़लाबी रूह पर हावी हो चलीं और इसकी मौलिक आभा बरकरार रखनी मुश्किल हो गई। फिर भी सिख धर्म पंजाब में जात पातिए प्रबंध को पूरी तरह खत्म करने में भले ही कामयाब न हो सका हो, पर इसके द्वारा पैदा हुए माहौल ने पंजाब में जाति-पाति प्रणाली के काफी छज्जे भुरा दिए। भारत के अन्य भागों की तुलना में इसकी मार और जकड़ खासी हद तक ढीली पड़ गई।

सो, देखा जाये तो पंजाब के जट्ट भाईचारे में गाँव की अन्य जातियों से बराबरी के स्तर पर व्यवहार करने और उनको अपने साथ ले कर चलने की रुचि और सामर्थ्य बहुत ही कमज़ोर है। अपने रोज़-मर्रा के व्यवहार में वह 'नीच/पछड़ी' समझे जाने वाली जातियों को अपने से निरंतर दूर रखता और परे धकेलता है। उसका यह व्यवहार और अमल दूसरी जातियों के अंदर उसके प्रति छुपी नफरत और नापसंदगी के भाव पैदा करता है और उनको जट्ट वर्ग के तगड़ेपन और चढ़त से अपने लिए संभावित और ज़्यादा बुरे दिनों का आभास होने लगता है। 'हरे इंक़लाब' की आमद और इस से जट्ट वर्ग की आर्थिक दशा और राजनितिक ताक़त में हुई चौखी बढ़त ने गाँवों की अन्य जातियों के दिलों में कुछ अनजाने भय और चिंताएं पैदा कर दीं। जट्ट भाईचारे के हाथ में राजनितिक ताक़त आने से, उन्हें, उसकी जाति अहंकार की भावना के और भी आसमान चढ़ जाने और दूसरी जातियों से और ज़्यादा बदतमीज़ी से पेश आने के डर और शंकाओं ने दबोच लिया। क्यूंकि चाहे क्षेत्र आर्थिक हो, सामाजिक हो या राजनितिक, जट्ट वर्ग अन्य जातियों को सहभागी बनाने का कड़वा पत्ता कतई नहीं चबा सकता। जैसे आर्थिक स्तर पर वह उनको ज़मीन की मालकियत में बराबर के साथी बनाने की जगह सीरी (खेती मज़दूर) बना के अपनी आर्थिक गाड़ी को चलाये रखने की रुचि रखता है, वैसे ही वह, उनको सत्ता के ढांचे में बराबर का हिस्सा और रुतबा देने की जगह कुछ औहदों और पदवियों की 'रिश्वत' देकर बरगलाने की धारणा पाल कर चलता है।

गाँव की बाकी जातियों में, अकाली दल को भारी रूप में जट्ट-किसानों की पार्टी के रूप में देखने की सोच और भावना पहले ही काफी प्रबल थी। यह एहसास और भी मजबूत हो उठा जब संत फ़तेह सिंह द्वारा मास्टर तारा सिंह को परे हटा के अकाली दल द्वारा राजनीति पर अपनी चौधर जमा लेने, और इस तरह, अकाली दल के इतिहास में, पहली बार, शहरी मध्यवर्गीय सिख तबके को अकाली राजनीती में पूरी तरह कोने लगाके इस ऊपर जट्ट किसान वर्ग की मुकम्मल सरदारी स्थापित हो गई। पंजाबी सूबे की स्थापना के बाद पंजाब में अकाली दल प्रमुख राजनीतिक ताक़त बनके उभर आने और सत्ता पर अच्छा-ख़ासा प्रभाव और कंट्रोल कर लेने से, गाँव की अन्य जातियों में बराबर के हक़ों और मौकों से वंचित हो जाने की भावना ज़ोर पकड़ गई और उन्होंने पनाह के लिए इधर उधर देखना शुरू कर दिया। जब किसी कमज़ोर वर्ग को, इतिहास में, किसी ज़ोरावर पक्ष द्वारा दरकिनार कर दिए जाने का डर एवं ख़तरा महसूस होता है तब ज़रूरी नहीं होता कि वह हमेशा ही अपनी रक्षा के लिए राजनितिक तौर पर जथेबंद होकर ज़ोरावर पक्ष के साथ सीधी टक्कर लेने को तैयार हो जाये। यह राह हमेशा इतना आसान नहीं होती बल्कि इसमें काफी जोख़िम होता है। इसकी तुलना में, ऐसी स्थिति में घिरे वर्ग के लिए स्वैरक्षा का एक ज़्यादा सुरक्षित और ज़्यादा कारगर ढंग यह होता है कि वह अपने अलग आध्यात्मिक रहबर का सृजन कर ले और उसकी पनाह ले ले। ये रास्ता ज़्यादा किफ़ायती और कम ख़तरों भरा होता है। साठवें और सत्तरवें में पंजाब में जट्ट किसानी की चढ़त से भयभीत कमज़ोर ग्रामीण वर्गों और पंजाबी समाज की अन्य पछड़ी समझी जाने वाली जातियों में यह अमल ज़ोरदार रूप में प्रकट हुआ। सिख समाज में दबे-कुचले और 'पछड़े' समझे जाते वर्गों ने सिख धर्म से खुल के नाता तोड़ने की जगह अपनी अलग आध्यात्मिक शरणगाहें तलाश/बना लीं। कुछ राधास्वामी बन गए, कुछ ने सिरसा के 'सच्चे सौदे' का आसरा ले लिया, कुछ डेरा वडभाग सिंह के मुरीद बन गए, कुछ निरंकारियों के भ्रम जाल में फंस गए और कुछ नामधारियों के पल्ले से बंध गए। बाकी के, स्थानक स्तरों पर अपना डमरू बजा रहे छोटे मोटे 'बाबाओं' के चरणों में जा लगे। सिक्खी के दृष्टिकोण से, यह अमल सिख धर्म को बड़ी चोट लगाने का साधन बना और बन रहा है। क्यूंकि सिख धर्म की मुख्यधारा से हटके, गुरमति विचारधारा की भर्त्सना में उभर-पसर रही यह संप्रदायें न केवल सिख समाज की एकता को फिरकेदारी की बाँट से चिन्दी चिन्दी कर रही हैं बल्कि अलग अलग स्तर पर, अलग अलग शक़्लों में, और भी पलीत कर रही हैं। यदि इस मसले पर असली दोषियों का पद-चिन्ह खोजा जाये तो यह सीधा अकाली लीडरों के घर पहुँच जाता है। अकाली लीडरों ने इस अमल को दो तरफों से उत्साह दिया। एक, सिख समाज में गैर-जट्ट और कमज़ोर वर्गों को सत्ता के ढांचे से बाहर निकाल कर उन्होंने इस राह की तरफ धकेल दिया। दूसरा, अपनी चुनाव राजनीती की ग़र्ज़ों अनुसार इन गुरमति विरोधी डेरों और सम्प्रदाओं से उन्होंने न केवल सैद्धान्तिक स्तर पर समझौता कर लेने की कुरुचि प्रकट की बल्कि उनके साथ गहरे और कई मामलों में नंगे, संबंध बनाने/पालने की नंगी मौकाप्रस्ती भी दिखाई।

 वैसे भी अकाली दल की ग्रामीण लीडरशिप द्वारा वहमों और भ्रमों में अँधा यक़ीन पालने और साधुओं संतों के सामने नाक रगड़ने जैसे गुरुमत-द्वेषी अमलों को प्रोत्साहित करने वाले ग्रामीण सभ्याचार के खुद ही गहरे असर तले होने के कारण ही, अतीत में, डेरा सभ्याचार ज़्यादा प्रफुलित हुआ है। जिस के नतीजे के तौर पर रोज़-मर्रा की ज़िन्दगी से लेकर, धार्मिक और राजनितिक क्षेत्र तक, हर जगह 'संतों/बाबाओं का बहुत ही उभरता रोल और दबदबा देखने को मिल रहा है। जब तक अकाली दल की लीडरशिप शहरी मध्यवर्गीय तत्वों के हाथ रही, तब तक इन रुझानों और अमलों ने दबी हुई शक़्ल बनाए रखी। सिख धर्म में 'डेरेदारों' और 'डेरा सभ्याचार' को इतनी खुली मान्यता ग्रामीण जट्ट लीडरशिप के 'राज्य' में ही हासिल हुई है।

ऐसे लड़ाकू और शख़्सियतप्रस्त कबीलों का यह ख़ास लक्षण है कि वह बाहरी ख़तरे के ख़िलाफ़ इकट्ठे होकर लड़ते हैं। लेकिन जब यह ख़तरा टल जाये या ग़ायब हो जाये तो यह आपस में झगड़ पड़ते हैं। बाहरी ख़तरे के ख़िलाफ़ अकेला अकेला सिख सवा लाख से लड़ सकता है, लेकिन बाद में आपस में उलझ पड़ता है। ख़ानाबदोश जीवन में, कभी स्वैरक्षा के लिए और कभी ज़रुरत की भरपाई के लिए, लड़ना उनकी ज़रुरत बनी रहती थी। धीरे धीरे यह उनकी आदत बन गई। बिना ज़्यादा सोच विचार के, नतीजों से बेपरवाह, लड़ाई में कूद पड़ना उनके स्वभाव का आम लक्षण बन जाता है। इस लक्षण को घड़ने-तराशने में एतिहासिक हालातों का बड़ा ही भारी रोल है। बराबरी के युग में उनको निरंतर बड़ी आफतों का सामना करना पड़ता था, और यह आफ़तें दस्तक देकर नहीं थी आतीं, बल्कि सोते हुओं को दबोच लेती थीं। उनको बाहरी हमलों, हमलावरों और लुटेरे गरोहों के विरुद्ध अचानक लड़ना पड़ता रहा। उनको लड़ने से पहले, लड़ाई के बारे में सोच-विचार करने का वक़्त ही नहीं था जुड़ता। इसलिए, धीरे धीरे लंबे ऐतिहासिक अमल में, उनकी सोचने की आदत ही जाती रही और यह रुचि इस कदर पक्की हो गई कि उनको सोचने की ज़रुरत महसूस होने से ही हट गई। इतिहास में युगों का रास्ता पार कर लेने के बाद भी इन कबीलों के स्वभाव और व्यवहार में इस रुचि का गाढ़ा असर मौजूद है। पंजाब के जट्ट-किसान ने अपना यह 'विरसा' ख़ास तौर पर संभाला हुआ है।

इतिहास में तज़ुर्बों से इस बात की बार बार पुष्टि हुई है कि सिख विचारधारा ही थी जिसने जट्ट-किसान के स्वभाव और आचरण पर इंक़लाबी परत चढ़ाई थी। इस विचारधारा से मरहूम जट्ट किरदार अपने यह लक्षण गवाँ कर इसके विपरीत हो गुज़रता है। अठारवीं सदी में भी जट्ट किसान के जिन हिस्सों ने सिख लहर की मूल-आत्मा को नहीं ग्रहण किया था, उन्होंने लहर में शामिल होके नकारात्मक अमलों और रुझानों को तगड़ा किया। जिस वर्ग ने सिक्खी की हक़ीक़ी स्पिरिट और जज़्बे को गहरे दिल से अपनाया और ग्रहण किया था, उन्होंने पाक़ और बुलंद इख़लाक़ के वह जलवे दिखाए कि क़ाज़ी नूर मोहम्मद जैसे कट्टर दुश्मन प्रभावित और अचंभित होने से न रह सके। सो समूचे तज़ुर्बे से यह बात प्रकट होती है कि पंजाब का जट्ट किसान जब भी सिक्खी के जज़्बे को ग्रहण कर लेता है तो वह शुद्ध सोना बन जाता है और जब वह इस जज़्बे से महरूम हो जाता है तो वह 'पीतल' के मोल का भी नहीं रहता। बतौर निरा जट्ट वह जाहिल और जाति अभिमानी हो गुज़रता है। इस संबंध में (मरहूम) प्रोफेसर किशन सिंह का यह निर्णय बहुत ही दरुस्त है कि "पंजाब के जट्ट-किसान के किरदार में एक बड़ा विरोधाभास है। इसमें जहाँ गुरु गोबिंद सिंह महाराज के लिए इतनी गहरी वफ़ादारी है, वहीँ जट्टपन का जज़्बा भी बहुत गहरा है। जट्टपन के जज़्बे के दो पहलु हैं। एक, यह इसे कीर (तोता स्वभाव) बनने से बचाता है। (इस पक्ष से यह गुणकारी है।) दुसरे, यह दीर्घ रोग है...... जट्टपन का यह जज़्बा है इतना प्रबल और हड्डियों में रचा हुआ कि सिवा सिक्खी के, सिवा गुरु साहेब के जज़्बे से, इस (जट्टपन) पर और कोई जज़्बा ग़लबा नहीं डाल सकता।"

rajnit singh ajmer singh gurinder  azad rajesh kumar

बायें से दायें - सरदार रणजीत सिंह, सरदार अजमेर सिंह, गुरिंदर आज़ाद, राजेश कुमार (स्टूडेंट एक्टिविस्ट)

दूसरी बात, यही जट्ट किसान राजनितिक तौर पर चेतन नहीं, निशानों के बारे में स्पष्ट और दृढ़चित नहीं, तो वह किसी भी राजनीतिक ताक़त के साथ निर्वाह कर सकता है, उसका मातहत बन सकता है, बशर्ते कि उसके आर्थिक हितों को आँच न आये। यदि कोई हुक्मरान उसके आर्थिक हितों को चोट न पहुँचाये और उसकी सीमित से दायरे वाली आज़ादी में दख़ल न दे, तो वह उसके साथ आराम से निर्वाह कर सकता है। यह बात बर्तानवी राज के वक़्त भी प्रकट हुई और मौजूदा समय में भी सामने आ रही है। राजनितिक चेतना से कोरा जट्ट किसी भी राज्यशक्ति का 'बहादुर जवान' बनके अपना और अन्य लोगों का न सिर्फ व्यर्थ में बल्कि बेदोषों का भी लहू गिरा सकता है और इस पर उजड्ड तरह का गुरूर कर सकता है। वास्तव में जिसको प्रोफेसर कृष्ण सिंह ने 'जट्टपन' का नाम दिया है, वह आदर्शक प्रेरणा से ख़ाली दलेरी और लड़ाकूपन है, जो कि बग़ैर साधा हुआ कबाईली जज़्बा है। सिख लहर में रहकर कबाईली स्तर से ऊँचे सामाजिक निशानों के लिए जद्दोज़ेहद ने जट्ट किसान के चरित्र पर नया रूप चढ़ाया। इतिहास में भी, और मौजूदा समय में भी, जहाँ यह निशाने ग़ायब हो गए, वहां उसका व्यवहार कबाईली स्तर पर आ गिरा। यदि उसे किसी इंक़लाबी आदर्श की सचमुच पकड़ हो जाये, वह सिखी की स्पिरिट को वास्तविक रूप में ग्रहण कर ले तो वह बेहद दुशवार हालातों में भी इरादे की अडोलता प्रकट कर सकता है और धैर्य के नए कीर्तिमान स्थापित कर सकता है; सालों साल, बल्कि दशकों तक, बेतहाशा सितम मुसीबतों और यातनाएं झेलने के बावजूद, बिना डोले, बिना झुके, बिना रुके, अपने निशाने की तरफ अडोल बढ़ सकता है। नाउम्मीदी की हालत में क़ुर्बानी और बहादुरी के बेजोड़ जलवे दिखला सकता है। लेकिन जब उसमे आदर्श का जज़्बा कमज़ोर पड़ जाये तो उस में ख़ुदपरस्ती, बेदिली और आत्मसमर्पण करने की रूचियां सिर उठा लेती हैं और वह सस्ते भाव (कई बार तो मुफ्त में ही) बिकने को तैयार हो जाता है। मौजूदा सरमायेदारी युग ने उसकी शख्सियतप्रस्ती और ख़ुदग़र्ज़ी पर नया यौवन चढ़ा दिया है और इंक़लाबी आदर्श से महरूम जट्ट किसान एक कमाऊ लेकिन लालसावान जीव बनके रह गया है। यह अंश मौजूदा अकाली राजनीति की दिशा और दशा पर अपना गहरा प्रभाव प्रकट कर रहा है।

सो यदि पंजाब में पांच साल में दो बार अपनी हुक़ूमत बनाने में सफल होने के बाद अकाली दल द्वारा 1972 के चुनाव में ग़ैर-जट्ट वर्गों की हिमायत और हमदर्दी को बुरी तरह गँवा बैठने और ज्ञानी ज़ैल सिंह के एक प्रभावशाली जननायक के तौर पर उभर आने के घटनाक्रम को ऊपर बताए खाँचे में रखकर देखा जाये तो इसके सारे रहस्य उजागर हो जाते हैं। ज्ञानी ज़ैल सिंह ने सत्ता सँभालते ही, पंजाब के ग़ैर-जट्ट सामाजिक वर्गों में अपने और कांग्रेसी पार्टी का आधार मजबूत करने और अकाली लीडरों की ताक़त को खोरने की दिशा में कई कारगर कदम उठाये। अकाली सरकारों की तर्ज़ पर उसने, अपना 12 बिंदु प्रोग्राम जारी किया, जिसमे दलित वर्गों को बड़ी राहतें देने, बड़े जमींदारों द्वारा हदबंदी से ज़्यादा रखी ज़मीनों को, सरकारी मालकियत वाली ज़मीनों समेत, बेज़मीन वर्गों में बाँट देने, ग़रीब वर्गों के लिए नौकरियों के विशेष मौके पैदा करने, मुज़ारा (दूसरों की ज़मीन हिस्से/ठेके पर लेकर खेती करने वाला किसान- अनुवादक) कानूनों को सख़्ती से लागू करने के लिए, इनके बीच की चोर-मोरियों को बंद करने और ज़मीन की हदबंदी के लिए परिवार को इकाई मानने, ट्रांसपोर्ट के राष्ट्रीयकरण के लिए माकूल क़दम उठाने इतियादी कार्यों को ख़ास अहमियत दी गई। ज्ञानी ज़ैल सिंह ने ज़मीनी हदबंदी के बारे में केंद्र सरकार के कार्यो के लिए दिशा निर्देशों अनुसार पंजाब में ज़मीनी मालकियत की सीमा 30 एकड़ से घटाकर, ज़मीन की अलग अलग किस्मों के लिए अलग अलग सीमा निर्धारित करने के लिए कानून पास कर दिए। शहीदों और स्वतंत्रता-सैलानियों के सम्मान में कई किस्म के कदम उठाये गए। शहीद भगत सिंह की वृद्ध माता को 'पंजाब माता' की उपाधि और हज़ार रूपए महीना पेन्शन से नवाज़ा गया। आनंदपुर साहेब से लेकर तख़्त श्री दमदमा साहेब तक 640 किलोमीटर लंबा गुरु गोबिंद सिंह मार्ग मुकम्मल करके 1973 की बैसाखी पर सरकारी स्तर पर उस मार्ग पर प्रभावशाली जलूस निकाला गया, जिसमे मजबूरीवश, अकाली लीडरों को भी शिरकत करनी पड़ी। 1976 में श्री गुरु तेग बहादुर जी के 300वें शहीदी दिवस मौके बड़ी नुमाईश करते सरकारी प्रोग्राम रचे गए। 1977 में अमृतसर का 400 वर्षीय स्थापना दिवस धूमधाम से मनाया गया। इसके साथ ही गाँवों और शहरों में ग़रीब वर्गों की सहूलियत के लिए विकास कार्यों की तरफ ख़ास ध्यान दिया गया।

आम सूझ के मुताबिक, उपरोक्त क़दमों के साथ ज्ञानी ज़ैल सिंह की सिक्खों समेत आम जनता में, ख़ास तौर पर ग़ैर-जट्ट और ग़ैर काश्तकार वर्गों में, अच्छी पैठ बन जानी चाहिए थी। निष्पक्ष दृष्टि से देखा जाये तो शुरुआती दौर में, वह पंजाब के लोगों में स्वच्छ और न्याकारी राज्य प्रबंध को लेकर आशा भरी उम्मीद जगाने में काफी सफल हो गुज़रा था। 1972 में ही संत फ़तेह सिंह और संत चन्नण सिंह की मौत के चलते अकाली दल में पैदा हुई लीडरशिप की खाई ज्ञानी ज़ैल सिंह के लिए अकाली दल को भांज देने में और ज़्यादा फायदेमंद हो सकती थी। लेकिन कुछ बाह्यमुखी (ऑब्जेक्टिव) और कुछ अन्तःमुखी (सब्जेक्टिव) कारणों के चलते, ज्ञानी ज़ैल सिंह का पंजाब के हरदिल अज़ीज़ लीडर बनके उभरने का चाव और सपना न सिर्फ पूरा नहीं हो सका बल्कि यह बुरी मौत कर के रह गया।

साठवें के दुसरे मध्य में जिस 'हरे इंक़लाब' ने पंजाब की किसानी के वारे-न्यारे कर दिए थे, सत्तरवें में आकर इसका दम निकला महसूस होने लगा। खेती के लिए ज़रूरी वस्तुएं, जैसे खाद, तेल, कीड़ेमार और नदीन नाशक दवाईयाँ, मशीनरी आदि की कीमतों में खरगोश-चाल बढ़ौतरी की तुलना में, खेती उत्पादों की कीमतों में कछुआ-चाल बढ़ौतरी का परिणाम यह निकला कि किसान की कमाई उसकी मुट्ठी से रेत की तरह गिरने लगी। 1973-74 में कुछ अंतरराष्ट्रीय कारणों और कुछ भारत सरकार की ग़लत योजनाबंदी के परिणाम स्वरूप तेल और खाद की किल्लत हो गई और इसकी ज़खीरेबाज़ी होने लगी। जिससे किसानी में व्यापक स्तर पर गुस्सा और बेचैनी पसरने लगी। पंजाब में किसानी में ग़ैर काश्तकारों और ग़ैर-जट्ट भाईचारे से संबंधित व्यक्ति के कुर्सी पर विराजमान होने की हक़ीक़त को जट्ट काश्तकार वर्ण ने पहले ही मन से कबूल नहीं किया हुआ था। ऊपर से उसके लिए पैदा हुई दुश्वारियों ने उनकी सुलग रही मुश्किल और नाराज़गी को ऐसा झोंका दे दिया कि किसान भाईचारे में, भारत के कांग्रेसी हुक्मरानों के विरुद्ध आम तौर पर और ज्ञानी ज़ैल सिंह के ख़िलाफ़ ख़ास तौर पर, व्यापक गुस्से की आग भड़क उठी। 5 और 7 अक्टूबर 1972 को मोगे (मोगा- पंजाब में एक शहर का नाम) में एक सिनेमाहाल (रीगल) के मालिकों की तरफ से टिकटों की ब्लैक के ख़िलाफ़ रोष प्रकट करते विद्यार्थियों पर गोलीबारी की वहशी वारदात (जिसमे आधी दर्जन से ज़्यादा नौजवान हलाक़ हो गए थे) ने पंजाब भर के विद्यार्थियों में इतना तीखा रोष भड़का दिया कि समूचा पंजाब लगातार कई हफ़्तों तक सरकार विरोधी हिंसक प्रदर्शनों की गिरफ्त में आया रहा। इसी दौरान गुजरात और बिहार में श्री जय प्रकाश नारायण की अगुआई में कांग्रेसी हाकिमों के ख़िलाफ़ लामिसाल जन-आंदोलनों ने सरूप धारण कर लिया, जिसने समूचे देश के माहौल को ऐसा गरमा दिया कि 1971 में लामिसाल जनादेश जुटाने वाली 'दुर्गा' का सिंघासन डोल उठा। इंदिरा गाँधी जैसी तरबियत वाले हाक़िम के सामने जब भी ऐसी स्थिति पैदा होती है तो उनके अंदर फाशी-बल मरोड़े खाने लगता है और वह अपनी संकट के मुहँ में आई गद्दी की सलामती के लिए फ़ाशीवाद के राह पड़ जाते हैं। इंदिरा गाँधी ने भी ऐसा ही किया। उसने इलाहबाद हाई कोर्ट द्वारा उसकी लोक सभा की मेम्बरी को अयोग्य ठहरा देने के फैसले के सामने जमहूरियत की भावना अनुसार अपना सिर झुकाने की बजाय, जमहूरियत के सिर को ही कलम कर देने का जम्हूरियतघाती रुख इख़्तियार कर लिया।

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